डॉ. लोकेन्द्र सिंह जी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ पत्र लिखने के अभ्यासी थे। पत्रों के माध्यम से श्रीगुरुजी का कार्यकर्ताओं के प्रति स्नेह, राष्ट्रप्रेम और हिन्दू समाज की एकात्मता के प्रति उनका संकल्प स्पष्ट झलकता है। उनके पत्रों में संघ कार्य के विस्तार, वैचारिक स्पष्टता, अनुशासन और व्यक्तिगत जीवन में मूल्यों को अपनाने पर जोर दिया गया है। कार्यकर्ताओं, सामाजिक एवं राजनीतिक नेतृत्व को लिखे उनके अनेक पत्र चर्चित हैं परंतु उनके ‘तीन पत्र’ अत्यंत महत्व के हैं। संघ को जानने-समझने की रुचि रखनेवाले बंधुओं को श्रीगुरुजी के ये तीनों पत्र अवश्य पढ़ना चाहिए। ये पत्र उन्होंने अपनी देह त्यागने से पूर्व लिखे थे। वर्ष 1972 में श्रीगुरुजी का स्वास्थ्य तेजी से गिरना शुरू हो गया था। परंतु, उसके बाद भी उन्होंने क्षणभर भी स्वयं को संघकार्य से अलग नहीं किया। वर्ष 1973 में जब उन्हें यह आभास होने लगा कि अब भौतिक देह से विश्राम लेने का समय आ गया है, तब उन्होंने अपने देहावसान के बाद संघ कार्य की समुचित व्यवस्था के बारे में विचार प्रारंभ कर दिया। इसी क्रम में ये तीन ऐतिहासिक पत्र लिखे गए। श्रीगुरुजी ने 2 अप्रैल 1973 को अपने हाथ से तीन पत्र लिखे और अखिल भारतीय व्यवस्था प्रमुख पांडुरंग पंत क्षीरसागर को सौंप दिए। उन्होंने क्षीरसागर जी को निर्देश दिए कि ये पत्र मेरे जाने के बाद सार्वजनिक रूप से पढ़े जाएं, जिनमें से दो पत्र बालासाहब देवरस पढ़े। श्रीगुरुजी की इच्छा के अनुरूप तीनों पत्र सुरक्षित रख दिए गए। 15 जून 1973 को श्रीगुरुजी ने अपनी देह का त्याग किया। अगले दिन यानी 16 जून को इस पुण्य आत्मा के पार्थिव शरीर की अंत्येष्टि यात्रा प्रारंभ होने के पूर्व इन पत्रों को पढ़कर सुनाया गया। एक पत्र में उनके उत्तराधिकार की घोषणा की गई। दूसरे पत्र में आग्रह किया कि उनका कोई स्मारक नहीं बनाया जाए। वहीं, तीसरे पत्र में उनके हृदय की उदारता एवं व्यक्तित्व की महानता के दर्शन होते हैं, जिसमें वे विनयभाव से क्षमायाचना करते हैं कि उनके व्यवहार से कभी किसी का हृदय दुःखी हुआ हो, तो क्षमा करें। श्रीगुरुजी के ये तीन पत्र ‘बीज’ थे, जिन्होंने आगे चलकर संघ की कार्यपद्धति एवं संस्कृति को समृद्ध किया।
पहला पत्र (नवीन सरसंघचालक की नियुक्ति): राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने अंतिम विश्राम लेने से पूर्व संघ कार्य को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी श्रीगुरुजी को सौंपी थी। उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए श्रीगुरुजी ने पत्र लिखकर संघ के अगले सरसंघचालक की नियुक्ति की। इस पत्र का वाचन महाराष्ट्र प्रांत के संघचालक बाबाराव भिड़े ने किया। श्रीगुरुजी के प्रति श्रद्धाभाव से भरे हुए स्वयंसेवकों के बीच श्री भिड़े ने भावुक होकर यह पत्र पढ़ा- “मेरे सभी आत्मीय स्वयंसेवक बंधुओं के लिए, गत एक माह से शरीर का शक्ति-क्षय दूत-गति से हो रहा है। डॉक्टर बंधु निराश हो गए हैं। सबके मन में एक ही विचार आ रहा प्रतीत होता है कि यह शरीर अब अत्यल्प काल का साथी है। तब अपने संघकार्य की व्यवस्था का एक महत्त्व का प्रश्न सामने आता है। संघकार्य अपने संविधान के अनुसार सुचारू रूप से चलेगा ही। उसी संविधान के अनुसार नूतन सरसंघचालक की योजना करने का यह प्रश्न है। अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल के जिन सदस्यों से मिलकर मैंने इस संबंध में विचार किया, वे सब पुराने, दीर्घ काल के अनुभवी मंजे हुए कार्यकर्ता है और भिन्न-भिन्न प्रांतों के संघचालक के रूप में कार्य कर रहे हैं। सबसे बातें होने पर उन सबका सारभूत निर्णय प्रकट करने का मेरा सद्यःकालीन सरसंघचालक के नाते दायित्व है। उस दायित्व को पूरा करते हुए मैं यह निर्णय प्रकट कर रहा हूँ कि मेरे शरीर के शांत होने के पश्चार, सरसंघचालक की जिम्मेदारी श्री मधुकर दत्तात्रेय उपाख्य बालासाहेब देवरस संभालेंगे, जिन्हें आप सब जानते हैं”। यहाँ उल्लेखनीय है कि बालासाहेब को इस पत्र के पढ़े जाने के बाद ही यह पता चला कि वे अब सरसंघचालक होगे। बालासाहेब देवरस जी के प्रति सब स्वयंसेवकों के मन में पहले से अपार श्रद्धा थी। श्रीगुरुजी के चयन से सबमें संतोष था। यद्यपि श्रीगुरुजी ने संघ की परंपरा का स्मरण कराते हुए इसी पत्र के आखिरी हिस्से में स्वयंसेवकों से कहा कि “अपने कार्य की स्नेहपूर्ण एकात्मता की पद्धति, व्यक्ति-निरपेक्षता, ध्येयनिष्ठा आदि विशेषताओं को ध्यान में रखकर सब छोटे-बड़े स्वयंसेवक बंधु अपने परम पूज्य सरसंघचालकजी के मार्गदर्शन में संघकार्य की पूर्ति हेतु काया-वाचा-मनसा जुटे रहेंगे और कार्य शीघ्र लक्ष्यपूर्ति कर सकेगा, ऐसा मेरा विश्वास है। सब बंधुओं को सादर नमस्कार। इति शम्”।
दूसरा पत्र (स्मारक आवश्यक नहीं): दूसरे पत्र के माध्यम से श्रीगुरुजी ने यह सुनिश्चित किया कि संघ में व्यक्तियों के स्मारक बनाए जाने की परंपरा प्रारंभ न हो जाए। संघकार्य व्यक्तिनिष्ठ न होकर तत्य निष्ठ है। आमतौर पर सभी नेतृत्वकर्ताओं के मन में अभिलाषा होता है। शरीर नश्वर तो है ही, कभी न कभी जाएगा। उसके जाने पर शेष शव का श्रृंगार आदि बातें विचित्र लगती हैं। वैसे ही संघ का ध्येय और उस ध्येय का दर्शन करानेवाले संघनिर्माता, इनके अतिरिक्त और किसी व्यक्ति का व्यक्ति इस नाते से महत्त्व बढ़ाना, उसके स्मारक बनाना आवश्यक नहीं है। मैंने तो ब्रह्मकपाल में अपना स्वतः का भी श्राद्ध कर रखा है, जिससे बाद में किसी पर श्राद्धादि का बोझ न रहे। ये अति थोड़े में कहा है। इसका विस्तार से अर्थ सब समझ सकेंगे, यह मेरा पूरा विश्वास है। इति। नागपुर स्थित रेशिमबाग में डॉ. हेडगेवार का स्मारक बना है, जिसे स्वयं श्रीगुरुजी ने डिजाइन किया था। वहीं, डॉक्टर साहब की प्रतिमा के सामने ही श्रीगुरुजी की समाधि का प्रतीक ‘यज्ञवेदी’ के रूप में बनाया गया है।
तीसरा पत्र (करबद्ध क्षमायाचना): तीसरे पत्र का वाचन भी बालासाहेब जी ने किया। इस पत्र में श्रीगुरुजी ने संघकार्य में स्वयंसेवकों से मिले सहयोग के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया और आग्रह किया है कि जिस प्रकार का सहयोग उन्हें मिला, वैसा ही नये सरसंघचालक को मिले। श्रीगुरुजी लिखते हैं- “परम प्रिय आदरणीय स्वयंसेवक बंधुगण। 21 जून 1940 को परमपूजनीय डॉ. हेडगेवारजी का शरीर शांत हो गया और उनकी इच्छा के अनुसार सरसंघचालक पद का गुरुभार मुझ पर आ पड़ा। मैं तो कुछ भी जानता नहीं था। तो भी सब पुराने कार्यकर्ताओं ने बड़े प्रेम से सहकार्य किया, मार्गदर्शन किया और इतने दीर्घकाल तक, लगभग वर्ष, मैं इस भार को वहन करता आया। अब भगवान की इच्छा दिखती है कि दूसरे योग्य व्यक्ति को यह दायित्व देकर, कार्य अधिक अच्छी प्रकार और अधिक द्रुत गति से पूर्णता की ओर बढ़ावें। और अब वह योजना हो रही है। जिस कार्य को उन्होंने अपने जीवन में कभी भी जानबूझकर नहीं किया, उसके प्रति क्षमायाचना करके उन्होंने अपने विनम्र स्वभाव का ही परिचय दिया है। पत्र में वे आगे लिखते हैं- “इस दीर्घ काल में मेरे स्वभाव-वैचित्र्य के कारण या अन्यान्य न्यूनताओं के, दोषों के कारण अपने अनेक कार्यकर्ताओं को मानसिक दुःख हुआ होगा। मैं सब से करबद्ध क्षमा-याचना करता हूँ”। अपनी भावनाओं को, अपने स्वभाव के अनुरूप आध्यात्मिक आधार देते हुए पत्र के अंत में उन्होंने श्रीसंत तुकारामजी का वचन उद्धृत किया है, जिसका हिन्दी भावार्थ है- “अरे संतो और पवित्र लोगो, मेरी इस अंतिम प्रार्थना को ईश्वर तक पहुँचा दो। हे ईश्वर, मुझे भूलना मत। मैं और क्या कह सकता हूँ? आप मेरे प्रभु, सर्वज्ञानी हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ। मुझे अपनी गौरवमयी शरण में ले लो। यह अंतिम संदेश श्रीगुरुजी समाधि पर भी अंकित है।