“स्वराज्य की जननी: जीजाबाई”

“महिलाओं के कारण ही पुरुषों का अस्तित्व एवं उत्थान सम्भव है। जीजाबाई से शिवाजी, कुन्ती से पाण्डव और कौशल्या से राम का अस्तित्व था।“ ये बात 9 नवम्बर 2025 को PES यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने संघ के १०० साल (नए क्षितिज) 2 दिवसीय विशेष व्याख्यानमाला के दौरान कही थी और ये बात प्रमाणिक भी है क्योंकि हम जीजाबाई को इसलिए नहीं जानते क्योंकि वो वीर और प्रतापी शिवाजी की माता थीं बल्कि जीजाबाई को भारतवर्ष में हर व्यक्ति उनके हिन्दुत्व प्रेम, धार्मिकता, अदम्य साहस, बुद्धिमत्ता और धर्मनिष्ठा के साथ-साथ शिवाजी को वीर शिवाजी बनाने के लिए जानता है।

जीजाबाई ने मराठा साम्राज्य की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी मार्गदर्शन और शिक्षाओं ने शिवाजी को वह नजरिया और साहस दिया, जिसने मराठा साम्राज्य को अजेय बनाया और इस विरासत को संभाजी महाराज ने आगे बढ़ाया। जीजाबाई का जीवन मराठा गौरव का वह आधार स्तम्भ है, जिसके बिना स्वराज की कहानी अधूरी है। जीजाबाई का जन्म 12 जनवरी, 1598 ई. को हुआ था। वे महाराष्ट्र राज्य के बुलढ़ाणा ज़िले के सिन्दखेड राजा के लखोजीराव जाधव की पुत्री थीं। इनके बाल्यकाल का नाम ‘जीजू’ था। एक बार लखोजीराव जाधव के महल में दरबार लगा था जहाँ युद्धकौशल और राजनीतिक चर्चाएँ हो रही थी और उन चर्चाओं का विषय था कि, मुगलों के बढ़ते प्रभाव के चलते क्या मराठा को आत्मसमर्पण कर देना चाहिए और कई राजनेता भाई और चिन्ता के कारण मुगलों के आधीन होने की बात कर रहे थे तभी छोटी जीजाबाई ने बड़े साहस से कहा “यह भूमि हमारी है और हम किसी के आगे नहीं झुकेंगे हम अपने धर्म और स्वाभिमान के लिए आखिरी दम तक लड़ेंगे” छोटी सी बच्ची की ये बात सुनकर दरबार में बैठे लोग चकित हो गए और जीजाबाई की वाणी ने पूरी सभा का मंतव्य बदल दिया और सभी साहस से भर गए लखोजीराव जाधव को भी अपनी बेटी पर गर्व महसूस हुआ।

उस समय की परम्पराओं के अनुसार अल्पायु में ही उनका शाहजी राजे भोंसले से विवाह हो गया, यह शाहजी राजे की पहली पत्नी थीं। शाहजी भोसले बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह की सेना में कार्यरत थे और यही बात जीजाबाई को स्वीकार्य नहीं थी कि उनके पति को मुगलों के आगे शीष झुकाना पड़े इसीलिए उन्होंने संकल्प लिया कि, उनके पति चाहे मुगलों के आगे मौन खड़े रहे परन्तु वे अपनी सन्तान को मुगलों के आगे कभी नहीं झुकने देंगी। जीजाबाई ने आठ सन्तानों को जन्म दिया, जिनमें से छ: पुत्रियाँ और दो पुत्र थे। इन्हीं संतानों में से एक शिवाजी महाराज भी थे। जीजाबाई हमेशा शिवाजी की संरक्षिका बनी रहीं और उनके चरित्र, महत्त्वाकांक्षाओं तथा आदर्शों के निर्माण में सबसे अधिक योगदान दिया।

जीजाबाई एक तेजस्वी महिला थीं, जीवन भर पग-पग पर कठिनाइयों और विपरीत परिस्थितियों को झेलते हुए उन्होंने धैर्य नहीं खोया। उन्होंने शिवाजी को महान् वीर योद्धा और स्वतन्त्र हिन्दू राष्ट्र का छत्रपति बनाने के लिए अपनी सारी शक्ति, योग्यता और बुद्धिमत्ता लगा दी। शिवाजी को बचपन से बहादुरों और शूर-वीरों की कहानियाँ सुनाया करती थीं। गीता और रामायण आदि की कथायें सुनाकर उन्होंने शिवाजी के बाल-हृदय पर स्वाधीनता की लौ प्रज्वलित कर दी थी, उनके दिए हुए इन संस्कारों के कारण आगे चलकर वह बालक समाज का संरक्षक एवं गौरव बना। दक्षिण। भारत में हिन्दू स्वराज्य की स्थापना की और स्वतन्त्र शासक की तरह अपने नाम का सिक्का चलवाया तथा ‘छत्रपति शिवाजी महाराज’ के नाम से ख्याति प्राप्त की।

दरअसल, जीजाबाई के पति शाह जी मुगल बादशाह शाहजहाँ ने निजाम के पास काम करते थे। निजाम के पास केवल दो बहादुर सरदार थे – मलिक अम्बर और शाहजी भोंसले। सरदार मलिक अम्बर के देहान्त के बाद युद्ध की पूरी जिम्मेदारी शाहजी पर आ गई। उस समय शाहजी माहुली के किले में थे। इसी का लाभ उठाकर जीजाबाई के पिता और शाहजी के ससुर जाधवराव ने शाहजहाँ का साथ देते हुए माहुली किले पर हमला बोल दिया गया। माहुली किले में जीजाबाई भी थीं। छः माह तक शाहजी ने बहादुरी के साथ लड़ते हुये किले की रक्षा की फिर जीजाबाई को साथ लेकर गुप्त रूप से किला छोड़ दिया। जाधवराव को जब इसका पता चला तो उसने उनका पीछा किया। तब जीजाबाई गर्भवती थीं। युद्ध के चलते उन्हें यात्रा में बहुत कष्ट झेलना पड़ा। काफी सोच-विचार कर शाहजी जीजाबाई को एक सिपाही श्रीनिवास राव के सहारे छोड़कर युद्ध क्षेत्र में आगे बढ़ गये। जीजाबाई की देख-रेख हेतु उन्होंने एक सिपाही श्रीनिवास राव को उनके पास छोड़ दिया। कुछ समय बाद जब मुगल सेना ने जीजाबाई को पकड़ लिया । अब वह अपने पिता की कैद में आ गई थी। जाधवराव ने अपनी बेटी की स्थिति देखकर कहा- “बेटी, तुम इतना कष्ट क्यों उठा रही हो? तुरन्त सिंदखेड़ में मेरे घर चली जाओ। मैं अभी पालकी का प्रबन्ध करता हूँ।” जीजाबाई एक स्वाभिमानी पत्नी थी। उसने निर्भय होकर अपने पिता से कहा – ‘बाबा, यदि आप भोंसला परिवार से बदला लेना चाहते हैं तो पहले मुझसे बदला लो। मैं आपके सामने खड़ी हूँ। जिस दिन मेरा विवाह हुआ और मैंने भोंसले घराने में प्रवेश किया था, तभी से मेरा आपके परिवार से सम्बन्ध समाप्त हो गया था। मैं बहादुर भोंसले परिवार की बहू हूँ। मेरे पति के यहाँ मिलने वाली सूखी रोटी भी आपके पकवान और हीरे-मोतियों से मुझे अधिक प्रिय है। मैं भोंसले परिवार की बहादुर बहू के रूप में मरना चाहुँगी।’ बेटी की खरी-खरी बातें सुनकर जाधवराव क्रोधित होकर बोले – “जीजू! क्या तुम जानती हो कि किसके सामने बोल रही हो?” जीजाबाई ने तपाक से उत्तर दिया – ‘हाँ, मैं जानती हूँ कि मैं मराठों और मेरे परिवार के शत्रु, मुगलों के विश्वासपात्र और अपने पिता के सामने बोल रही हूँ। पिताजी! क्या आप मुझे अब भी छोटी बच्ची समझ रहे हैं? एक मराठी महिला अपने पति के अतिरिक्त किसी से नहीं डरती।’ जीजाबाई ने पिता पर कटाक्ष करते हुये आगे कहा – “जाइए, अपने दुश्मन को पकड़कर मुगलों से इनाम पाइये। यही आपके जीवन का गौरव रह गया है। मुझे आपके संरक्षण की जरा भी आवश्यकता नहीं है। मेरा घर शिवनेरी किला है। वहीं माँ जगदम्बा की अर्चना करते हुए मैं अपना जीवन व्यतीत करूँगी।”

जीजाबाई आत्मसम्मान व स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति थीं। वो कहती थीं “मैं स्वतंत्र राज्य देखना चाहती हूँ” उन्हें अपने देश, धर्म व मराठा वंश पर गर्व था। मुगलों द्वारा अपने पवित्र मन्दिरों को धवस्त होते व लुटते देखकर उन्हें गहरी वेदना होती थी। वह माँ जगदम्बा की मूर्ति के सामने बैठती और विचारों के भँवर में खो जाती थीं। वह माँ से बस यही कहती- “हे माते, मुझे शक्ति दो। मैं मराठों के शक्तिशाली स्वतंत्र राज्य को देखना चाहती हूँ जो अपनी सेना और ध्वज के साथ गरिमापूर्ण चले। माँ, मेरी इस आकाँक्षा को पूरा करो।” जीजाबाई मन-ही-मन मराठों के आत्मसम्मानरहित व्यवहार व मानसिक दुर्बलता को देखकर बहुत व्याकुल हो जाती थी। उन्हें मुगलों की नौकरी-चाकरी करने वाले मराठा सरदारों और जागीरदारों से घृणा हो गई थी। वह यह सोचकर चकित होती थी – ‘क्या इन लोगों का आत्मसम्मान व स्वाभिमान है ही नहीं? अपने धर्म और संस्कृति पर इन्हें जरा भी गर्व नहीं? ये कैसे लज्जाहीन सरदार हैं जो अपनी मातृभूमि और अपने धर्म की रक्षा नहीं कर सकते?’ इसी विचार के साथ जीजाबाई ने शिवाजी के जीवन की दिशा निर्धारित की। जीजाबाई ने इतिहास में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये, जो मराठा साम्राज्य के विस्तार के लिये सहायक साबित हुए। जीजाबाई एक चतुर और बुद्धिमान महिला थी। जीजाबाई शिवाजी को प्रेरणादायक कहानियाँ सुनाकर प्रेरित करतीं थीं।

उनसे प्रेरित होकर ही शिवाजी ने स्वराज्य हासिल करने का निर्णय लिया। उस समय उनकी आयु केवल 17 वर्ष की ही थी। शिवाजी से महान् शासक का निर्माण करने में जीजाबाई का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। मराठा साम्राज्य को स्थापित करने में तथा उसकी नींव को मजबूती प्रदान करने में विशेष योगदान देने वाली जीजाबाई का निधन 17 जून, 1674 ई. को हुआ। उनके बाद वीर शिवाजी ने मराठा साम्राज्य को और फैलाया।

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