कुबेरनाथ राय : भारतीय चिंतन धारा के प्रमुख हस्ताक्षर
एक दिन पूज्य पिताजी जब सोये रहेंगे, उनके सिरहाने से ..फटी दीमक लगी किताब निकाल लाऊँगा और आग लगाकर फूँक दूंगा। ..तब हिन्दू धर्म के लिए एक नई पोथी लिखनी पड़ेगी…उस नई किताब को मैं लिखूंगा, और जो-जो मन में आयेगा, सो लिखूंगा। आखिर मेरी बात भी तो कभी आनी चाहिए, कि आजीवन मैं ‘हाँ,कहारी हाँ’ का ठेका ही पीछे से भरता रहूँगा।” ये कहना था “आधुनिक भारत के ब्रह्मर्षि” माने जाने वाले कुबेरनाथ राय जी का।
हिन्दी साहित्य की आधुनिक विधा ललित निबन्ध के प्रमुख हस्ताक्षर कुबेरनाथ राय ने अपने निबन्धों के माध्यम से भारतीय संस्कृति, परम्परा और चिंतन के विविध आयामों की गहरी और विशिष्ट व्याख्या की। अपने जीवनकाल में उन्होंने तीन सौ से अधिक निबन्ध लिखे, जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए और साहित्य-जगत में अत्यधिक सराहे गए। इनका जन्म 26 मार्च 1933 को गाजीपुर जिले के मतसा गाँव में एक कृषक भूमिहार परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम बैकुंठ नारायण राय और माता का नाम लक्ष्मी राय था। उनकी आरम्भिक शिक्षा गाँव के विद्यालय में हुई, फिर वह उच्च शिक्षा के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और कलकत्ता विश्वविद्यालय गए। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से अँग्रेज़ी विषय में एम.ए की परीक्षा उत्तीर्ण की। अल्पायु में ही उनका विवाह हो गया था। शिक्षा पूरी कर पहले वह कलकत्ता के विक्रम विद्यालय में अध्यापक का कार्य करने लगे, फिर सन् 1959 में असम के नलबारी कॉलेज में प्राध्यापक के रूप में नियुक्त हुए। यहाँ वह 27-28 वर्षों तक रहे, फिर जब असम में अशांति फैली तो गाज़ीपुर लौट आए और स्वामी सहजानन्द महाविद्यालय के प्राचार्य के रूप में नियुक्त हुए।
कुबेरनाथ राय के मन में ‘लेखक बनने का शौक पहले [बचपन] से ही था। परन्तु तब वे सम्पादकों को बताते नहीं थे कि वे विद्यार्थी हैं।’ सरस्वती की कृपा कुछ इस तरह हुई कि उन्होने “निश्चय किया..कि एक दिन पूज्य पिताजी जब सोये रहेंगे, उनके सिरहाने से ..फटी दीमक लगी किताब निकाल लाऊँगा और आग लगाकर फूँक दूँगा। ..तब हिन्दू धर्म के लिए एक नई पोथी लिखनी पड़ेगी ..उस नई किताब को मैं लिखूँगा, और जो-जो मन में आयेगा, सो लिखूँगा। आखिर मेरी बात भी तो कभी आनी चाहिए, कि आजीवन मैं ‘हाँ,कहारी हाँ’ का ठेका ही पीछे से भरता रहूँगा।” माना जाता है कि उनके लेखन का आरम्भ हुमायूँ कबीर के इतिहास-लेखन के प्रतिरोध के रूप में हुआ था। वह मूलतः निबन्ध लेखक थे, हालाँकि उनका एक कविता-संग्रह भी प्रकाशित हुआ है। उनके 20 निबन्ध संग्रह प्रकाशित हैं।
कुबेरनाथ राय के प्रमुख निबन्ध-संग्रहों में मराल, प्रिया नीलकंठी, रस आखेटक, गंधमादन, निषाद बांसुरी, विषाद योग, पर्णमुकुट, महाकवि की तर्जनी, पत्र मणिपुतुल के नाम, किरात नदी में चन्द्रमधु, मनपवन की नौका, दृष्टि अभिसार, त्रेता का वृहत्साम, कामधेनु और रामायण महातीर्थम उल्लेखनीय हैं। उत्तर प्रदेश शासन ने भी उनके प्रिया नीलकंठी, गंधमादन और विषाद योग को पुरस्कृत किया। उनके निबन्ध भारतीयता, सनातन धर्म और विश्वबन्धुत्व के उच्च कोटि के दार्शनिक और साहित्यिक प्रतिपादन हैं।
उन्होंने अपने निबन्धों में “वृहत्तर भारत” की अवधारणा को विशेष रूप से प्रस्तुत किया। ‘मनपवन की नौका’ में उन्होंने प्राचीन भारत के सांस्कृतिक विस्तार को स्याम, जावा, सुमात्रा, मलाया, कंबोडिया, मलेशिया और इंडोनेशिया तक रेखांकित किया। उनके अनुसार भारतीयता एक संयुक्त सांस्कृतिक उत्तराधिकार है, जिसमें आर्य, द्रविड़, निषाद और किरात सभी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने यह भी प्रतिपादित किया कि नगरीय सभ्यता, कला-शिल्प और भक्ति-योग जैसे तत्त्व द्रविड़ संस्कृति की देन हैं। अपने निबन्ध ‘स्नान: एक सहस्त्रशीर्षा अनुभव’ में उन्होंने भारतीय समाज की स्नान-परम्परा और दर्शन-प्रेम को रेखांकित करते हुए निषाद और द्रविड़ संस्कृतियों के योगदान को स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि आर्यों की अग्नि-उपासना ‘हवन’, निषादों और द्रविड़ों का स्नान-प्रेम ‘तीर्थ’, द्रविड़ों की भाव-साधना ‘कीर्तन-भजन’ और आर्यों की चिंतनशीलता ‘दर्शन’ के रूप में विकसित हुई और इन्हीं के समन्वय से हिन्दू धर्म की आधाररचना बनी।
गाँधीवादी चिंतन भी उनके लेखन का महत्वपूर्ण पक्ष है। अपने पत्र-शैली के निबन्धों में उन्होंने महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व और विचारों की व्याख्या की। उन्होंने गाँधी को ‘सही हिन्दू’ और गांधी के समन्वयात्मक दृष्टिकोण को उनके हिन्दू और भारतीय होने का परिणाम माना। कुबेरनाथ राय के निबन्धों में लोकजीवन के प्रति गहरा लगाव, विद्वता और संवेदनशीलता का अद्भुत सन्तुलन मिलता है। यही गुण उन्हें एक आत्मीय, चुटीले और सच्चे भारतवादी निबन्धकार के रूप में स्थापित करता है।
हैं। 5 जून 1996 को गाजीपुर में अपने पैतृक आवास पर ही कुबेरनाथ राय का देहावसान हो गया। उनकी कुल 21 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके प्रसिद्ध निबंध-संग्रह ‘कामधेनु’ पर उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा दिया जाने वाला प्रतिष्ठित मूर्तिदेवी पुरस्कार प्राप्त हुआ। उनकी रचनाएँ देश-विदेश के विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में सम्मिलित हैं तथा विभिन्न भाषाओं में अनूदित भी हुई हैं। उनके साहित्य पर अनेक शोधकार्य भी किए गए हैं।
