भारत की संत-परंपरा में योगीराज देवराह बाबा का स्थान अत्यंत विशिष्ट और अद्वितीय है। वे केवल एक योगी या तपस्वी नहीं थे, बल्कि जीवंत आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक थे। उनका जीवन रहस्य, तप, करुणा और राष्ट्रकल्याण की भावना से ओत-प्रोत था। देवराह बाबा के जन्म की कोई प्रामाणिक तिथि उपलब्ध नहीं है, किंतु परंपरागत मान्यताओं के अनुसार वे लगभग तीन सौ वर्षों तक जीवित रहे। उनका देहावसान 19 जून 1990 को हुआ।
देवराह बाबा का अधिकांश जीवन गंगा तट पर बीता। विशेष रूप से प्रयागराज में आयोजित कुम्भ मेलों के दौरान वे एक ऊँचे लकड़ी के मंच पर निवास करते थे। यह मंच कई फीट ऊँचा होता था और बाबा जीवनभर पृथ्वी पर नहीं सोए। यह उनका अनोखा व्रत था, जो उनकी कठोर तपस्या और आत्मसंयम का परिचायक था। वे अत्यंत सादा जीवन जीते थे—न कोई संग्रह, न सुविधाएँ, न दिखावा। उनके वस्त्र, भोजन और दिनचर्या सब कुछ न्यूनतम था।
आध्यात्मिक दृष्टि से देवराह बाबा उच्च कोटि के योगी माने जाते हैं। कहा जाता है कि उन्होंने हठयोग, राजयोग और नाथ परंपरा की गहन साधनाएँ की थीं। वे अधिक बोलते नहीं थे। कई बार केवल दृष्टि, संकेत या मौन के माध्यम से ही शिष्यों को मार्गदर्शन दे देते थे। उनके निकट आने वाले लोग एक अद्भुत शांति और ऊर्जा का अनुभव करते थे। अनेक श्रद्धालु मानते हैं कि बाबा में रोग निवारण, अंतर्दृष्टि और भविष्य संकेत करने जैसी सिद्धियाँ थीं, किंतु स्वयं बाबा ने कभी इनका प्रचार या प्रदर्शन नहीं किया।
देवराह बाबा का प्रभाव केवल आध्यात्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं था। वे राष्ट्र और समाज के प्रति भी गहरी चिंता रखते थे। देश के अनेक प्रमुख नेता उनसे आशीर्वाद लेने आते थे। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी भी उनके संपर्क में रहे। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कई वरिष्ठ कार्यकर्ता और प्रचारक भी उनसे प्रेरणा लेते थे। बाबा प्रत्यक्ष रूप से राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करते थे, किंतु राष्ट्र की एकता, संस्कृति और आत्मबल को लेकर उनकी दृष्टि अत्यंत स्पष्ट थी।
प्रकृति के प्रति उनका प्रेम विशेष रूप से उल्लेखनीय था। गंगा को वे केवल नदी नहीं, बल्कि जीवंत माता के रूप में देखते थे। पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संतुलन उनके जीवन व्यवहार में स्वाभाविक रूप से झलकता था, जब यह विषय सार्वजनिक विमर्श में भी नहीं आया था।
योगीराज देवराह बाबा का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची साधना बाहरी प्रदर्शन में नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता, संयम और सेवा में है। उनका तपस्वी जीवन, मौन का प्रभाव और राष्ट्र के प्रति चिंतन आज भी प्रेरणा देता है। वे संत-परंपरा के ऐसे दीपस्तंभ हैं, जिनकी रोशनी शब्दों से नहीं, बल्कि अनुभूति से समझी जाती है।