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‘गणपति संगठन के देवता हैं’ : डॉ. मोहन राव भागवत

‘गणपति संगठन के देवता हैं’ : डॉ. मोहन राव भागवत

नागपुर। प्रसिद्ध टेकड़ी गणपति मंदिर के गर्भगृह के लोकार्पण अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक ने गणपति के आध्यात्मिक एवं सामाजिक स्वरूप की विस्तार से व्याख्या की। उन्होंने कहा कि गणपति गणनायक हैं और संगठन के देवता हैं। उनके भीतर संगठन की प्रचंड शक्ति एकत्रित है। वे सुखकर्ता, दुःखहर्ता और सभी विघ्न-बाधाओं का नाश करने वाले देवता हैं।

उन्होंने कहा कि वे वर्ष 1964 से टेकड़ी गणपति मंदिर में आते रहे हैं और इस दौरान मंदिर का क्रमशः होता विकास उनकी आंखों के सामने हुआ है। उन्होंने कहा कि भक्तों के सहयोग से मंदिर का विकास होना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है और गणेश मंदिर के लिए यह भावना और भी आवश्यक है।

• गर्भगृह मंदिर का ‘स्पिरिट’ है :

गर्भगृह के लोकार्पण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मंदिर का सबसे आंतरिक भाग गर्भगृह होता है। सामान्य भाषा में कहा जाए तो किसी संस्था या व्यवस्था का जो ‘स्पिरिट’ होता है, मंदिर का वही ‘स्पिरिट’ गर्भगृह है। यहीं देवता विराजमान होते हैं।

उन्होंने कहा कि गणेश की सगुण प्रतिमा की हम पूजा करते हैं, लेकिन उसके पीछे निहित भाव को समझना भी आवश्यक है। अथर्वशीर्ष में गणपति के लिए ‘मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम्’ कहा गया है। मूलाधार में स्थित चेतना को कुंडलिनी कहा जाता है और वह बोध का स्वरूप है। मनुष्य के भीतर यह बोध जितना प्रखर होगा, उतनी ही उसके व्यक्तिगत जीवन की उन्नति होगी और उसका लाभ पूरे समाज तथा विश्व को मिलेगा।

उन्होंने कहा कि जड़ और चेतन से युक्त इस समस्त चराचर सृष्टि में मूल चेतना एक ही है। उसी चेतना से सृष्टि की उत्पत्ति होती है और उसी में सृष्टि का विलय होता है।

• वास्तविक संगठन का आधार है एकात्म चेतना :

उन्होंने कहा कि गणपति संगठन के देवता हैं, लेकिन संगठन किस आधार पर होना चाहिए? इसका आधार वह बोध है कि सर्वत्र एक ही चेतना विद्यमान है। विद्वान लोग इसी सत्य को अलग-अलग नामों से संबोधित करते हैं। वेद का वाक्य है—‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।’ कोई इसे धर्म कहता है, कोई निर्वाण कहता है और कोई किसी अन्य नाम से पुकारता है। मूलतः यह वही सार्वभौमिक चेतना है।

उन्होंने कहा कि दुनिया में संगठन अनेक आधारों पर बनते हैं—कहीं स्वार्थ के आधार पर, तो कहीं समान उद्देश्य के आधार पर। लेकिन वास्तविक एकता तब होती है, जब मनुष्य यह अनुभव करता है कि हम सभी एक ही ऊर्जा और चेतना की अभिव्यक्ति हैं।

इसी भाव को सामान्य भाषा में ‘अपनेपन’ या ‘आपलेपणा’ कहा जा सकता है। यह अपनापन केवल परिवार या रिश्तेदारों तक सीमित नहीं है। देश के प्रति भी ऐसा ही अपनत्व दिखाई देता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कारगिल युद्ध के समय या भारत के किसी क्रिकेट मैच में जीत हासिल करने पर पूरा देश एक साथ आनंदित होता है। जिन खिलाड़ियों को हम व्यक्तिगत रूप से जानते तक नहीं, उनकी जीत पर भी हम ऐसे प्रसन्न होते हैं, जैसे वह हमारी अपनी जीत हो। इसका कारण हमारे भीतर मौजूद वह जुड़ाव और अपनापन है।

उन्होंने कहा कि यदि यह अनुभूति निरंतर बनी रहे और हमारे व्यक्तिगत, सामाजिक, राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय व्यवहार इसी आधार पर हों, तो दुनिया में विघ्न-बाधाओं के लिए बहुत कम स्थान बचेगा। आज दिखाई देने वाले अनेक संकट इसी एकात्म भाव के विस्मरण के कारण हैं। इसका वास्तविक समाधान यही है कि हमारे सभी व्यवहार अपनेपन और एकात्मता की भावना पर आधारित हों।

• सगुण उपासना निर्गुण सत्य की ओर ले जाती है :

उन्होंने कहा कि आज गर्भगृह का लोकार्पण करते हुए सभी को श्रीगणेश के स्वरूप में निहित इस ‘स्पिरिट’ पर विचार करना चाहिए। सगुण की उपासना सत्य की ओर ले जाने वाली है। निर्गुण और निराकार तक पहुंचने का मार्ग भी इसी से होकर जाता है। सामान्य मनुष्य के लिए सीधे निर्गुण-निराकार की उपासना सहज नहीं होती, इसलिए वह सगुण रूप की उपासना करता है। यही सगुण उपासना उसे धीरे-धीरे उस निर्गुण सत्य की ओर ले जाती है।

उन्होंने मंदिर की स्थापत्य परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि मंदिर में गर्भगृह के साथ नृत्य मंडप, सभा मंडप, शिखर, आमलक आदि का भी निश्चित विधान है, लेकिन गर्भगृह सबसे प्रमुख है, क्योंकि वहीं देवता विराजमान होते हैं। इसी प्रकार गणेश की सगुण प्रतिमा गर्भगृह में उस व्यापक बोध और चेतना के प्रतीक रूप में विराजमान है।

उन्होंने कहा कि गणेश की साधना और भक्ति करते हुए हमारे भीतर ऐसी चेतना का स्फुरण होना चाहिए, जो वास्तविक अर्थों में संगठन का निर्माण करे और संगठित शक्ति के आधार पर सभी संकटों का निवारण करने तथा समाज की मनोकामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ बनाए। गणेश के स्मरण और साधना के माध्यम से इस चेतना का निरंतर जागरण होना चाहिए।

• मंदिर व्यक्तिगत भक्ति को विश्व-मंगल से जोड़ते हैं :

उन्होंने कहा कि उपासना के लिए किसी न किसी आधार और केंद्र की आवश्यकता होती है। व्यक्ति अकेले भी उपासना कर सकता है, लेकिन समाज के स्वास्थ्य और सामूहिक जीवन में उपासना की परंपरा निरंतर बनी रहे, इसके लिए मंदिर आवश्यक हैं।

उन्होंने कहा कि टेकड़ी गणपति मंदिर एक प्राचीन मंदिर है और भक्त यहां श्रद्धा एवं भक्ति के साथ आते रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि यह भक्ति केवल व्यक्तिगत भावना तक सीमित न रहे, बल्कि ‘हे विश्वचि माझे घर’ अर्थात् ‘यह संपूर्ण विश्व ही मेरा घर है’—इस व्यापक बोध तक पहुँचे।

उन्होंने कहा कि भक्ति की यात्रा अंततः उस अवस्था तक पहुंचनी चाहिए, जहां मनुष्य पूरे चराचर जगत को अपना मानने लगे। यही बोध उसकी भक्ति को सार्थक और सफल बनाता है।

गर्भगृह के लोकार्पण अवसर पर अपने संबोधन के समापन में उन्होंने सभी गणेश भक्तों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि गणेश की पूजा, अर्चना और भक्ति को केवल व्यक्तिगत साधना न मानकर विश्व-मंगल की साधना के रूप में देखना चाहिए। यही भावना समस्त विश्व के मंगल का आधार बनेगी।

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