नवदुनिया प्रतिनिधि, भोपालः पत्रकारिता का पेशा कोई आसान काम नहीं है। घर में, संबंधियों में और रिश्तों में आपेक्षाएं पूरी करते हुए कई बार लोग शिकायतों का अवसर छोड़ देते हैं। आप निरंतर उन लोगों के लिए काम करते हैं, जो आपके लिए प्रत्यक्ष नहीं हैं, लेकिन हैं बहुत ताकतवर।
पत्रकार समाज के लिए काम करते हैं, जो अमूर्त ईकाई है। व्यक्ति आपसे सीधे संपर्क कर लेता है, लेकिन समाज नहीं और समाज की प्रतिक्रिया कई बार बहुत घातक होती है। इसलिए पत्रकारिता का पेशा जोखिम भरा और जिम्मेदारी का काम है। यह कहना है सिद्धपीठ श्रीहनुमत निवास, अयोध्या के पूज्य आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण का।
भोपाल प्रवास के दौरान वे शनिवार को नवदुनिया कार्यालय पधारे थे। आचार्य ने नवदुनिया परिवार के साथ प्रोफेशन, अध्यात्म और रिश्तों को लेकर चर्चा की और जिज्ञासाओं का समाधान किया। उन्होंने कहा कि गोरखवाणी कि पंक्ति खबति न खाईबा, खबति न बोलिवा, धमक न चालिवा। अर्थात तेजी से आवाज करके खाओ नहीं, तेजी से बोलो नहीं और धमक करके चलो नहीं। पत्रकारिता में सूचनाओं में सुचिता हो, सूत्रों का सम्मान करें और भय पैदा न करें।
बाबा गोरखनाथ ने यह बात साधकों के लिए कही है, लेकिन यह पत्रकारिता का भी पाठ है। मनुष्य में यदि मनुष्यता का बोध होगा तो वह हर क्षेत्र में अच्छा होगा, जिसका मन अशुद्ध हो चुका है, उसका निस्तार हो पाएगा, इस बारे में हमारे यहां कोई स्वीकृति नहीं है। अध्यात्मिकता पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि अध्यात्म आत्मावलोकन है।
स्वभाव में जीना अध्यात्म और प्रभाव में जीना भौतिकता है। स्वभाव मनुष्य को सहज करता है। आध्यात्मिक व्यक्ति कभी किसी से प्रभावित नहीं होता। सत, चित और आनंद त्रिपाद है, ये तीनों तत्व जीव और ईश्वर दोनों में हैं। स्वाधीनता और आनंद हमारी प्रवृत्ति है। इस मौके उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा पर भी बात की।
जिज्ञासाओं का किया समाधान, दिखाई राह, ताकि आसान हो जीवन
प्रश्न- प्रोफेशनल और पर्सनल प्रेम को कैसे संतुलित करें?
प्रेम मैनेजमेंट और आत्मबोध सिखाता है। मूल्य बोध हमेशा हित के बारे में कहता है। यदि किसी एक व्यक्ति का त्याग करने से कुल की रक्षा होती है, तो उसका त्याग किया जा सकता है। मोक्ष के लिए किसी का भी त्याग किया जा सकता है। बाकि लोगों को मनाकर संतुष्ट कर लें। यदि नौकरी आपके लिए मिशन नहीं, सिर्फ पैसे कमाने का साधन है, तो नौकरी छोड़कर परिवार को प्रेम और समय दें।
प्रश्न: नकारात्मक प्रतिस्पर्धा से कैसे निपटें?
सकारात्मक प्रतिस्पर्धा समान बल में और नकारात्मक प्रतिस्पर्धा दुबर्लता में होती है। जब प्रतिस्पर्धा में कोई नकारात्मक हो रहा है तो इसका मतलब यह है कि उसके भीतर दुर्बलता पल रही है। ऐसे में प्रतिस्पर्धी से लड़ने के बजाए दुर्बलता से लड़े। विपक्षी कभी जीतता नहीं, बल्कि दुर्बलता हारती है। उत्तम कोटि की प्रतिस्पर्धा स्वयं से होती है। अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार रहें। प्रगति का मतलब सब कुछ पाना नहीं, बल्कि बहुत कुछ छूट जाना है।
प्रश्न: पत्रकारिता में हमें कब एक पक्षीय हो जाना चाहिए?
कभी नहीं। मनुष्य कभी एक पक्षीय नहीं हो सकता। पक्ष मनुष्य की नहीं, पक्षी की प्रवृत्ति है और पक्षी तभी उड़ता है, जब उसके दोनों पक्ष (पंख) सलामत हों। एक पक्षीय व्यक्ति दिव्यांग होता है, जो टेड़ा दिखता है। जिस प्रकार आसमान में पक्षी दो पंखों से उड़ता है, उसकी प्रकार मनुष्य भी सदैव दो पक्षों से आगे बढ़ता है। निष्पक्ष होने का मतलब दो पक्ष होना है। हमने पक्ष से ही जन्म लिया है। एक कोख में दो पक्ष विद्यमान है, ऐसे में निष्पक्षता क्या होती है। किसी एक पक्ष की ओर लुढ़क कर हम न्यायोचित नहीं रह जाते हैं।
प्रश्न: वर्तमान समय में रिश्तों में गर्माहट क्यों कम हो रही है?
हमारे जीवन में एक संतुलन था अध्यात्म और भौतिकवाद का, जो बिगड़ गया है। व्यक्ति भौतिकवादी ज्यादा हो गया है, जिससे संबंध बिगड़ रहे हैं। हम देना कम और पाना ज्यादा चाहते हैं। जिम्मेदारियों से बचना चाहते हैं। संबंधों को चलाने का एक ही मूल मंत्र है कि बिना ताना दिए अपना हिस्सा छोड़ दीजिए। संबंधों को सुधारने का इसके अलावा कोई मार्ग नहीं है। जो आपके द्वारा हिस्सा छोड़ देने के बाद भी आपका नहीं होता वह आपका नहीं है।
