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पद्म श्री अंके गौड़ा: पुस्तकों के लिए समर्पित जीवन, समाज के लिए प्रेरणा का प्रकाश

पद्म श्री अंके गौड़ा: जिस व्यक्ति ने अपना घर नहीं, पूरा जीवन पुस्तकों को समर्पित कर दिया… उन्हें मिला पद्म श्री।

आज जब दुनिया मोबाइल स्क्रीन पर सिमटती जा रही है, तब कर्नाटक के एक साधारण किसान परिवार से निकले पद्म श्री अंके गौड़ा ने यह साबित कर दिया कि किताबें केवल ज्ञान का स्रोत नहीं, बल्कि समाज को बदलने की सबसे बड़ी शक्ति हैं।

अंके गौड़ा ने न तो कोई बड़ी राजनीतिक शक्ति पाई, न कोई उद्योग खड़ा किया और न ही करोड़ों की संपत्ति बनाई। उन्होंने अपने जीवन की कमाई का अधिकांश हिस्सा एक ऐसे सपने पर खर्च किया, जिसे बहुत कम लोग समझ पाए—किताबें इकट्ठा करना और उन्हें समाज के लिए निःशुल्क उपलब्ध कराना।

बस कंडक्टर और बाद में एक शुगर फैक्ट्री में टाइमकीपर के रूप में काम करते हुए उन्होंने वर्षों तक एक-एक पुस्तक जुटाई। धीरे-धीरे उनका घर ही एक विशाल पुस्तकालय में बदल गया, जिसे आज “पुस्तक मने” (Pustaka Mane) के नाम से जाना जाता है।

आज इस पुस्तकालय में लाखों पुस्तकें, पत्रिकाएँ और दुर्लभ साहित्य सुरक्षित हैं। सबसे प्रेरणादायक बात यह है कि यहाँ आने वाले छात्रों, शोधकर्ताओं और पाठकों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता। ज्ञान को उन्होंने कभी व्यापार नहीं बनने दिया।

पद्म श्री अंके गौड़ा

ऐसे समय में, जब लोग आलीशान घर, महंगी गाड़ियाँ और भौतिक उपलब्धियों को सफलता का पैमाना मानते हैं, अंके गौड़ा ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि सबसे बड़ी विरासत वह है, जो आने वाली पीढ़ियों को ज्ञान के रूप में मिले।

उनकी इस अद्भुत सेवा को सम्मान देते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उन सभी पुस्तक प्रेमियों, शिक्षकों, पुस्तकालयों और ज्ञान की संस्कृति का सम्मान है, जो चुपचाप समाज को समृद्ध बना रहे हैं।

हम सबके लिए अंके गौड़ा की कहानी एक प्रेरणा है—
यदि संकल्प बड़ा हो, तो एक साधारण व्यक्ति भी अपने घर को ज्ञान का तीर्थ बना सकता है।

आइए, हम भी संकल्प लें—
हर वर्ष कम से कम कुछ अच्छी पुस्तकें पढ़ेंगे।
पुस्तकों को सहेजेंगे, साझा करेंगे और पढ़ने की संस्कृति को आगे बढ़ाएंगे।
क्योंकि एक पुस्तक केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरी पीढ़ी का भविष्य बदल सकती है।

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