महादेवी वर्मा – जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, काव्य और गद्य
ठंडे पानी से नहलाती
ठंडा चन्दन उन्हें लगाती
उनका भोग हमें दे जाती
तब भी कभी न बोले हैं
मां के ठाकुर जी भोले हैं।
यह तुकबन्दी महादेवी जी ने मात्र छ: सात वर्ष की अवस्था में ही ठाकुर जी की पूजा करती हुई माँ पर की थी। यही छोटी सी बच्ची आगे चलकर हिन्दी भाषा की प्रख्यात कवयित्री बनी। महादेवी वर्मा की गिनती हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभ सुमित्रानन्दन पन्त, जयशंकर प्रसाद और सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला के साथ की जाती है। आधुनिक हिन्दी कविता में महादेवी वर्मा एक महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरीं।
महादेवी वर्मा अपने परिवार में कई पीढ़ियों के बाद होली के दिन पैदा हुईं थीं। उनके परिवार में दो सौ सालों से कोई लड़की पैदा नहीं हुई थी। इनका जन्म 26 मार्च 1907 को फर्रुखाबाद में हुआ था। बचपन से ही महादेवी वर्मा बहुत प्रतिभाशाली थीं। उनकी पढ़ाई इंदौर के मिशन स्कूल से शुरू हुई और घर पर ही उन्होंने संस्कृत, अंग्रेज़ी, संगीत और चित्रकला सीखी। उनका विवाह 1919 में हुआ, लेकिन इसके बाद भी उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और क्रास्थवेट कॉलेज में दाखिला लेकर छात्रावास में रहने लगीं। पढ़ाई में वे इतनी अच्छी थीं कि 1921 में आठवीं कक्षा में पूरे प्रांत में प्रथम स्थान प्राप्त किया। बहुत छोटी उम्र, लगभग 7 वर्ष से ही उन्होंने कविता लिखना शुरू कर दिया था और 1925 में मैट्रिक पास करते-करते वे एक प्रसिद्ध कवयित्री बन चुकी थीं।
अपने बचपन के बारे में उन्होंने लिखा है कि जब समाज में बेटियों को बोझ समझा जाता था, तब उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहाँ उन्हें पूरा प्रोत्साहन मिला। उनके दादाजी उन्हें विदुषी बनाना चाहते थे और उनकी माँ, जो संस्कृत और हिन्दी की जानकार थीं, ने उन्हें साहित्य और कविता की ओर प्रेरित किया। आगे चलकर 1932 में उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. किया। तब तक उनके “नीहार” और “रश्मि” जैसे कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके थे। बाद में वे प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्य बनीं और शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उनका जीवन बहुत सादा और अनुशासित था। विवाह के बाद भी वे छात्रावास में रहीं और एक सन्यासिनी की तरह जीवन बिताया। वे हमेशा सफेद वस्त्र पहनती थीं, तख्त पर सोती थीं और कभी शीशा नहीं देखती थीं। महादेवी वर्मा ने महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बहुत काम किया। उन्होंने “चाँद” नामक पत्रिका का संपादन संभाला और समाज में महिलाओं की स्थिति सुधारने का प्रयास किया। उनके प्रमुख कविता संग्रहों में “नीहार”, “रश्मि”, “नीरजा” और “सांध्यगीत” शामिल हैं।
उन्होंने केवल कविता ही नहीं, बल्कि गद्य, शिक्षा और चित्रकला में भी महत्वपूर्ण कार्य किया। उनकी रचनाओं में “मेरा परिवार”, “स्मृति की रेखाएँ”, “पथ के साथी”, “श्रृंखला की कड़ियाँ” और “अतीत के चलचित्र” प्रमुख हैं। 1955 में उन्होंने इलाहाबाद में साहित्यकार संसद की स्थापना की और भारत में महिला कवि सम्मेलनों की शुरुआत भी की। 15 अप्रैल 1933 को पहला अखिल भारतीय कवि सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसकी अध्यक्षता सुभद्रा कुमारी चौहान ने की। वे बौद्ध धर्म से प्रभावित थीं और महात्मा गांधी के प्रभाव में आकर उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लिया। उन्हें “मॉडर्न मीरा” कहा जाता है।
उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और आत्मनिर्भरता के लिए लगातार काम किया। रामगढ़ के पास उमागढ़ गाँव में उन्होंने अपना एक घर बनवाया, जो आज “महादेवी साहित्य संग्रहालय” के नाम से जाना जाता है। उनके गद्य साहित्य में “विवेचनात्मक गद्य”, “स्मृति की रेखाएँ”, “साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबंध”, “संकल्पिता” और “मेरा परिवार” जैसी कृतियाँ शामिल हैं। वहीं उनके कविता संग्रहों में “नीहार”, “रश्मि”, “नीरजा”, “दीपशिखा” और “अग्निरेखा” प्रमुख हैं।
सम्मान और पुरस्कार
सन 1955 में महादेवी जी ने इलाहाबाद में ‘साहित्यकार संसद’ की स्थापना की और पं. इला चंद्र जोशी के सहयोग से ‘साहित्यकार’ का संपादन सँभाला। यह इस संस्था का मुखपत्र था। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद 1952 में वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्या मनोनीत की गईं। उनके योगदान के लिए उन्हें कई बड़े सम्मान मिले, जैसे 1982 में “यामा” के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार, 1979 में साहित्य अकादमी फेलोशिप, 1988 में पद्म विभूषण, 1956 में भारत सरकार ने उनकी साहित्यिक सेवा के लिए ‘पद्म भूषण’ की उपाधि और 1969 में ‘विक्रम विश्वविद्यालय’ ने उन्हें डी.लिट. की उपाधि से अलंकृत किया। इससे पूर्व महादेवी वर्मा को ‘नीरजा’ के लिए 1934 में ‘सेकसरिया पुरस्कार’, 1942 में ‘स्मृति की रेखाओं’ के लिए ‘द्विवेदी पदक’ प्राप्त हुए। 1943 में उन्हें ‘मंगला प्रसाद पुरस्कार’ एवं उत्तर प्रदेश सरकार के ‘भारत भारती पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। ‘यामा’ नामक काव्य संकलन के लिए उन्हें भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ प्राप्त हुआ। भारत सरकार ने उनके सम्मान में जयशंकर प्रसाद के साथ युगल डाक टिकट भी जारी किया।
महादेवी वर्मा का निधन 11 सितम्बर, 1987, को प्रयाग में हुआ था। महादेवी वर्मा ने निरीह व्यक्तियों की सेवा करने का व्रत ले रखा था। वे बहुधा निकटवर्ती ग्रामीण अंचलों में जाकर ग्रामीण भाई-बहनों की सेवा सुश्रुषा तथा दवा निःशुल्क देने में निरत रहती थी। वास्तव में वे निज नाम के अनुरूप ममतामयी, महीयसी महादेवी थी। भारतीय संस्कृति तथा भारतीय जीवन दर्शन को आत्मसात किया था। उन्होंने भारतीय संस्कृति के सम्बन्ध में कभी समझौता नहीं किया। महादेवी वर्मा ने एक निर्भीक, स्वाभिमाननी भारतीय नारी का जीवन जिया। राष्ट्र भाषा हिन्दी के सम्बन्ध में उनका कथन है ‘‘हिन्दी भाषा के साथ हमारी अस्मिता जुड़ी हुई है। हमारे देश की संस्कृति और हमारी राष्ट्रीय एकता की हिन्दी भाषा संवाहिका है।’
