गौ शवों से पट गया था स्वर्ण मंदिर का सरोवरः अब्दाली ने किया 30000 सिखों का नरसंहार, जाने वड्डा घल्लुघारा का इतिहास

वड्डा घल्लुघारा भारतीय इतिहास के सबसे काले और दुःखद अध्यायों में से एक है। 5 फरवरी, 1762 को सिखों को अहमद शाह दुर्रानी उर्फ अहमद शाह अब्दाली के हाथों एक विनाशकारी नरसंहार का सामना करना पड़ा। सिखों को पूरी तरह से समाप्त करने के इस सुनियोजित प्रयास के परिणामस्वरूप हजारों लोगों का कत्लेआम हुआ, जिसने सिख मानस पर एक अमिट घाव छोड़ दिया।

सिखों की बढ़ती शक्ति

18वीं शताब्दी के मध्य तक, दल खालसा के नाम से जाना जाने वाला सिख संघ पंजाब में एक सैन्य और राजनीतिक शक्ति के रूप में विकसित हो चुका था। रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण और संघर्षों से ग्रस्त इस क्षेत्र ने कई शक्तियों को आकर्षित किया, जिनमें पतनशील मुगल साम्राज्य और अहमद शाह दुर्रानी जैसे बाहरी आक्रमणकारी शामिल थे।

दुर्रानी के मार्ग में रुकावट बने सिख

1761 में हुए पानीपत के तीसरे युद्ध के बाद दुर्रानी का ध्यान उत्तरी भारत में अपना नियंत्रण मजबूत करने की ओर दिया। उसका ध्यान सिखों की ओर गया, जो लगातार सशक्त होते जा रहे और गुरिल्ला युद्ध से मुगल एवं अफगानों को चुनौती दे रहे थे। सिख सेनाएं मिसलों (स्वायत्त समूहों) में संगठित हो रही थीं, जिनमें से प्रत्येक का नेतृत्व सरदार जस्सा सिंह अहलूवालिया जैसे शक्तिशाली नेता कर रहे थे। उनकी अपरंपरागत, अचानक हमला करके भागने की रणनीति ने दुर्रानी की आपूर्ति को बाधित कर दिया और पंजाब पर उसका नियंत्रण अस्थिर कर दिया।

मुगलों का कमजोर होना

मुगल साम्राज्य के कमजोर होने के कारण सिखों ने सत्ता के शून्य को भरना शुरू दिया और पंजाब के रक्षक के रूप में खुद को स्थापित कर लिया। इसी कारण लिख दुर्रानी की आंखों की किरकिरी बन गए। सिखों से उत्पन्न खतरे को भांपते हुए दुर्रानी ने उनके प्रतिरोध को कुचलने और क्षेत्र में उनके बढ़ते प्रभाव को समाप्त करने के लिए एक निर्णायक हमले की योजना बनाई। मुगलों के पतन और अफगान आक्रमणों की पृष्ठभूमि में पनपा यह संघर्ष जल्द ही विनाशकारी वड्डा घल्लुघारा में परिणित हुआ, जहां दुर्रानी ने सिखों को सैन्य और जनसांख्यिकीय दोनों रूप से समाप्त करने का प्रयास किया।

सिखों का पलायन और अपनों का विश्वासघात

सन् 1762 की शुरुआत में, जब अहमद शाह दुर्रानी एक और आक्रमण की तैयारी कर रहा था, तब पंजाब के मलेरकोटला के पास लगभग 40,000 सिख, जिनमें महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग शामिल थे, एकत्रित हुए। अफगानों से पैदा खतरों के चलते सिखों ने बच्चों, महिलाओं, वृद्धों और जो लड़ नहीं सकते उनको बीकानेर की ओर भेजना शुरू कर दिया। उनकी योजना का भंडाफोड़ जंडयाला के सिख महंत अकील दास ने कर दिया। अकील दास ने सिखों की गतिविधियों की जानकारी दुर्रानी को दी। बताते हैं कि वह सिख होते हुए भी पंजाब में अफगानों के गुप्तचर की तरह काम करता था। अवसर देखकर दुर्रानी ने तुरंत लगभग 30,000 सैनिकों को जुटाया और सरहिंद के मुगल गवर्नर जैन खान सरहिंदी और मलेरकोटला के भीखन खान के साथ गठजोड़ कर लिया। इन स्वदेशी शासकों ने दुर्रानी का साथ इसलिए दिया क्योंकि वे भी सिखों के बढ़ते प्रभाव को अपने शासन के लिए खतरा मानते थे।

कुप रोहिड़ों का युद्ध

5 फरवरी, 1762 को पंजाब में कुप रोहिड़ां गाँव के पास अहमद शाह दुर्रानी के नेतृत्व वाली भारी हथियारों से लैस अफगान सेना व स्थानीय मुस्लिम रियासतों की सेना ने सिखों पर हमला कर दिया। जस्सा सिंह अहलूवालिया के नेतृत्व में सिखों ने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद बहादुरी से लड़ाई लड़ी, लेकिन वे काफी कमजोर स्थिति में थे। एक तो सैनिकों की कमी थी, उनके पास अफगान घुड़सवार सेना का मुकाबला करने के लिए आवश्यक संसाधनों का अभाव था।

नरसंहार में मारे गए हजारों

दुर्रानी की सेनाओं ने एक सुनियोजित और क्रूर हमला किया, जिसके परिणामस्वरूप नरसंहार हुआ। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों सहित 20,000 से 30,000 सिख मारे गए। बताया जाता है कि युद्धक्षेत्र के आसपास की नदियाँ खून से लाल हो गई। गांव के गांव और गलियां लाशों से पट गईं। जिन सिखों को बंदी बनाया गया उनका सार्वजनिक तौर पर अपमान किया गया। हालांकि अहलुवालिया और कुछ अन्य नेता बच गए, लेकिन नुकसान बहुत बड़ा था।

सिख पराजित हुए पर हार नहीं मानी

इन विनाशकारी नुकसानों के बावजूद सिखों ने हार नहीं मानी। इस नरसंहार ने सिख इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ ला दिया, जहाँ अस्तित्व के लिए लडने का उनका संकल्प और भी मजबूत हो गया। वड्डा घल्लुघारा ने दमनकारी शक्तियों का निरंतर प्रतिरोध करने के उनके दृढ़ संकल्प को और भी पुख्ता कर दिया, और दबने के बजाय, वे और भी अधिक एकजुट और लचीले होकर उभरे, तथा नए जोश के साथ भविष्य की लड़ाइयों के लिए तैयार हो गए।

पवित्र बीड़ की सुरक्षा

गुरु गोविंद सिंह ने दमदमा साहिब में गुरु ग्रंथ साहिब की पाँच प्रतियाँ (बीड़) लिखवाई और उन्हें विभिन्न सिख समूहों को सौंप दिया। इस भयंकर हत्याकांड के बावजूद बाबा सुधा सिंह ने चमत्कारिक रूप से पवित्र ग्रंथ को बचा कर कुथला गाँव ले आए। तब से उस बीड़ को गांव के गुरुद्वारे में सुरक्षित रखा गया है, जो सिख समुदाय के लिए भक्ति और आध्यात्मिक दृढ़ता का एक शक्तिशाली प्रतीक है।

अब्दाली द्वारा स्वर्ण मंदिर का अपमान

अहमद शाह दुर्रानी के अत्याचार युद्धक्षेत्रों तक ही सीमित नहीं थे। 1757 में, वड्डा घल्लुघारा से पाँच वर्ष पूर्व, दुर्रानी की सेना ने सिखों के सबसे पवित्र स्थल स्वर्ण मंदिर पर हमला किया। उसके सैनिकों ने गायों के शवों से सरोवर को भरकर उसे अपवित्र कर दिया। सिख धर्म पर इस हमले से व्यापक आक्रोश फैल गया और दुर्रानी के प्रति सिख समुदाय की घृणा और गहरी हो गई। स्वर्ण मंदिर के अपमान की घटना ने सिख समुदाय के मनों पर गहरा मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक घाव छोड़ा। सिखों के लिए, हरमंदिर साहिब केवल एक धार्मिक संरचना नहीं बल्कि उनकी पहचान का आध्यात्मिक आधार है। दुर्रानी की सेनाओं द्वारा इसका अपमान सिखों के अस्तित्व पर सीधा हमला माना गया, जिससे उनके धर्म और पहचान की रक्षा करने का संकल्प और भी मजबूत हो गया।

वड्डा घल्लुघारा में भारी नुकसान के बावजूद सिखों का मनोबल टूटा नहीं। इस नरसंहार और हरमंदिर साहिब के अपमान ने उनके पुनरुत्थान में उत्प्रेरक का काम किया। सिख मिसलों के नेतृत्व में सिखों ने शीघ्र ही एकजुट होकर अपने उत्पीडक्लों के विरुद्ध जवाबी हमले किए। बाबा दीप सिंह की शहादत ने सिखों को लगातार प्रेरित किया और उनके पवित्र स्थलों की रक्षा करने के उनके संकल्प को और मजबूत किया। जस्सा सिंह अहलूवालिया और अन्य मिसलदारों जैसे नेताओं ने सिख सेनाओं के पुनर्गठन, खोए हुए क्षेत्रों को पुनः प्राप्त करने और समुदाय के अस्तित्व को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सिख मिसलों ने मुगल और अफगान शासकों से भूमि वापस लेने के लिए मिलकर काम किया, रणनीतिक हमले किए और अपनी मातृभूमि की रक्षा की।

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