1946 के सैन्य विद्रोह से कांप गई ब्रिटिश सत्ता
80 वर्ष पूर्व 1946 में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध हुआ सैन्य विद्रोह स्वाधीनता संग्राम का अंतिम युद्ध माना जाता है। सेना व पुलिस के बल पर ही अंग्रेज शासन करते थे और उनके बल पर ही 1857 के सशस्त्र स्वाधीनता संग्राम, 1920-22 के असहयोग आंदोलन एवं 1942-43 के ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन’ के बाद भी सत्ता में बने रहे थे। वर्ष 1946 में उन्हीं सैन्य बलों व पुलिस में विद्रोह पर अंग्रेजों ने तत्काल यहां से जाने में ही भलाई समझी। तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने मध्य 1946 में ही निर्णय कर 30 जून, 1948 तक भारत को स्वाधीन करने की 20 फरवरी, 1947 को घोषणा (ब्रिटिश संसद में) कर दी थी। लेकिन सैन्य बलों के विद्रोह व अवज्ञा की स्थिति देख उन्हें लगा कि वे देश में 1947 के अंत तक भी सुरक्षित नहीं रह पाएंगे।
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने तो 30 जून, 1948 तक सत्ता हस्तांतरण करने के प्रस्ताव पर कह दिया था, “तब तक शक्ति बचेगी ही नहीं तो आप हस्तांतरण क्या करेंगे?” तब हड़बड़ा कर माउण्टबेटन ने 3 जून, 1947 को ही घोषणा की, “अंग्रेज 14/15 अगस्त की मध्य रात्रि में ही देश छोड़ कर चले जाएंगे।” वस्तुतः सैन्य विद्रोहों के चलते विभाजन की रेडक्लिफ लाइन के गजट नोटिफिकेशन तक भी रुकना सुरक्षित नहीं माना। उन्हें डर था कि विलंब करने पर सत्ता आजाद हिंद सरकार के हाथ में चली जाएगी। उन्हें लगा कि सत्ता कांग्रेस व मुस्लिम लीग को हस्तांतरित करने पर ही स्वतंत्र भारत और पाकिस्तान को ब्रिटिश कॉमनवेल्थ का सदस्य बनाए रखा जा सकेगा।
सैन्य क्रांतियां
रॉयल एयर फोर्स के सैनिकों ने 22 जनवरी, 1946 को देश भर में अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन आरंभ कर दिया, इसके बाद 18 फरवरी, 1946 को नौसेना और 26 फरवरी से थल सेना में भी अंग्रेज विरोधी आंदोलन शुरू हो गया। आजाद हिंद सेना के सैनिकों व अधिकारियों पर चलाए जा रहे मुकदमों के विरोध के साथ ही वेतन में विभेद और भोजन की गुणवत्ता जैसे कई मुद्दे आंदोलन से जुड़ते चले गए। बहुत बड़ी संख्या में तीनों सैन्य बलों के भारतीय सैनिकों ने अंग्रेज अधिकारियों की अवज्ञा आरंभ कर दी थी। सैन्य बलों के विरुद्ध कहीं-कहीं पुलिस बलों को तैनात करने पर पुलिस बलों ने भी अंग्रेज सरकार के आदेश मानने से इनकार कर दिया। इन सैन्य क्रांतियों को स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की मुख्य-धारा से बाहर रखना अनुचित है।
रॉयल एयर फोर्स म्यूजियम के अनुसार रॉयल एयर फोर्स की अंग्रेज विरोधी हड़तालें 22 जनवरी, 1946 से प्रारंभ हो गई थीं। भारतीय वायु सैन्य-कर्मियों द्वारा ब्रिटिश अधिकारियों व सरकार के आदेशों की अवहेलना कर देने की प्रारंभिक घटनाओं का एयर फोर्स म्यूजियम में बलवा या गदर अर्थात् म्युटिनी के रूप में वर्णन किया गया है। इन विवरणों के अनुसार 22 जनवरी, 1946 को मारीपुर व कराची (द्रिघ रोड) से आरंभ होकर यह विद्रोह रॉयल एयर फोर्स के 60 केंद्रों पर 50,000 वायु-सैनिकों तक फैल गया। बेन ग्लिनेकी द्वारा संकलित ‘वर्ल्ड वार द्वितीय : फ्रोम वार टू रिवॉल्युशन’ के अनुसार इसका प्रभाव श्रीलंका, बर्मा तक के भारतीय वायु-सैनिकों में भी देखा गया था। बाद के डीक्लासीफाइड अभिलेखों के अनुसार, “भारतीय सैन्य बलों में इस क्रांति के तेजी से फैलने की संभावनाएं देखते हुए ब्रिटिश ट्रूप्स को यहां भारत में ही रोकना पड़ा था।”
इस तथ्य को चाइल्ड्स डेविड ने रौटलेज से प्रकाशित पुस्तक ‘ब्रिटेन सिन्स 1945 : ए पॉलिटिकल हिस्ट्री’ में स्पष्ट लिखा है। इस क्रांति में संलग्न कुछ वायु सैनिकों का तब कोर्ट-मार्शल भी किया गया। लेकिन इसके बाद यह क्रांति एयर फोर्स के साथ ही 18 फरवरी से रॉयल इंडियन नेवी में भी आग की तरह फैल गई। जल सेना के 88 में से 78 युद्ध पोतों और जल सेना के कराची से कलकत्ता तक अधिकांश स्थलीय प्रतिष्ठानों में स्वाधीनता संग्राम के फैल जाने पर फील्ड मार्शल ने 24 फरवरी, 1946 को प्रधानमंत्री एटली को भेजी अपनी टेलीग्राम क्रमांक ‘एल/पी.ओ/4/28 : एफ एफ 66-7’ में लिखा था कि आज की स्थिति (जहां तीनों सैन्य बलों ने विद्रोह कर दिया है) यह स्थिति वायुसेना में व्यापक रूप से फैले आंदोलन के परिणाम-स्वरूप बनी है।
नौ सैनिक विद्रोह
वायु सेना के विद्रोह के बाद 18 फरवरी, 1946 को नौ सेना ने भी अंग्रेज सरकार के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। यह ‘1946 का नौ सैनिकों का विद्रोह’, ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भारतीय सशस्त्र बलों का एक बड़ा विद्रोह था। यह विद्रोह तेजी से पूरे भारत में 78 से ज्यादा जहाजों और तटीय प्रतिष्ठानों तक फैल गया, जिसमें 20,000 से ज्यादा नाविक सम्मिलित थे। इस महत्वपूर्ण घटना को ‘भारतीय स्वतंत्रता का अंतिम युद्ध’ भी कहा जाता है।
नौ सेना सहित सेना के सभी अंगों व पुलिस बलों सहित जनता के विद्रोह के कारण ब्रिटिश सरकार हिल गई थी। यह नौ सैनिक विद्रोह एक उग्र सामूहिक कार्रवाई थी, जिसका नेतृत्व एचएमआईएस तलवार के बालचंद दत्त ने किया था। पूर्वी कमान में कमांडिंग ऑफिसर फ्रांसिस टुकर के अनुसार, “ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ असंतोष नौकरशाही और पुलिस बल के साथ-साथ स्वयं सशस्त्र बलों में भी तेजी से बढ़ रहा था। हड़ताली नौ सैनिकों ने तटीय प्रतिष्ठानों को भी अपने नियंत्रण में ले लिया था।”
थल सेना में विद्रोह
वायु सैनिकों व नौ सैनिकों के बाद फरवरी 26 से 3 मार्च के बीच जबलपुर, मद्रास व पुणे आदि कई स्थानों पर थल सेना के नॉन कमीशंड अधिकारियों ने विद्रोह कर दिया था। जबलपुर में सिग्नल्स प्रशिक्षण केंद्र पर 26 फरवरी को 120 सैनिकों ने शुरुआत की और सायंकाल तक विद्रोही सैनिकों की संख्या 1700 हो गई। मद्रास में आबादी में स्थानीय जनता भी सैनिकों के साथ हो गई थी। पूरा मद्रास बंद हो गया। ऐसे ही सैन्य बलों के विद्रोह के साथ कई स्थानों पर जनता भी बंद में भागीदार होने लगी थी।
सैन्य बलों के विद्रोह के बाद लगने लगा कि भारत में अंग्रेज शासन मध्य 1947 के बाद रह पाएगा क्या? यह स्पष्ट लगने लगा था कि 30 जून, 1948 तक भारत में अंग्रेजी राज कदाचित ही टिक पाएगा। इसलिए अंग्रेज सरकार ने कांग्रेस के सहयोग से बातचीत कर सैन्य विद्रोह को शांत करने का प्रयास किया। लेबर पार्टी के प्रधानमंत्री एटली ने कांग्रेस में वामपंथी नेता व इंग्लैण्ड की लेबर पार्टी के भी सदस्य रहे, जवाहर लाल नेहरू के मित्र कृष्णा मेनन को केंद्र बनाकर बातचीत आरंभ की। बातचीत में अचानक जवाहरलाल नेहरू के मित्र रहे माण्टबेटन को गवर्नर जनरल बनाने का प्रस्ताव आया। माउण्टबेटन इसके लिए तैयार नहीं थे।
तब क्राउन प्रिन्स ने उन्हें मनाया। माउण्टबेटन ने भी 20 फरवरी, 1947 की क्लीमेण्ट एटली की 30 जून, 1948 को आजादी की घोषणा को निरस्त कर 3 जून, 1947 को देश के विभाजन के साथ 14/15 अगस्त, 1947 को स्वाधीनता देने की योजना घोषित की। माउण्टबेटन को लग रहा था कि 31 अगस्त तक भी भारत में टिके रहना कठिन है। विभाजन रेखा पर कौन से जिले भारत में व कौन से जिले पाकिस्तान में जाएंगे, इसकी रेडक्लिफ लाइन की 17 अगस्त के नोटिफिकेशन की प्रतीक्षा करना भी उन्हें संभव नहीं लगा। हिन्दू-बहुल जिले जैसे- चटगांव, जिसमें 97.5 प्रतिशत हिन्दू व खुलना जिला, जिसमें 52 प्रतिशत हिन्दू थे, वे भी पाकिस्तान में चले गए। उस आपाधापी में महात्मा गांधी व नेहरू भी कुछ कर नहीं पाए थे।
हिन्दू महासभा ने ऐसे कई मुद्दों पर दबाव बनाया था। लेकिन हिन्दू महासभा ने आंदोलनरत सैन्य बलों को मनाने में सरकार की कोई सहायता नहीं की थी। इसलिए अंग्रेज सरकार ने मुस्लिम लीग व कांग्रेस से ही सत्ता हस्तांतरण के लिए बातचीत की। हिन्दू महासभा को अपने अनुकूल न पाकर उसे दूर रखा। हिन्दू महासभा तब धरातल पर अत्यंत शक्तिशाली संगठन था। उसने पूरा पंजाब व पूरा बंगाल पाकिस्तान को देने से सरकार को रोका था। हिन्दू महासभा के आर-पार के संघर्ष के बाद ही 20 जून, 1947 को ही बंगाल विधानसभा में मतदान करा कर पश्चिम बंगाल को भारत में रखने को अंग्रेज सरकार बाध्य हुई थी।
सैन्य विद्रोह को शांत करने में कांग्रेस की बड़ी भूमिका
झूठे आश्वासन : इस विद्रोह की भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने निंदा भी की थी। लेकिन इस सैन्य क्रांति को जनता का पर्याप्त समर्थन मिला था। यूरोप सॉलिडेयर सैंस फ्रंटियर्स के अनुसार, ”बॉम्बे जैसे शहरों में मजदूरों ने नाविकों के साथ मिलकर विरोध प्रदर्शन किया और कई नागरिकों ने विद्रोहियों को सहायता, भोजन और आश्रय प्रदान किया था, जिससे इसके प्रति व्यापक जन एकजुटता प्रदर्शित हुई।” भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने भारतीय सैन्यबलों को आत्मसमर्पण करने के लिए राजी किया। यदि सशस्त्र विद्रोह लंबा चलता तो सत्ता का हस्तांतरण राजनीतिक नेतृत्व के स्थान पर आजाद हिंद सरकार, जिसकी स्थापना नेताजी ने की थी और उसे 9 देशों से मान्यता भी मिली थी, को भी हो सकता था।
नौसेना की केंद्रीय हड़ताल समिति (एनसीएससी) के अध्यक्ष एमएस खान और कांग्रेस के वल्लभभाई पटेल के बीच हुई बैठक के बाद विद्रोह को समाप्त कर दिया गया, जिसमें यह आश्वासन दिया गया कि किसी पर भी अत्याचार नहीं किया जाएगा। इस पर सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया, लेकिन आश्वासनों के विरुद्ध नौसेनिकों के दल को गिरफ्तार कर कई महीने शिविरों में दयनीय परिस्थितियों में रखा गया। इसके बाद भी गिरफ्तारियां हुईं, फिर कोर्ट-मार्शल चलाए गए और रॉयल इंडियन नेवी से 476 नाविकों को बर्खास्त कर दिया गया। स्वतंत्रता के बाद भी बर्खास्त किए गए कई सैनिकों को भारतीय या पाकिस्तानी नौसेना में बहाल नहीं किया गया। इसमें कई को सेना की पेंशन भी नहीं मिली। स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन भी नहीं मिली। महात्मा गांधी ने भी इस सैन्य विद्रोह की निंदा की थी। उन्होंने 3 मार्च, 1946 को दिए अपने बयान में हड़तालियों की आलोचना करते हुए कहा था, “उन्होंने किसी ‘विद्यमान दल’ के आह्वान के बिना और ‘अपनी पसंद के राजनीतिक नेताओं’ के ‘मार्गदर्शन और हस्तक्षेप’ के बिना विद्रोह किया है।”
स्वतंत्रता के बाद नौसेना को भारत व पाकिस्तान के लिए दो भागों में विभाजित किया गया, लेकिन ब्रिटिश अधिकारी ही दोनों नौ सेनाओं में अधिकारी के पदों पर बने रहे। वाइस एडमिरल विलियम एडवर्ड पैरी ही भारतीय नौसेना के कमान अधिकारी बने रहे। उन्होंने किसी भी बर्खास्त नाविक को क्षमादान नहीं दिया और न ही किसी को नौसेना में बहाल किया। प्रधानमंत्री नेहरू का पूरा मंत्रिमंडल बन जाने के बाद भी 21 जून, 1948 तक गवर्नर जनरल माउण्टबेटन को ही बनाए रखा गया।
1967 में स्वतंत्रता की 20वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित एक संगोष्ठी में तत्कालीन ब्रिटिश उच्चायुक्त जॉन फ्रीमैन ने भी खुलासा किया था कि 1946 के विद्रोह ने द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लेने वाले 25 लाख भारतीय सैनिकों के बीच 1857 के भारतीय विद्रोह जैसे एक और बड़े विद्रोह की आशंका पैदा कर दी थी। इसलिए अंग्रेज सरकार का इस क्रांति के बाद रुकना असंभव था। ब्रिटेन में सभी को यह स्पष्ट था कि अंग्रेजों के जाने में 1946 की सैन्य क्रांति प्रमुख कारण थी। बाद में जब क्लेमेण्ट एटली 1956 में भारत आए, तब उन्होंने कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश व बंगाल के कार्यवाहक राज्यपाल न्यायमूर्ति पी.वी. चक्रवर्ती के सम्मुख यह स्वीकार किया कि उन्हें मुख्यतः आजाद हिंद सेना व सैन्य क्रांति के कारण ही 1947 में भारत से पलायन को विवश होना पड़ा था।