कानपुर, 25 अगस्त 2026।
छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर के वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई सभागार में मंगलवार को ‘युवा संवाद’ कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आम्बेकर जी मुख्य वक्ता के रूप में विद्यार्थियों द्वारा भारत की सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता से जुड़े प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा कि, भारत की विविधता ही उसकी शक्ति है। उन्होंने कहा कि संघ का मूल कार्य समाज में अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत के प्रति आई विस्मृति को दूर करना है। हमारी भाषाएं, परंपराएं और पूजा-पद्धतियां भिन्न हो सकती हैं, लेकिन हम सभी एक ही सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा हैं।
उन्होंने कहा कि भारतीय परम्पराएँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता में बाधक नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। युवाओं को बाइनरी सोच से बाहर निकलकर व्यापक दृष्टि विकसित करनी चाहिए। हिन्दुत्व का मूल तत्व एकता, साथ-साथ रहने और सह-अस्तित्व की भावना है। त्याग, समर्पण और सेवा जैसे मूल्य समाज को जोड़ने का कार्य करते हैं।

• AI के दौर में विवेक ही मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति ~
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और रोजगार को लेकर विद्यार्थियों की आशंकाओं पर आम्बेकर जी ने कहा कि, मनुष्य का विवेक उसकी सबसे बड़ी ताकत है, जिसे कोई मशीन प्रतिस्थापित नहीं कर सकती। AI सूचनाएँ उपलब्ध करा सकता है और उनका तीव्र गति से प्रसंस्करण कर सकता है, लेकिन किस परिस्थिति में क्या करना है और कौन-सा निर्णय समाज तथा समग्र मानव कल्याण के अनुकूल होगा, इसका निर्धारण मनुष्य अपने विवेक से करता है।
आम्बेकर जी ने कहा , तकनीक का स्वरूप कैसा हो और हमें किस प्रकार का जीवन जीना है, इसका निर्णय समाज को स्वयं करना होगा। इसके लिए युवाओं को सबसे पहले स्वयं को पहचानने की आवश्यकता है, ताकि वे तकनीक का उपयोग अपनी आवश्यकताओं और सामाजिक हित के अनुरूप कर सकें।

• सेवा और स्वावलम्बन के लिए युवाओं को आगे आने का आह्वान ~
आम्बेकर जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े विभिन्न सेवा प्रकल्पों की जानकारी देते हुए दिव्यांगजन सशक्तिकरण के लिए ‘सक्षम’, शिक्षा के क्षेत्र में ‘विद्या भारती’ तथा सुदूर क्षेत्रों में शिक्षा के प्रसार के लिए ‘एकल विद्यालय’ जैसे प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने ‘स्वावलंबी भारत अभियान’ के माध्यम से युवाओं को स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने की चर्चा भी की।
उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे केवल एक डिग्री तक सीमित न रहें, बल्कि कम से कम दो-तीन नए कौशल अवश्य सीखें। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति में पाठ्येतर गतिविधियों को भी शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया गया है। शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को माध्यमिक स्रोतों पर निर्भर रहने के बजाय प्राथमिक एवं मूल स्रोतों का अध्ययन करना चाहिए।
• महिला सुरक्षा के लिए सामाजिक वातावरण में बदलाव जरूरी ~
महिला सुरक्षा से जुड़े प्रश्न पर आम्बेकर जी ने कहा कि बदलाव की शुरुआत स्वयं से होनी चाहिए। विश्वविद्यालय और उसके आसपास ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास होना चाहिए, जहां महिलाएं स्वयं को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करें। केवल कानून और नियमों से स्थायी परिवर्तन संभव नहीं है; इसके लिए परिवार और समाज में सकारात्मक मानसिकता एवं सामाजिक दायित्व का वातावरण विकसित करना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक परिवार में सुरक्षा, सम्मान और अच्छे व्यवहार को लेकर संवाद होना चाहिए। बच्चों के साथ बचपन से ऐसा वातावरण तैयार किया जाना चाहिए, जिसमें वे बिना संकोच अपनी बात कह सकें। लोकतंत्र में असहमति को स्वाभाविक बताते हुए उन्होंने कहा कि विरोध हमेशा शांतिपूर्ण होना चाहिए। किसी निर्णय तक पहुंचने के लिए संवाद और सर्वसम्मति सबसे प्रभावी माध्यम हैं।
कार्यक्रम की शुरुआत में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक जी ने विद्यार्थियों को ‘लेजर लाइट और टॉर्च’ का उदाहरण देते हुए जीवन में एकाग्रता और स्पष्ट दिशा बनाए रखने का संदेश दिया। उन्होंने अपने जापान प्रवास के अनुभव भी साझा किए और पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी जी की पंक्तियों के साथ अपने संबोधन का समापन किया।
इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत संघचालक भवानीभीख जी, प्रांत प्रचारक श्रीराम जी, प्रांत प्रचार प्रमुख डॉ. अनुपम जी, विभाग प्रचारक बैरिस्टर जी सहित विश्वविद्यालय के बड़ी संख्या में शिक्षक एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।