भोपाल।
मध्य प्रदेश के धार में मौजूद भोजशाला विवाद एक बार फिर चर्चा में है। इतिहास के पन्नों को पलटने पर पता चलता है कि साल 1034 में राजा भोज के शासनकाल में धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला की स्थापना हुई थी। एक हजार साल पुराने इस ऐतिहासिक स्थल को हाईकोर्ट ने वाग्देवी मंदिर परिसर करार दिया है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है।
मां सरस्वती का था मंदिर
मान्यता है कि भोजशाला मां सरस्वती का मंदिर और विद्या केंद्र था। धार जिले की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, राजा भोज ने 1034 में यहां एक बड़े महाविद्यालय की स्थापना की थी, जिसे बाद में भोजशाला के नाम से ख्याति मिली। बताया जाता है कि इस सभा भवन में माघ, बाणभट्ट, कालिदास, भवभूति, भास्कर भट्ट, धनपाल, मानतुगाचार्य जैसे विद्वान अपनी विद्या का अभ्यास और अध्ययन किया करते थे। स्थापना से लगातार 271 साल तक भोजशाला ज्ञान का केंद्र बनी रही।
कौन थे राजा भोज
राजा भोज परमार वंश के शासक थे और करीब 1010 से 1055 ईस्वी तक मालवा क्षेत्र पर शासन किया। उनकी राजधानी धार नगरी थी, जो आज के मध्य प्रदेश में स्थित है। राजा भोज को सिर्फ एक योद्धा राजा ही नहीं, बल्कि कला, साहित्य, शिक्षा और वास्तुकला के बड़े संरक्षक के रूप में भी याद किया जाता है। 1034 में परमार शासक राजा भोज ने ज्ञान की साधना और मां सरस्वती की आराधना के लिए भोजशाला का निर्माण कराया था।
ऐसे बढ़ा विवाद
वर्ष 1951 में एएसआई ने भोजशाला को संरक्षित स्मारक घोषित किया। 1952 में हिंदुओं ने यहां भोज दिवस मनाना शुरू किया, जिससे तनाव बढ़ा। जवाब में 1953 में मुस्लिम समुदाय ने यहां उर्स मनाना शुरू किया। लंबे समय तक व्यवस्था बनी रही कि शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय नमाज पढ़ता रहा और वसंत पंचमी पर हिंदू समाज पूजा करता रहा। 1961 में इतिहासकार डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर वाग्देवी की प्रतिमा के भारतीय मूल के होने के साक्ष्य प्रस्तुत किए।
अलाउद्दीन खिलजी ने किया था आक्रमण
1269 में अरब मूल के कमाल मौलाना धार आकर बसे थे। वर्ष 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर आक्रमण कर दिया और यहां इस्लामी राज्य की स्थापना की। खिलजी ने भोजशाला समेत कई मंदिरों को क्षतिग्रस्त कर दिया। इसके बाद दिलावर खां गोरी ने वर्ष 1401 में मालवा पर कब्जा किया।
