डॉ. विद्यानिवास मिश्र
“न कोई घर रहेगा, न घरवाला, न घरवाली/ सब होंगे आखेटक/ सब होंगे आखेट / आखेट युग आ गया है, जहाँ घर नहीं होते।” ये कहना था विद्यानिवास मिश्र जी का क्योंकि मिश्र जी ऐसे लेखक थे जो आज के मनुष्य की त्रासदी के बारे में दो टूक कहने से भी नहीं कतराते थे।
हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार, संस्कृत के बड़े विद्वान, भाषाविद और सफल सम्पादक मिश्र जी का जन्म 28 जनवरी 1926 को गोरखपुर जिले के पकड़डीहा गाँव में हुआ था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने देश और विदेश के कई विश्वविद्यालयों में अध्यापन किया। वे सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय और काशी विद्यापीठ के कुलपति भी रहे। इसके अलावा उन्होंने आकाशवाणी, उत्तर प्रदेश सूचना विभाग और नवभारत टाइम्स जैसे संस्थानों में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाईं। पत्रकारिता में रहते हुए उन्होंने भाषा की शुद्धता और मर्यादा पर विशेष ध्यान दिया। कैलिफोर्निया के प्रवास का एक किस्सा बताते हुए मिश्र जी ने कहा कि, जहाँ मैं पढ़ाता था वहाँ मिस क्रिटण्डन नाम की एक महिला काम करती थी उनकी उम्र ज्यादा थी उनके चेहरे पर झुर्रियाँ उभरने लगी थीं। एक दिन वो मेरे पास बैठी थीं। मैनें उनकी तरफ देखा और कहा- मुझे आपको देखकर अपनी माँ की याद आती है। मेरे मुँह से ये बात सुनकर वो भावुक हो गयीं उनकी आँखें नम हो गयीं, उन्होंने कहा- मुझे आजतक किसी ने ऐसा नहीं कहा, इसपर मैनें उनसे कहा- आज से मैं आपको मौसी कहूँगा, उन्होंने आश्चर्य से पूछा कि, मौसी किसे कहते हैं ऐसा इसलिए था क्योंकि शायद विदेशों में रिश्तों की मान्यता या महत्ता भारत जैसी नहीं हैं। उन्होंने मुझे खुद को मौसी कहने की आज्ञा दी और वह मौसी जैसा स्नेह भी करती थी। अक्सर सीजन में फल भिजवाना, अक्सर अपने यहाँ भोजन पर बुलाना उनका स्नेह ही तो था।
विद्यानिवास मिश्र का सबसे बड़ा योगदान ललित निबन्ध के क्षेत्र में माना जाता है। उन्होंने इस विधा को सरल, भावपूर्ण और लोक-संवेदनाओं से भर दिया। उनके निबन्धों में पौराणिक कथाएँ, ऋतुएँ, त्योहार, लोकविश्वास और जीवन-दर्शन सहज रूप में सामने आते हैं। वसंत ऋतु से उन्हें विशेष लगाव था, जिसका वर्णन उनके कई निबन्धों में मिलता है। उन्होंने रामायण, महाभारत और पुराणों के प्रसंगों को वर्तमान जीवन से जोड़कर प्रस्तुत किया। एक बार आकाशवाणी जयपुर के आमन्त्रण पर मिश्र जी ने साल 1994 के 30 नवम्बर और 1 दिसम्बर को आकाशवाणी की राजेन्द्र प्रसाद स्मारक व्याख्यान माला में ‘साधुमन’ और ‘लोकमत’ पर दो व्याख्यान दिए थे, जिनकी शैली ललित निबन्धों की सी थी और जिनके प्रेरणा स्रोत थी, तुलसी के मानस की वह अर्धाली ‘टरत विनय सादर सुनिय करिय विचार बहोरि। करब साधुमत लोकमत नृपनयतिगम निचोरि।’ ये दोनों व्याख्यान ‘स्वरूप विमर्श’ शीर्षक निबन्ध संग्रह में बाद में छपे।
इसी प्रकार जयपुर के विख्यात सम्पादक और वेद विज्ञान के अध्येता कर्पूरचन्द्र कुलिश की प्रेरणा से ‘भारतीय साहित्य परिषद’ द्वारा जयपुर में ‘गीत गोविन्द’ पर उनके व्याख्यान करवाए गए। कोलकाता में भी ‘गीत गोविंद’ पर व्याख्यान आयोजित किए गए थे। इन सब का संपादित और परिवर्धित रूप है, उनका प्रसिद्ध ग्रंथ “राधा माधव रंग रँगी।” यह समूचा ग्रंथ ललित निबन्ध की शैली में लिखा गया है। वे भारतीय संस्कृति और कला के गहरे जानकार थे। खजुराहो की मूर्तिकला पर उनके विचारों ने लोगों को नई दृष्टि दी। उनका मानना था कि वहाँ की कलाकृतियाँ केवल भोग का प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन और मोक्ष के दर्शन से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए देश-विदेश में अनेक सम्मेलनों में भाग लिया और हिन्दी को वैश्विक पहचान दिलाने में योगदान दिया। मिश्र जी से यह बात पाकिस्तान के एक युवक ने कही थी, मिश्र जी ने घटना बताते हुए कहा कि- मैं एयरपोर्ट पर पहुँचा मुझे घर लौटना था लेकिन अगली फ्लाइट में अभी वक्त था। मैं सोच में था कि कहाँ स्नान करूँ, कहाँ भोजन करूँ इतने में एक युवक आया उसने मुझसे पूछा उसे जैसे ही पता चला कि मैं भारत से हूँ। वह युवक मुझे एक होटल में ले गया वहाँ मैंने स्नान किया और फिर वह मेरे लिए भोजन लाया इसके बाद हम दोनों एयरपोर्ट पहुँचे जहाँ उस युवक ने मुझसे कहा- “ गंगा को मेरा सलाम कहिएगा, मेरा नाम कहीं न लीजिएगा, वतन तो वतन होता है मुल्क बदल जाए लेकिन वतन नहीं बदलता ।” और यह बात कहकर वो भावुक हो गया उसके साथ मैं भी।
अपने व्यक्तिव्यंजक निबन्ध-संग्रहों के माध्यम से डॉ. मिश्र ने मनुष्य की विभिन्न मानसिक स्थितियों की व्यंजना करते हुए लौकिक, सांस्कृतिक एवं भौगोलिक स्थितियों का आंकलन और सहृदय के मन में उठने वाले उद्वेलन का प्रभविष्णु अंकन किया है। कविमना डॉ. मिश्र ने अवकाश के क्षणों में कविताएँ भी लिखी हैं और इनमें उनका चित्त निर्बन्ध होकर विचरण करता है। लेकिन अपने आस्थावादी स्वर के बावजूद समकाल के प्रश्नों से जूझते हुए अपने उत्तर गीतगोविन्द कविता-संकलन की एक कविता में आप आज के मनुष्य की त्रासदी के बारे में दो टूक कहने से भी नहीं कतराते- “न कोई घर रहेगा, न घरवाला, न घरवाली/ सब होंगे आखेटक/ सब होंगे आखेट / आखेट युग आ गया है, जहाँ घर नहीं होते।” सत्यशोधन की महत्त्वाकांक्षा से प्रेरित होकर ही पं. विद्यानिवास मिश्र ने महाभारत का काव्यार्थ-जैसे कालजयी ग्रंथ की रचना की। विद्यानिवास जी के अनुसार जीवन की पवित्रता ही महाभारत के महासत्य की पीठिका है। इस महासत्य की कसौटी है अहिंसा, करुणा एवं भूतानुकम्पा।
विद्यानिवास मिश्र राज्यसभा के सदस्य भी रहे और उन्हें मूर्तिदेवी पुरस्कार तथा शंकर सम्मान जैसे प्रतिष्ठित सम्मान मिले। उनका जीवन हिन्दी भाषा, भारतीय संस्कृति और लोकचेतना के प्रति समर्पित रहा। हिन्दी साहित्य जगत में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। विद्यानिवास जी भारतीयता के अद्वितीय प्रवक्ता हैं और आपकी अप्रतिम वाग्मिता का सभी लोहा मानते हैं। एक सर्जक और चिन्तक के रूप में उत्कर्ष के लिए डॉ. विद्यानिवास मिश्र को साहित्य अकादेमी, अपने सर्वोच्च सम्मान, महत्तर सदस्यता से विभूषित करती है।