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केले की खेती से एक साल में कमाए 1.65 करोड़

दसवीं में फेल होने के बाद पढ़ाई छोड़ दी, लेकिन खेती में कुछ नया करने का जुनून नहीं छोड़ा। कभी गेहूँ और धान की पारम्परिक खेती से सालभर की मेहनत के बाद महज 15 से 20 हजार रुपये बचते थे। आज वहीं किसान केले की खेती से करोड़ों रुपये का कारोबार कर रहा है। बाराबंकी के दौलतपुर गाँव के पद्मश्री सम्मानित किसान रामशरण वर्मा की कहानी खेती में नयी तकनीक अपनाने और जोखिम उठाने की मिसाल है। टिशू कल्चर तकनीक से केले की खेती को बढ़ावा देने वाले रामशरण आज करीब 250 एकड़ में खेती कर रहे हैं। इस साल उन्होंने 55 एकड़ में केला लगाया, जिससे प्रति एकड़ तीन से चार लाख रुपये मुनाफा होने का दावा है। इस हिसाब से केले की फसल से उनका मुनाफा करीब 1.65 करोड़ रुपये तक पहुँचा।

छः एकड़ जमीन से शुरू किया सफर

बाराबंकी जिला मुख्यालय से करीब 22 किलोमीटर दूर दौलतपुर गाँव में रामशरण वर्मा का फार्म हाउस है। शुरुआत में उनके परिवार के पास छह एकड़ जमीन थी। वर्ष 1988 में उन्होंने खेती शुरू की। उस समय परिवार पारम्परिक तरीके से गेहूँ और धान उगाता था। मेहनत ज्यादा करने के बावजूद आमदनी सीमित रहती थी। रामशरण को लगा कि खेती में बेहतर कमायी के लिये फसलों के साथ उनके उत्पादन का तरीका भी बदलना होगा। इसी सोच के साथ उन्होंने गुजरात और महाराष्ट्र के किसानों के बारे में जानकारी जुटायी। वहाँ जाकर उनके साथ रहे और खेती के तरीके समझे। लौटने के बाद उत्तर प्रदेश में टिशू कल्चर तकनीक से केले की खेती शुरू की। करीब 32 साल से इस तकनीक के जरिये खेती कर रहे रामशरण का कहना है कि सही तकनीक, फसल के समय और बाजार की माँग को समझकर खेती की आमदनी बढ़ायी जा सकती है।

250 एकड़ में खेती, केले से 1.65 करोड़ का मुनाफा

रामशरण के पास शुरुआत में छह एकड़ जमीन थी। बाद में उन्होंने तीन से चार एकड़ जमीन और खरीदी। इसके बाद गांव के किसानों से सहकारिता के आधार पर जमीन लेकर खेती का दायरा बढ़ाया। अब वह करीब 250 एकड़ में खेती कर रहे हैं। इस साल 55 से 57 एकड़ में केले की फसल लगायी थी।

रामशरण के मुताबिक, केले की खेती में एक एकड़ से तीन से चार लाख रुपये तक मुनाफा हो रहा है। यदि 55 एकड़ में प्रति एकड़ न्यूनतम तीन लाख रुपये मुनाफा माना जाये तो कुल रकम 1.65 करोड़ रुपये होती है। उनका कहना है कि खेती पर हर साल तीन से चार करोड़ रुपये खर्च होते हैं, जबकि फसल और बाजार के हिसाब से पाँच से सात करोड़ रुपये तक की रकम वापस आती है। इसी खेती की कमायी से उन्होंने आलीशान फार्म हाउस बनाया है।

15 महीने की जगह 12-13 महीने में तैयार होती है फसल

रामशरण के मुताबिक, टिशू कल्चर तकनीक से तैयार केले की फसल सामान्य फसल के मुकाबले कम समय में तैयार हो जाती है। जहाँ केले की दूसरी फसल को तैयार होने में करीब 15 महीने लगते हैं, वहीं टिशू कल्चर से यह 11 से 12 महीने में तैयार हो सकती है। उत्तर प्रदेश में सर्दी के कारण इसमें 12 से 13 महीने तक लग जाते हैं। गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों में फसल 11 से 12 महीने में तैयार हो जाती है।

रामशरण 15 जून से 15 जुलाई के बीच केले की रोपाई करते हैं। फसल अगले साल अगस्त-सितम्बर तक तैयार हो जाती है। इस दौरान त्योहारों के कारण केले की माँग बढ़ जाती है जिससे अच्छे दाम मिलने की उम्मीद रहती है। उनका कहना है कि केले का आकार 22 से 23 सेंटीमीटर तक होता है और उन्हें 15 से 16 रुपये प्रति किलो तक भाव मिल जाता है।

50 हजार किसान अपना रहे तरीका

रामशरण वर्मा के खेत अब दूसरे किसानों के लिये सीखने का केन्द्र बन गये हैं। उनके मुताबिक, हर साल 14 से 15 हजार किसान उनके पास खेती की तकनीक समझने आते हैं। वह दावा करते हैं कि करीब 50 हजार किसान उनकी तकनीक अपनाकर ढाई लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खेती कर रहे हैं।

उन्होंने अम्बेडकरनगर के एक किसान का उदाहरण भी दिया, जिसने उनसे तकनीक सीखकर तीन एकड़ में केले की खेती की और 24 लाख रुपये का केला बेचा। रामशरण का कहना है कि खेती में नये प्रयोग से केवल किसान की आमदनी नहीं बढ़ती, बल्कि गाँव में रोजगार के अवसर भी पैदा होते हैं।

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