प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस: भारतीय इतिहास का एक रक्तरंजित अध्याय

Byadmin

Aug 18, 2026 #16 अगस्त 1946, #16 अगस्त का इतिहास, #1946 का साम्प्रदायिक दंगा, #Bengal Riots 1946, #Calcutta 1946, #Direct Action Day, #Direct Action Day 1946, #Great Calcutta Killings, #Great Calcutta Killings 1946, #Indian History, #Jinnah, #Muslim League, #Partition History, #Partition of India, #अखंड भारत, #कलकत्ता दंगे 1946, #कलकत्ता नरसंहार, #कलकत्ता हत्याकांड, #कैबिनेट मिशन योजना, #नोआखली दंगे, #पाकिस्तान की मांग, #प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस, #प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस 1946, #बंगाल 1946, #बिहार दंगे 1946, #भारत का विभाजन, #भारत विभाजन, #भारत विभाजन का इतिहास, #भारतीय इतिहास, #भारतीय इतिहास के काले अध्याय, #मुस्लिम लीग, #मुहम्मद अली जिन्ना, #विभाजन का इतिहास, #विभाजन की विभीषिका, #विभाजन विभीषिका, #साम्प्रदायिक हिंसा, #स्वतंत्रता संग्राम, #स्वतंत्रता से पहले भारत, #हुसैन शहीद सुहरावर्दी
प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस: भारतीय इतिहास का एक रक्तरंजित अध्यायप्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस: भारतीय इतिहास का एक रक्तरंजित अध्याय

अमन दुबे

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लम्बे और संघर्षपूर्ण इतिहास में कई ऐसी घटनाएँ दर्ज हैं जिन्होंने देश की दिशा और दशा को हमेशा के लिये बदल कर रख दिया। इन्हीं हृदयविदारक घटनाओं में से एक है- 16 अगस्त 1946 का ‘प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस’ (Direct Action Day), जिसे इतिहास में ‘ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स’ के भयावह नाम से भी जाना जाता है। यह वह मनहूस दिन था जब राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और साम्प्रदायिक उन्माद ने इंसानियत की सभी हदें पार कर दी थीं। इस एक दिन की घटना ने सदियों से एक साथ रह रहे समुदायों के बीच अविश्वास की ऐसी गहरी खायी खोद दी, जिसे पाटना असम्भव हो गया और जिसने अन्ततः भारत के विभाजन की दुखद पटकथा लिख दी।


इस विभीषिका की पृष्ठभूमि वर्ष 1946 के उस दौर में तैयार हुई, जब यह स्पष्ट हो गया था कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आर्थिक और सैन्य रूप से कमजोर हो चुकी ब्रिटिश सरकार अब भारत पर लम्बे समय तक शासन नहीं कर सकती। सत्ता हस्तान्तरण का मार्ग प्रशस्त करने के लिये ब्रिटिश सरकार ने 1946 में कैबिनेट मिशन भारत भेजा। इस मिशन ने भारत के विभाजन की माँग को सिरे से खारिज करते हुए एक एकजुट और संघीय भारत का प्रस्ताव रखा, जिसमें प्रान्तों को अधिक स्वायत्तता दी गयी थी। शुरुआत में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग, दोनों ने इस योजना पर अपनी सैद्धान्तिक सहमति जतायी थी लेकिन जल्द ही मुस्लिम लीग के नेता मुहम्मद अली जिन्ना को यह भय सताने लगा कि एकजुट भारत में हिन्दू बहुसंख्यक होंगे और इस व्यवस्था में मुसलमानों के राजनीतिक हित पूरी तरह से सुरक्षित नहीं रह सकेंगे। नतीजतन, जिन्ना ने कैबिनेट मिशन योजना को अस्वीकार कर दिया और एक अलग मुस्लिम राष्ट्र, ‘पाकिस्तान’ के निर्माण की अपनी माँग पर अड़ गये।


इसी राजनीतिक गतिरोध के बीच, मुस्लिम लीग ने जुलाई 1946 में एक प्रस्ताव पारित किया और यह भड़काऊ घोषणा की कि अब वे अपने लक्ष्य यानी पाकिस्तान को प्राप्त करने के लिये संवैधानिक तरीकों को त्याग देंगे। मुहम्मद अली जिन्ना ने 16 अगस्त 1946 को पूरे देश में ‘प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस’ मनाने का खुला आह्वान किया। इसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस को मुस्लिम लीग की जमीनी ताकत का एहसास कराना और यह साबित करना था कि भारत के मुसलमानों के लिये एक अलग सम्प्रभु देश से कम कुछ भी मँजूर नहीं है। जिन्ना का यह बयान कि ‘हम या तो विभाजित भारत लेंगे या फिर भारत को नष्ट कर देंगे’, आग में घी का काम कर गया और इस भड़काऊ रुख ने पूरे देश में, विशेषकर बंगाल में, साम्प्रदायिक तनाव का एक अभूतपूर्व माहौल पैदा कर दिया।


इस ‘डायरेक्ट एक्शन’ का मुख्य केन्द्र बंगाल की राजधानी कलकत्ता (अब कोलकाता) बना, जहाँ उस समय मुस्लिम लीग की सरकार सत्ता में थी और हुसैन शहीद सुहरावर्दी वहाँ के मुख्यमंत्री थे। हालात को और गभीर बनाते हुए, मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने 16 अगस्त को बंगाल में सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया। इस कदम की व्यापक और कड़ी आलोचना हुई क्योंकि राजनीतिक विश्लेषकों और आम जनता का मानना था कि इस छुट्टी ने उपद्रवियों को सड़कों पर उतरने और कानून-व्यवस्था को अपने हाथ में लेने की खुली छूट दे दी। प्रशासन का यह ढुलमुल रवैया आने वाले बड़े तूफान का सीधा संकेत था।


16 अगस्त की दोपहर को कलकत्ता के मैदान (ऑक्टरलोनी मोन्यूमेंट) में मुस्लिम लीग की एक विशाल रैली आयोजित की गयी। इस रैली में हजारों की भीड़ उमड़ी और मंच से दिये गये अत्यन्त भड़काऊ भाषणों ने भीड़ की मानसिकता को पूरी तरह से हिंसक बना दिया। रैली समाप्त होने के बाद लौटती हुई उन्मादी भीड़ ने हिन्दू बहुल इलाकों में दुकानों, घरों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर अचानक और सुनियोजित हमले शुरू कर दिये। लूटपाट, आगजनी और हत्याओं का ऐसा ताण्डव शुरू हुआ जिसने पूरे महानगर को हिला कर रख दिया। इसके जवाब में जल्द ही हिन्दू और सिख समुदायों ने भी संगठित होकर भीषण जवाबी हमले शुरू कर दिये, जिससे कलकत्ता की सड़कें कुछ ही घण्टों में एक खूनी युद्ध के मैदान में तब्दील हो गयीं।


16 से 19 अगस्त तक यह महानगर साम्प्रदायिक आग में धू-धू कर जलता रहा। इस पूरे नरसंहार के दौरान सबसे चौंकाने वाली बात पुलिस और प्रशासन की पूरी तरह से निष्कि्रयता थी। मुख्यमंत्री सुहरावर्दी पर गम्भीर आरोप लगे कि उन्होंने पुलिस बल को दंगाइयों के खिलाफ कोई भी ठोस कार्रवाई करने से रोक दिया था, जिसके चलते पुलिस महज मूकदर्शक बनी रही। सड़कों पर खुलेआम हथियारों का प्रदर्शन किया गया, निर्दोष लोगों की बेरहमी से हत्या की गयी, महिलाओं के साथ अमानवीय अत्याचार हुए और हजारों सम्पत्तियों को आग के हवाले कर दिया गया। कलकत्ता की सड़कों, चौराहों और नालियों में लाशों के ढेर लग गये, और हुगली नदी में शव तैरते हुए देखे गये। विभिन्न ऐतिहासिक अनुमानों के मुताबिक, इन तीन दिनों की बर्बर हिंसा में 4,000 से 10,000 के बीच लोग मारे गये और 1,00,000 से अधिक लोग अपने ही शहर में शरणार्थी बनकर बेघर हो गये।


कलकत्ता का यह नरसंहार केवल बंगाल की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा; इसने पूरे भारत में साम्प्रदायिक घृणा और प्रतिशोध की एक ऐसी अन्तहीन शृंखला शुरू कर दी जिसे रोकना किसी के वश में नहीं रहा। कलकत्ता की घटना की प्रतिक्रिया में, अक्टूबर 1946 में पूर्वी बंगाल के नोआखली (अब बांग्लादेश में) में हिन्दुओं के खिलाफ भयानक और एकतरफा हिंसा हुई। नोआखली में हुए अत्याचारों की खबरों ने बिहार में आग भड़का दी, जहाँ बहुसंख्यक समुदाय ने मुसलमानों पर भीषण हमले किये। इसके बाद देखते ही देखते हिंसा की यह लपटें संयुक्त प्रान्त (अब उत्तर प्रदेश) और पंजाब तक फैल गयीं, और पूरा उत्तर तथा पूर्वी भारत एक भयानक गृह युद्ध की कगार पर आकर खड़ा हो गया।


‘प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस’ की इस विभीषिका ने भारतीय राजनीति की दिशा को स्थायी रूप से बदल दिया। कलकत्ता की सड़कों पर बहे खून ने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं, विशेषकर पण्डित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल, को यह सोचने पर विवश कर दिया कि अब हिन्दू और मुसलमानों का एक राजनीतिक ढाँचे के तहत शान्ति से रहना लगभग असम्भव है। लगातार हो रहे भयानक रक्तपात और आसन्न गृह युद्ध से देश को बचाने के लिये अन्ततः उन्होंने भारी मन से देश के विभाजन को एक कड़वे घूँट की तरह स्वीकार कर लिया। जब पूरा देश नफरत की आग में जल रहा था, तब 77 वर्षीय महात्मा गांधी शान्ति और सद्भाव स्थापित करने के लिये कलकत्ता और नोआखली के दंगा प्रभावित इलाकों में नंगे पैर घूम रहे थे। उन्होंने हिंसा रोकने के लिये अपनी जान दाँव पर लगाकर आमरण अनशन किया। गांधीजी के इन अकल्पनीय और निस्वार्थ प्रयासों को देखते हुए ही भारत के अन्तिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने उन्हें ‘वन मैन बाउंड्री फोर्स’ (One Man Boundary Force) की संज्ञा दी थी, क्योंकि जो काम हजारों की फौज नहीं कर सकी, वह काम गांधीजी के उपवास ने कर दिखाया था।


अन्ततः, प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस महज इतिहास के पन्नों में दर्ज एक मृत तारीख नहीं है, बल्कि यह आज भी इस बात का एक खौफनाक और जीवन्त अनुस्मारक है कि जब राजनीति में धर्म का जहर घोला जाता है और सत्ता प्राप्ति के लिये इंसानी जानों की बाजी लगायी जाती है, तो उसके कितने विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं। इस एक दिन की घटना ने न केवल हजारों निर्दोष लोगों की जान ली, बल्कि भारत माता के सीने पर विभाजन की वह स्थायी लकीर भी खींच दी, जिसका दर्द उपमहाद्वीप के लोग आज भी महसूस करते हैं। कलकत्ता की उन सड़कों पर बहा खून आज भी हमें यह गम्भीर सबक देता है कि साम्प्रदायिक सद्भाव, सहिष्णुता और इंसानियत ही किसी भी सभ्य समाज के अस्तित्व को बचाये रखने की सबसे बड़ी और अनिवार्य शर्त है।

Author

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *