निष्ठावान सच्चरित्र बनें और राष्ट्रभक्ति करें
निष्ठावान सच्चरित्र बनें और राष्ट्रभक्ति करें

निष्ठावान सच्चरित्र बनें और राष्ट्रभक्ति करें

मद्रास में विद्यार्थियों का कार्यक्रम था। श्री गुरुजी शिक्षा के विषय में बोल रहे थे। ‘शिक्षा का अर्थ केवल पढ़ना और लिखना इतना ही नहीं होता। शिक्षा प्राप्ति का स्वाभाविक परिणाम होना चाहिये, अपने राष्ट्र के बारे में श्रद्धा की जागृति और अपने कर्तव्य का बोध। शिक्षा प्राप्ति से यदि मनुष्य राष्ट्रभक्त नहीं होता तो वह शिक्षा नहीं है। उसे केवल अक्षरज्ञान भले ही हम कहें। सही अर्थ में हम समाज को सुशिक्षित करना चाहते हैं। अपनी शाखा के कार्यक्रमों के द्वारा यह होता है। हमें ऐसे स्वयंसेवक मिलते हैं, जो पढ़े लिखे तो नहीं हैं, परंतु सुशिक्षित अवश्य बनते हैं।

‘एक कार्यकर्ता का मुझे स्मरण होता है। ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाला वह स्वयंसेवक 11-12 संघ शाखाओं का संचालन करता था। अपना स्वयं का नाम लिखना भी वह नहीं जानता था, परंतु समाज में प्रत्येक के साथ उसके आत्मीयता के संबंध थे। समाज के प्रति अपने कर्तव्य का बोध कराकर कार्य की प्रेरणा वह अनेक स्वयंसेवकों को देता था। इससे उस क्षेत्र में उस कार्यकर्ता का दबदबा था। उससे बातचीत करके ही उस ग्राम में अन्य सार्वजनिक कार्यक्रम भी करना उचित रहेगा, ऐसा लोगों को लगता था। इतना विश्वासपात्र वह बन गया था। चुनाव के दिनों में नेता लोग उस ग्राम में जाकर भाषण नहीं कर सकते थे। नेता ने लोगों से पूछा। इस कार्यकर्ता  पर, वह अनपढ़ होते हुए भी आप लोग इतना विश्वास करते हो? लोगों ने कहा कि वह भले ही अनपढ़ हो, परंतु हमारे हित की ही सोचता है। उसके कारण गाँव में सब लोग एक हृदय होकर सभी काम करते हैं। उसका चारित्र्य-शील उज्ज्वल है। इसी कारण हमारा उस पर विश्वास है। नेता ने वह सब सुनने के पश्चात इस संघ कार्यकर्ता से बातचीत की। चुनाव से घृणा क्यों करते हो? हमें बोलने देने में आपको क्या कष्ट होंगे, ऐसा पूछने पर उस कार्यकर्ता ने कहा, भाई! चुनाव के भाषणों में आप एक दूसरे के प्रति घृणा की भावना ही तो बोलते हो। जिससे आपसी द्वेष बढ़े, ऐसे भाषणों से गाँव का क्या हित होगा? उसके सीधे परंतु हृदय की शुद्धता से कहे शब्दों को सुनकर उस नेता ने उत्तर न देने में ही अपनी भलाई मान ली और वह वापस लौट गया।’

श्री गुरुजी ने कहा ‘उस कार्यकर्ता का मुझे स्मरण है। कैसा निष्ठावान सच्चरित्र कार्यकर्ता है वह!’

(26 जून 1958, मद्रास)

केवल राष्ट्रभक्ति

पंजाब प्रान्त में प्रवास करते समय सोनीपत में एक युवा स्वयंसेवक ने भावावेश में ‘पूजनीय गुरुजी अमर रहे’, ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अमर रहे’, ऐसे नारे लगा दिए। श्री गुरुजी ने उसी समय रोक कर कहा कि, ‘किसी व्यक्ति या संगठन के बारे मे ऐसी घोषणा (नारे) न करें, क्योंकि कोई भी व्यक्ति हो या संगठन, अमर नहीं है। केवल अपना राष्ट्र ही चिरजीवी है। इसलिये ‘भारत माता की जय’ यही हमारी एकमात्र घोषणा (नारा) रहनी चाहिये। किसी व्यक्ति या संस्था की नहीं।’

  

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