सामाजिक न्याय अर्वाचीन शब्द है। यह अँग्रेजी शब्द ‘सोशल जस्टिस’ का पर्याय है। सोशल जस्टिस शब्द का प्रथम प्रयोग जेसुइट लुईगी टप्पारेल्ली ने 1840 में किया था। उस समय मार्क्स के साम्यवादी तत्वज्ञान का यूरोप में बहुत बोलबाला था। औद्योगिक क्रान्ति के कारण जो नयी सामाजिक आर्थिक रचना हुई उसमें पूँजीपतियों के हाथ में असीम सत्ता आ गयी और उन्होंने इस सत्ता के माध्यम से आम आदमी का भीषण शोषण किया। कष्ट सहन करने वाली जनता बहुत दुर्बल बन गयी। मार्क्स ने शोषित लोगों से कहा कि, आप जाग जाओ, संगठित बनो और पूँजीपतियों को समाप्त कर दो। आर्थिक न्याय की प्रस्थापना करो। सामाजिक समता का युग लाओ। मार्क्स ने पंथसत्ता का भी आह्वान किया। इस आह्वान को स्वीकारते हुए ईसाई मिशनरियों ने बाइबिल की नये ढंग से व्याख्या आरम्भ कर दी और कहना प्रारम्भ किया की बाइबिल में सामाजिक न्याय का उल्लेख है। आगे चलकर यूरोपीय समाज में परिवर्तन होते गये और उन्होंने अपने समाज में सामाजिक न्याय की प्रस्थापना करने की दृष्टि से राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक सुधार किये।
दुनिया की सर्वाधिक पुरातन संस्कृति
भारत दुनिया का सर्वाधिक पुरातन संस्कृति वाला देश है। यहाँ की संस्कृति नित्य नूतन, चिर पुरातन है। मानव विकास, सामाजिक विकास, सभ्यता विकास में हमारा जो लम्बे समय से प्रवास चला है, योगदान रहा है, जो दृष्टि रही है उसकी अनेक विशेषताएँ है। हमने बहुत लम्बे समय से उसको साथ लेकर चलने का स्वभाव बनाया है, उसको यदि कम शब्दों में कहना हो तो हम कहते हैं कि भारत का विचार अध्यात्म का विचार है, यह हमारा मुख्य विषय है। समाज, सृष्टि, प्रकृति के सम्बन्ध में सोचने की हमारी दृष्टि यही है। भारत में जन्मे अनेक साधु, सन्त, ऋषि-मुनि, संन्यासी अनेक लोगों ने इस प्रवाह को, इस दृष्टि के साथ आगे ले जाने का काम किया है। भारत में जन्मे जितने मत, पंथ, सम्प्रदाय हैं उनमें भी कुछ मूल तत्व दिखते हैं, वे हैं- सत्य, करुणा, शुचिता और तपस्या। यह मूल तत्व नहीं बदलते। यह मूल तत्व भारत से निकली सभी विचारधाराओं ने बतायें हैं।
सत्य का अनुसन्धान करो, हम सत्य बताते हैं ऐसा नहीं कहा, हम जो बताते हैं उसे पर विश्वास करो, ऐसा भी नहीं कहा, मैंने ऐसा अनुभव किया है तुम भी करके देखो, तुम तुम्हारी अनुभूति तुम्हारे लिये, तुम जो कहते हो वह तुम्हारे लिये। तुम मेरी अनुभूति नहीं पा सकते, मैं तुम्हारी नहीं पा सकता हूँ। सत्य का सतत अनुसन्धान करो और अन्ततोगत्वा सत्य यही बताता है कि अस्तित्व एक है, इसलिये हम अलग-अलग नहीं है। देह, मन, बुद्धि, आवश्यकतायें, स्वभाव अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन यह अलगता नहीं है यह विविधता है, यह विविधता में एकता का आविष्कार है। सुख की खोज अपने अन्दर समाज में चार प्रकार के लोग रहते हैं। उसमें से हमारा भाव जिस प्रकार का रहना चाहिये, उस बारे में महर्षि पतंजलि कहते हैं-
मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां