लाहौर में हिन्दू नेताओं की बैठक : चौ. छोटूराम की आशंका

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Jul 7, 2026 #अखंड भारत, #आरएसएस, #इतिहास के पन्नों से, #ऐतिहासिक दस्तावेज, #कांग्रेस, #कृष्णानन्द सागर, #खिजर हयात, #गुप्तचर विभाग, #चौधरी छोटूराम, #छोटूराम, #पंजाब का इतिहास, #पंजाब के दंगे, #पंजाब विभाजन, #पाकिस्तान निर्माण, #प्रतिरक्षा विभाग, #बालासाहब देवरस, #भारत का विभाजन, #भारत पाकिस्तान विभाजन, #भारत विभाजन 1947, #भारतीय इतिहास, #भारतीय स्वतंत्रता, #माधव सदाशिव गोलवलकर, #माधवराव मुले, #मुस्लिम लीग, #यूनियनिस्ट पार्टी, #रावलपिंडी, #रावलपिंडी दंगे, #राष्ट्र सेवा, #राष्ट्रवादी इतिहास, #राष्ट्रीय एकता, #राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, #लाहौर, #लाहौर में हिन्दू नेताओं की बैठक, #वसंतराव ओक, #विभाजन का इतिहास, #विभाजन की त्रासदी, #विभाजन के दौरान संघ की भूमिका, #विभाजन के साक्षी, #विभाजन पूर्व पंजाब, #विभाजनकालीन भारत के साक्षी, #शस्त्र संग्रह, #श्री गुरुजी, #संघ का इतिहास, #संघ स्वयंसेवक, #स्यालकोट, #हरिपुर हजारा, #हिन्दू नेतृत्व, #हिन्दू समाज, #हिन्दू सुरक्षा

जनवरी 1947 में संघ की ओर से लाहौर में हिन्दू ने. ताओं की एक बैठक बुलायी गई थी, जिसमें पंजाब मन्त्रीमण्डल के कई हिन्दू मन्त्री भी उपस्थित थे। उनमें कुछ कांग्रेसी भी थे। इस बैठक में चौधरी छोटूराम ने कहा था- “जब तक यूनियनिस्ट पार्टी की सरकार है, विभाजन नहीं हो सकता। लेकिन मुझे खतरा एक ही बात का है कि कहीं कांग्रेस ही मुस्लिम लीग के आगे घुटने न टेक दं।” (देखें, इसी ग्रन्थ का अध्याय – ‘विश्वामित्र पुष्करणा’)

उस समय पंजाब में खिजर हयात के नेतृत्व में संयुक्त सरकार थी और उसमें यूनियनिस्ट पार्टी, कांग्रेस और अकाली दल शामिल थे। चौधरी छोटूराम रोहतक के थे और यूनियनिस्ट पार्टी के एक प्रभावशाली मन्त्री थे। यह बैठक सीमा प्रान्त के हरिपुर-हजारा में जनवरी में ही हुए भीषण हिन्दू-नरमेध के बाद हुई थी। वहाँ यह नरमेध 21 दिसम्बर 1946 से आरम्भ हो कर 1947 के जनवरी मध्य तक चला था।

चौधरी छोटूराम की आशंका ठीक निकली और फरवरी में ही वसन्तराव ओक को यह सूचना मिल गई कि कांग्रेस घुटने टेकने जा रही है। इसी कारण श्रीगुरुजी व बालासाहब का पंजाब दौरा हुआ और इस दौरे के दौरान ही पंजाब के अनेक स्थानों पर मुस्लिम-दंगे शुरू हो गए। जिन्हें श्रीगुरुजी व बालासाहब ने भी प्रत्यक्ष देखा।

मार्च मास में हुए पंजाब के दंगों में सबसे भीषण दंगा रावलपिण्डी का था। वहाँ मुसलमानों द्वारा क्रूरता व नृशंसता का नंगा नाच किया जा रहा था। उसी समय लाहौर में लाहौर के प्रमुख संघ कार्यकर्ताओं की एक बैठक हुई। यह बैठक प्रान्त प्रचारक माधवराव मुले ने ली थी। सभी कार्यकर्ता काफी उद्वेलित थे। कार्यकर्त्ताओं ने कहा-“माधवराव जी, ऐसा कैसे चलेगा? आज रावलपिण्डी में हुआ है, कल स्यालकोट में होगा, परसों लाहौर में होगा। क्या हम हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहेंगे और यह सब सहन करते रहेंगे? हमारे पास तो कुछ है भी नहीं कि हम आत्म-रक्षा भी कर सकें?”

माधवराव जी ने सबकी बातें शान्तिपूर्वक सुनीं और फिर बोले-“अरे भाई, यह मत कहो कि हमारे पास कुछ नहीं है। हमारे पास कैडर (कार्यकर्त्ताओं की टीम) है, और इस कैडर के बल पर हम सब प्रकार के साधनों की व्यवस्था एक सप्ताह में कर सकते हैं।”


यह आत्म-विश्वास भरा उत्तर किसी योग्य सेनापति के मुख से ही निकल सकता था, जो शून्य में से सृष्टि निर्माण का संकल्प लिए हो। निश्चय ही माधवराव मुले आगे के पूरे विभाजन-काल में पंजाब हिन्दू समाज के एक योग्य सेनापति सिद्ध हुए।


इसके बाद उसी बैठक में उन्होंने बीस कार्यकर्ताओं को शाखा कार्य से मुक्त कर दिया और उन्हें भिन्न-भिन्न कार्य सौंपे। कई तरह के कार्यों के लिए अलग-अलग विभाग बनाए और हर विभाग का एक-एक प्रमुख निश्चित कर दिया। जो विभाग बनाए, उनमें से कुछ थे- गुप्तचर विभाग, शस्त्र-संग्रह विभाग, वाहन विभाग, प्रतिरक्षा विभाग, मैडिकल विभाग, शव दाह विभाग, धन-संग्रह विभाग आदि आदि। (देखें अध्याय – ‘विश्वामित्र पुष्करणा’)


यह बैठक श्रीगुरुजी के लाहौर से चले जाने के तुरन्त बाद किसी दिन हुई और उसी दिन से कार्यकर्ताओं ने उसका क्रियान्वयन भी शुरु कर दिया।

कृष्णानन्द सागर
विभाजनकालीं भारत के साक्षी
विभाजन से पूर्व और पश्चात का प्रामाणिक दस्तावेज

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