समीक्षा : धुरंधर द रिवेंज – कुछ लोगों का धुआं निकलने वाला है

समीक्षा : धुरंधर द रिवेंज – कुछ लोगों का धुआं निकलने वाला है

‘धुरंधर’ सवा सात घंटे की  फिल्म है। जिसका साढ़े तीन घंटे का हिस्सा 05 दिसंबर, 2025 को आया था और अब पौने चार घंटे का पार्ट रिलीज़ हुआ है। जिसका नाम ‘धुरंधर द रिवेंज’ (Dhurandhar – The Revenge) है। ‘रिवेंज’ यानी बदला। कह सकते हैं कि ‘धुरंधर’ इंटरवल से पहले की फिल्म थी, जिसमें भारत का एक एजेंट पाकिस्तान के सिस्टम में घुस रहा था और भारत को दिए जा रहे ज़ख्मों का हिसाब इक्ट्ठा कर रहा था। अब इंटरवल के बाद की फिल्म ‘धुरंधर द रिवेंज’ में वह एजेंट हिसाब चुकता कर रहा है, ज़ख्म दे रहा है।

…..यदि आपने पिछली वाली ‘धुरंधर’ नहीं देखी है तो न तो आपको ‘धुरंधर द रिवेंज’ (Dhurandhar – The Revenge) देखनी चाहिए और न ही यह रिव्यू आगे पढ़ना चाहिए। कुछ समझ ही नहीं आएगा……।

‘धुरंधर’ के अंत में रहमान डकैत की मौत के बाद अब लयारी, कराची और पाकिस्तान की फिज़ा बदल रही है। लयारी पर कब्ज़े के लिए बलोच और पठान गैंग आपस में लड़ रहे हैं तो वहीं आज़ादी मांग रहे बलोचों और पाकिस्तानी हुकूमत के बीच तनातनी है। पाकिस्तान की राजनीति में उठा-पटक मची हुई है। उधर, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. हमेशा की तरफ भारत में दहशतगर्दी को हवा दे रही है। इस काम में वहां के बरगलाए हुए युवक तो शामिल हैं ही, भारत में बैठे लोग भी उनकी मदद कर रहे हैं। इस सारी आपाधापी के बीच 2014 आ चुका है। इधर भारत में सत्ता बदल चुकी है और इस बदलाव का असर पाकिस्तान में भी दिखने लगा है।

‘धुरंधर’ की स्क्रिप्ट-राईटिंग अद्भुत है। एक साथ कई ट्रैक्स पर चलते कहानी के विभिन्न हिस्से, किस्म-किस्म के किरदार लेकिन कोई झोल नहीं, कोई लचक नहीं। ज़्यादातर किरदारों का असल लोगों पर आधारित होना फिल्म के तेवर को और तीखा बनाता है। संवाद मारक हैं, असरदार और सामयिक भी। सच्ची घटनाओं को कहानी में पिरो कर तथ्यों और कल्पना का जो अद्भुत मेल आदित्य धर ने किया है, उसके लिए उनकी लिखाई की न सिर्फ तारीफ होनी चाहिए, बल्कि सिनेमा के स्कूलों में पटकथा लेखन की बारीकियां सिखाने वालों को ‘धुरंधर’ की स्क्रिप्ट बार-बार पढ़ानी चाहिए। इस ऊंचे स्तर का रिसर्च हिन्दी के मसाला सिनेमा में कहां होता है भला।

‘धुरंधर’ (Dhurandhar – The Revenge) बहुत सारी कड़वी सच्चाइयों को भी सामने लाती है। पंजाब के एक गांव के दबंगों द्वारा दलित सिक्ख परिवार को तबाह करने के बाद फौज में जाने की तैयारी कर रहा परिवार का लड़का जसकीरत सिंह रंगी बगावत कर बैठता है। यह सीक्वेंस पंजाब के उस सामाजिक समीकरण को सामने लाता है, जिस पर मुख्यधारा की फिल्मों या मीडिया में कभी बात ही नहीं होती। हमारे खुशहाल पंजाब को नशे की मंडी बनाने के तौर-तरीकों का भी ज़िक्र यह फिल्म करती है। पूरब के रास्ते आ रहे हथियारों, ड्रग्स और नकली नोटों को हमारे ही देश के कुछ ‘बड़े नाम वाले’ लोगों द्वारा देश भर में फैलाने के जाल की बात भी होती है।

पिछली वाली ‘धुरंधर’ में पर्दे पर जब भारत की छाती पर लगने वाले ज़ख्मों के सीन आते हैं तो आप पसीजती हथेलियां मलने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। अब इस वाली ‘धुरंधर’ (Dhurandhar – The Revenge) में उन ज़ख्मों को देने वालों में शामिल अपनों के दीदार होते हैं और जब एक-एक कर के इधर-उधर उन लोगों का खात्मा होने लगता है तो सुकून मिलता है। अखबारी खबरें हमें बता ही रही हैं कि इधर कुछ साल से थोड़े-थोड़े समय बाद पाकिस्तान में (और दूसरे मुल्कों में भी) कभी भारत को ज़ख्म दे चुके लोगों को अचानक कोई ‘अनजान’ आकर मार देता है। ‘धुरंधर’ में जब इन ‘अनजान’ लोगों के सीन आते हैं तो दर्शक-मन प्रसन्न होता है। कभी ‘गूदे भर का ज़ोर लगा लो और बिगाड़ लो जो बिगाड़ सकते हो’ कहने वालों का भारत क्या हश्र कर सकता है, यह देख कर मुट्ठियां भिंचती हैं और ऐसे मौके  फिल्म में एक बार नहीं, कई बार आते हैं।

फिल्म तकनीकी तौर पर बेहद उन्नत है। कैमरा तो जैसे आपको सम्मोहित कर देता है। फिल्म शुरू होते ही आप पर्दे के और पर्दा आपका हो जाता है। लोकेशन, सैट्स, स्पेशल इफैक्ट्स बेहद प्रभावी हैं। रंगों, पोशाकों और मेकअप का बेहद सलीके से इस्तेमाल किया गया है। बैकग्राउंड म्यूज़िक और गाने फिल्म की जान बढ़ा देते हैं। पौने चार घंटे की फिल्म और पलकें तक झपकाने का मन न करे तो भला क्यों न उसे बनाने वाले डायरेक्टर की तारीफ हो।

एक्टिंग के मामले में हर कोई उम्दा रहा है। किरदार छोटा हो या बड़ा, कलाकारों ने अपनी तरफ से कमी नहीं आने दी है। रणवीर सिंह, संजय दत्त, अर्जुन रामपाल, आर. माधवन, मानव गोहिल, गौरव गेरा, दानिश पंडोर आदि खूब जंचे हैं। सारा अर्जुन इस बार कम दिखीं, सशक्त दिखीं। राकेश बेदी पिछली बार की तरह बेमिसाल रहे। इस बार आतिफ अहमद बने सलीम सिद्दिकी, मेजर इकबाल के पिता बने सुविंदर विकी, पल भर को आईं यामी गौतम धर, जसकीरत की मां बनीं मधुरजीत सरगी जैसे कलाकार फिल्म को सजीवता प्रदान कर गए।

आखिरी के कुछ मिनटों में कई सारे ट्विस्ट आकर जब कहानी की परतों को खोल कर आपके सवालों के जवाब देते हैं तो दर्शक-मन न सिर्फ शांत होता है, बल्कि उसे तसल्ली के साथ-साथ खुशी भी मिलती है। अक्सर विषाक्त मनोरंजन परोसने का आरोप झेलने वाला मसाला सिनेमा यदि यह खुशी दे पा रहा है तो यह इसकी जीत है। और हां, पिछली बार की तरह इस बार भी कुछ लोगों का धुआं निकलने वाला है, बड़े ज़ोर से। एक बात और, यह फिल्म इस बात को भी अंडरलाइन करती है कि ‘हमारी लड़ाई पाकिस्तान से नहीं, वहां के दहशतगर्दों से है’, कोई समझना चाहे तो।

इस बार की ‘धुरंधर’ (Dhurandhar – The Revenge) में गालियां काफी ज़्यादा हैं और अश्लील भी। इनसे बचा जाता तो भी यह फिल्म इतनी ही प्रभावी बनती। दो एक्शन-सीक्वेंस काफी लंबे हैं, उन्हें छोटा किया जा सकता है। वीभत्स हिंसा इस बार भी काफी है। दो-तीन सीक्वेंस कुछ ज़्यादा ही ‘फिल्मी’ लगे। लेकिन फिल्म की कसावट और तेज़ गति हमें इन बातों में उलझने नहीं देती।

यह आपको भिगोती भी है। हमज़ा और आलम के बीच का एक सीक्वेंस 1994 में आई गोविंद निहलानी की ‘द्रोहकाल’ की याद दिलाता है तो आंखें भीगती हैं और सीने में हूक-सी उठती है। जसकीरत का अपने अतीत को जला कर नई ज़िम्मेदारी लेना, वहां जाकर एक नया संसार बनाना और अंत में…! रिव्यू में कहानी की परतें नहीं खोली जातीं, इसलिए एक बार फिर यही कहूंगा कि यह फिल्म उन अनजान लोगों को सलाम करती है जो बेखुद होकर वतन की खातिर अपना सर्वस्व बलिदान कर देते हैं और हम उनका नाम जानना तो दूर, अहसान तक नहीं मानते।

दीपक दुआ

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