वचनेश त्रिपाठी की लेखनी केवल शब्द नहीं, क्रान्ति की जलती मशाल थी

वचनेश त्रिपाठी की लेखनी केवल शब्द नहीं, क्रान्ति की जलती मशाल थी

वचनेश त्रिपाठी की लेखनी केवल शब्द नहीं, क्रान्ति की जलती मशाल थी, जिसने हिन्दूत्व और भारतीय इतिहास को भाव, सत्य और तेज से जीवन्त किया। उनका सम्पादन राष्ट्रबोध की साधना था जहाँ साहित्य, पत्रकारिता और स्वाधीनता का स्वर एक होकर बोलता था।
24 जनवरी, 1914 को यूपी के हरदोई के संडीला में श्री महावीर प्रसाद त्रिपाठी के घर में जन्मे वचनेश जी का असली नाम पुष्करनाथ था। सामान्य परिवार के होने के कारण उनकी शिक्षा कक्षा बारह से आगे नहीं हो पायी लेकिन व्यावहारिक ज्ञान उनमें सागर की तरह था। 1935 ई. में मात्र 15 वर्ष की आयु में मैनपुरी केस के फरार क्रान्तिकारी देवनारायण भारतीय के सम्पर्क में आए और स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय होने का संकल्प लिया। उन्होंने कई जगह काम किया लेकिन पर उग्र स्वभाव और खरी बात के धनी होने के कारण कहीं टिके नहीं। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वचनेश त्रिपाठी ने क्रान्ति कथाओं को भी स्वर दिए। आजादी के महासमर में कूदने की प्रेरणा भी उन्हें एक बालिका के बलिदान की कथा से मिली। वो आजादी की मासूम सिपाही थी, जिसे अंग्रेजों ने जलाकर मार दिया था। 1857 में विद्रोहियों के नेता धुंधुपन्त नाना साहब अंग्रेजों से टक्कर ले रहे थे। पराजय भांपकर उन्होंने भूमिगत होने का निश्चय किया। निकलते समय उनकी पुत्री मैना कानपुर के बिठूर स्थित महल में ही रह गईं। महल को ध्वस्त करने पहुंचे तत्कालीन अफसरों ने उसे पकड़ लिया। यातनाएं दीं और फिर जिन्दा जला दिया। बलिदान की इस कथा ने किशोर वचनेश को इतना प्रभावित किया कि वो आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।

इधर, अटल बिहारी वाजपेयी के सान्निध्य में उनकी पत्रकारिता निखरी और वे राष्ट्रधर्म, पांचजन्य, तरुण भारत जैसे पत्रों के प्रभावी सम्पादक बने। अटल बिहारी वाजपेयी जब संघ के विस्तारक होकर संडीला भेजे गये, तो वे वचनेश जी के घर पर ही रहते थे। लखनऊ से जब मासिक राष्ट्रधर्म, साप्ताहिक पांचजन्य और दैनिक स्वदेश का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ, तो इन सबका काम अटल जी पर ही था। उन्होंने वचनेश जी की लेखनी से प्रभावित होकर उन्हें लखनऊ बुला लिया। 1960 में वे तरुण भारत के सम्पादक बने। 1967 से 73 तक और फिर 1973 से 75 तक पांचजन्य के सम्पादक रहे। इसी बीच 1975 से 84 तक वे राष्ट्रधर्म के सम्पादक भी बने। क्रान्तिकारी इतिहास में अत्यधिक रुचि के कारण वे जिस भी पत्र में रहे, उसके कई ‘क्रान्ति विशेषांक’ निकाले, जो अत्यधिक लोकप्रिय हुए।

सम्पादन के साथ-साथ वचनेश जी ने अनेक पुस्तकें लिखीं। 1942 में भूमिगत पत्र ‘चिनगारी’ निकाला और उसका सम्पादन भी किया। मैना के बलिदान पर आधारित उपन्यास लिखने के बाद वचनेश जी उसे प्रकाशित कराना चाहते थे। पुस्तक की भूमिका डॉ. वृन्दावन लाल वर्मा से लिखवा भी ली लेकिन प्रकाशन की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी तो उन्होंने खुद ही इसे छपवाने की योजना बनाई। उधार लिया और पत्नी के गहने तक गिरवी रखे। वह उपन्यास ‘विद्रोही की कन्या’ जब प्रकाशित होकर सामने आई तो धूम मच गई। बाद में उनकी लिखी वे आजाद थे, शहीद, मुक्त प्राण, अग्निपथ के राही, सुकरात का प्याला, गोदावरी की खोज, सूरज के बेटे और जरा याद करो कुर्बानी, इतिहास के झरोखे से, यह पुण्य प्रवाह हमारा आदि श्रृंखला की पुस्तकें बहुत लोकप्रिय हुईं।

वचनेश जी ने ‘क्रान्तिमूर्ति दुर्गा भाभी’ पुस्तक भी लिखी, जिसे सरकार ने छपवाया। कहानी, कविता, संस्मरण, उपन्यास, इतिहास, निबन्ध, वैचारिक लेख आदि लिखा। कह सकते हैं कि वचनेश जी ने लेखन की सभी विधाओं में उन्होंने प्रचुर कार्य किया। पत्रकारिता एवं साहित्य में उनके इस योगदान के लिए 2001 में उन्हें ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया। वरिष्ठ साहित्यकारों और पत्रकारों को उनके योगदान के लिए माँ आशा फाउंडेशन जैसी संस्थाओं द्वारा इन्ही के नाम पर वचनेश त्रिपाठी स्मृति सम्मान पुरस्कार की शुरुआत की गयी। जो साहित्य, संस्कृति और देशभक्ति को बढ़ावा देने वाले व्यक्तियों को सम्मानित करता है।
वचनेश जी का क्रान्तिकारियों से अच्छा सम्पर्क था। वचनेश जी ने स्वतन्त्रता संग्राम में क्रान्तिकारियों के योगदान को लिपिबद्ध करा कर उसे राष्ट्रधर्म, पांचजन्य आदि में प्रकाशित किया। वचनेश जी जब क्रान्तिकारी इतिहास पर बोलते थे, तो उसे कोई चुनौती नहीं दे सकता था क्योंकि अधिकांश तथ्य उन्होंने स्वयं जाकर एकत्र किये थे। 1984 में सम्पादन कार्य से अवकाश लेने के बाद भी उनकी लेखनी चलती रही। पांचजन्य, राष्ट्रधर्म आदि में उनके लेख सदा प्रकाशित होते रहे। कोलकाता की प्रसिद्ध संस्था ‘श्री बड़ाबाजार कुमार सभा’ ने उन्हें ‘डा. हेडगेवार प्रज्ञा पुरस्कार’ से अलंकृत किया। खादी का कुर्ता-पाजामा और कंधे पर थैला उनकी स्थायी पहचान थी। 92 वर्ष की उम्र में 30 नवम्बर, 2006 को लखनऊ में उनका देहान्त हो गया। उनकी स्मृति में राष्ट्रधर्म मासिक की ओर से वार्षिक व्याख्यानमाला का आयोजन किया जाता है।

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