विदेशियों के लिए धर्म-विज्ञान की प्रयोगशाला रही काशीविदेशियों के लिए धर्म-विज्ञान की प्रयोगशाला रही काशी

25 साल पहले तक काशी विदेशियों के लिए में धर्म-विज्ञान की एक प्रयोगशाला रही। यहां के शास्त्र, मंदिर, कथाएं, किस्से और किवदंतियां सब कुछ वैज्ञानिक जांच का हिस्सा हुआ करते थे।

अमेरिका, जापान और ब्रिटेन सहित कई यूरोपीय देशों के लैब से वैज्ञानिक आकर काशी के मंदिरों में पूरे दिन पूजा और अनुष्ठानों को देखते थे। उससे भक्तों को मिलने वाली अदृश्य ऊर्जा के स्रोतों का पता लगाते थे। मुझे कई बाहरी प्रोजेक्ट की अगुवाई करने का मौका मिला। बीएचयू में पांच दिन पढ़ाने के बाद शनिवार की छुट्टी लेकर रविवार तक दो दिन मंदिर-मंदिर ही भटकता था।

मित्र से गिफ्ट में मिले इटेलियन चेतक स्कूटर लेकर ज्ञानवापी वाले व्यास जी के घर तक जाता था। वहां से विश्वनाथ मंदिर में समय बीतता था। तब तक काशी के 2100 मंदिरों में रिसर्च और फील्ड सर्वे कर दिया गया था। मन में कुछ नया मिलने का आभास हो रहा था।
इस समय काशी की वैज्ञानिकता के प्रति विदेशी जागरूकता चरम पर पहुंच गई थी।

यह हाल उस दौर में था जब मोबाइल और इंटरनेट का इस्तेमाल न के बराबर था। मगर, उस समय आज के मुकाबले काशी के रहस्यों पर 20 गुना ज्यादा शोध हुए और किताबें लिखी गईं। एक-एक तथ्य और मैप के लिए काशी से लेकर लंदन तक की लाइब्रेरी खंगालनी पड़ी। 1822 में जेम्स प्रिंसेप के काशी का नक्शा तब तक खूब इस्तेमाल हुआ।

ब्रिटेन के 1912 में बनाए मैप के सहारे काशी के धार्मिक कलेवर को बाहर लाया गया। विश्वनाथ मंदिर के पंडा केदारनाथ व्यास के साथ लगातार 22 साल तक रिसर्च काम किया गया। 2001 की बात है कि एक बार विदेशी वैज्ञानिकों के बड़े जत्थे को पंडों ने रोक दिया। मारपीट पर उतारू हो गए कि कैसे विदेशी घुस गया।

फिर कट्टर काशीवासी व्यास जी ने पंडों को समझा बुझाकर वहां से हटा दिया। हमने भी कहा कि ये वैज्ञानिक आपकी स्थिति को बेहतर करने आए हैं। मंदिर आस्था के साथ ही विज्ञान के लिहाज से बहुत बड़ा केंद्र है।

हालांकि, उसके बाद से लगभग सारे प्रोजेक्ट बंद हो गए। मंदिरों पर रिसर्च को लेकर विदेशी वैज्ञानिकों की रुचि भी घट गई, कई प्रोजेक्ट बंद हो गए। उसी समय काशी को वैज्ञानिक कसौटियों पर कसने वाले बीएचयू के सबसे नामचीन भूगोलवेत्ता का निधन हो गया। उनका नाम था प्रो. राम लोचन सिंह। 1954 में काशी पर किताब लिखकर बताया कि इस शहर का मास्टर प्लान क्या होगा।

प्रो. राणा पीबी सिंह, भूगोलवेत्ता, बीएचयू

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