स्वामी रामतीर्थ (1873-1906) विलक्षण प्रतिभा के धनी, महान सन्त, दार्शनिक एवं अद्वैत वेदान्त के ज्ञाता होने के साथ ही गणित विषय के विद्वान भी थे। सांसारिक जीवन से संन्यास लेने से पूर्व वे लाहौर के फोरमन क्रिश्चियन कालेज में अध्यापन कार्य में संलग्न रहे। एक बार स्वामी जी कक्षा में पढ़ा रहे थे, उन्होंने देखा कुछ छात्रों का ध्यान विषय की ओर न होकर आपसी विवाद सुलझाने में लगा है। उन्हें यह उचित नहीं लगा कि उनके विद्यार्थी आपस में वैरभाव रखें और अपनी पढ़ायी पर ध्यान न दें।
अगले दिन कक्षा में आने पर उन्होंने श्यामपट्ट पर चाक से एक रेखा खींच दी और विद्यर्थियों से कहा कि इस रेखा को कौन छोटी कर सकता है। विद्यार्थी आते और रेखा को मिटाकर छोटा करने का प्रयास करते। स्वामी जी ने कहा कि रेखा को मिटाकर छोटा नहीं करना है, ऐसा तो सभी कर लेंगे। बिना मिटाये छोटा करके दिखाना है। विद्यार्थी आश्चर्य से अपने शिक्षक की ओर देखते रहे। स्वामी जी ने उस रेखा से नीचे उससे बड़ी रेखा खींच दी और पूछा, ‘देखो, पहले वाली रेखा छोटी हो गयी?’
विद्यार्थियों ने सहमति में सिर थे, आप में भी हिलाया। स्वामी जी ने कहा कि आप भी ऐसा कर सकते ज्ञान और सामर्थ्य ध्यान नहीं दिया। उन्होंने विद्यर्थियों को समझाया ‘आपस में वैरभाव है किन्तु, आपने रख कर कोई आगे नहीं बढ़ सकता। यदि आगे बढ़ना है तो अपने गुण, अपने कार्य, अपने ज्ञान और कौशल को बढ़ाकर, बिना किसी दूसरे को हटाये, इस रेखा की भाँति आगे बढ़ा जा सकता है। आप सभी अपने गुणों और कौशल को निखारें, आगे बढ़ने में एक दूसरे की सहायता करें, तभी आप सब आगे बढ़ पायेंगे, बड़ा बन पायेंगे।’ शिक्षक होने के साथ ही स्वामी जी आध्यात्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। स्वामी विवेकानन्द जी प्रभावित होकर उन्होंने 1901 में पारिवारिक जीवन त्यागकर संन्यास ले लिया और हिमालय के शान्त प्राकृतिक वातावरण में कठिन तप किया।
स्वामी जी जापान में आयोजित विश्व धर्म सम्मलेन में प्रतिभाग करने के लिये टोकियो गये। भगवा वेशधारी स्वामी रामतीर्थ वहाँ के नागरिकों के लिये कौतुहल का विषय थे। एक सम्भ्रान्त व्यक्ति ने स्वामी जी से पूछा, ‘महोदय आप किसके अतिथि हैं? कहाँ ठहरेंगे?’ स्वामी जी ने उत्तर दिया, ‘मैं जिनका अतिथि बनकर आया हूँ मैं उन्हें अच्छी तरह से पहचानता हूँ किन्तु, मैं उनका नाम नहीं जानता हूँ।’ स्वामी जी का उत्तर सुनकर प्रश्नकर्ता सज्जन हैरान हो गये। उन्होंने कहा, ‘इतने बड़े शहर में बिना नाम पता जाने आप उनके पास पहुँचेंगे कैसे?’ स्वामी जी तुरन्त बोले, ‘जिन्हें मैं जनता हूँ वह, मेरे सामने ही हैं।’ जापानी सज्जन ने आश्चर्यचकित होकर पूछा, ‘कौन हैं वह?’ स्वामी जी ने उनके कन्धे पर हाथ रखते हुए बताया ‘मान्यवर, आप ही वह सज्जन हैं जिनका मैं अतिथि हूँ।’ प्रश्नकर्ता चौंका कि यह कैसा व्यक्ति है जो बिना परिचय के मेरा अतिथि बनना चाह रहा है। स्वामी जी ने उसकी शंका का समाधान करते हुए कहा, ‘चौंके नहीं, मैं “आत्मवत् सर्वभूतेषु” में विश्वास रखता हूँ। इस सृष्टि के सभी प्राणियों को अपना मानता हूँ, इस प्रकार आप भी मेरे स्वजन हैं, मित्र हैं।’
जापानी सज्जन स्वामी जी की बातों से अत्यन्त अभिभूत हो गये। वे स्वामी जी को अपने घर ले गये, उनका आतिथ्य सत्कार करने के साथ ही उनके मिशन के प्रचार-प्रसार में भी पूरा सहयोग दिया। वह स्वामी जी के शिष्य बन गए। स्वामी रामतीर्थ इसी प्रकार अपने सहज और सरल प्रेमपूर्ण व्यवहार से लोगों का मन जीत लेते थे और उन्हें अपना बना लेते थे।