स्वावलम्बन व संवेदना का संगम महामानव रज्जू भैया
प्रो फेसर राजेन्द्र सिंह, जिन्हें दुनिया आदर से ‘रज्जू भैया’ कहती है, का जीवन इस बात का ज्वलन्त प्रमाण है कि सच्बा बड़प्पन पद या प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि स्वभाव की सरलता में निहित होता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक जैसे सर्वोच्च और प्रभावशाली पद पर आसीन होने के बावजूद, रज्जू भैया का जीवन किसी तपस्वी से कम नहीं था। वे ‘सादा जीवन, उच्ब विचार’ की सूक्ति का जीवन्त विग्रह थे। उनके जीवन में स्वावलम्बन केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक व्रत था। संघ प्रमुख बनने के बाद भी अपनी दिनचर्या में उन्होंने किसी सेवक की सहायता लेना स्वीकार नहीं किया। प्रवास के दौरान वे जिस भी कार्यकर्ता के घर रुकते, सूर्योदय से पूर्व ही उठकर अपने वस्त्र स्वयं धो लेते थे। जब कार्यकर्ता संकोचवश उनसे सेवा का आग्रह करते, तो रज्जू भैया अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ कहते, “पद दायित्व बदलता है, स्वभाव नहीं, अपने निजी कार्यों के लिये दूसरों पर निर्भर होना एक स्वस्थ व्यक्ति को शोभा नहीं देता।” यह छोटी सी बात कार्यकर्ताओं के लिये जीवन भर का पाठ बन जाती थी।
शिक्षक नहीं अभिभावक थे
रज्जू भैया के व्यक्तित्व का सबसे संवेदनशील पहलू एक ‘अभिभावक शिक्षक’ के रूप में उभरता है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन के दौरान वे केवल भौतिकी के सूत्र नहीं समझाते थे, बल्कि अपने छात्रों के जीवन की कठिनाइयों को भी सुलझाते थे। वे एक ऐसे ‘गुप्त दानी’ थे, जिनका बायां हाथ भी नहीं जानता था कि दाहिने हाथ ने क्या दान दिया है। आर्थिक रूप से कमजोर न जाने कितने ही मेधावी छात्रों की फीस उन्होंने अपनी जेब से भरी, लेकिन इस शर्त के साथ कि उस छात्र को कभी पता न चले कि मदद किसने की है। वे छात्र के आत्मसम्मान को कभी ठेस नहीं पहुँचाना चाहते थे। यह उनकी संवेदनशीलता की पराकाष्ठा थी। जब उनके शिष्य डॉ. मुरली मनोहर जोशी देश के केन्द्रीय मंत्री बने और एक सार्वजनिक मंच पर उन्होंने प्रोटोकॉल तोड़कर रज्जू भैया के चरण स्पर्श किये, तो रज्जू भैया ने उन्हें गले लगाकर यही सन्देश दिया कि ‘सत्ता और पद अस्थायी हैं, लेकिन ज्ञान और गुरु- शिष्य का सम्बन्ध शाश्वत है.
सरल व्यक्तित्व के धनी..
रज्जू भैया की सरलता का एक और अद्भुत उदाहरण उनकी यात्राओं में देखने को मिलता था। वे हमेशा सामान्य जन की तरह रेल के साधारण डिब्बों में यात्रा करना पसन्द करते थे। स्टेशन पर जब स्वयंसेवक उनका सामान उठाने के लिये लपकते, तो वे अपना छोटा सा सूटकेस कसकर पकड़ लेते और हँसते हुए कहते, ‘अपना बोझ मैं स्वयं उठा सकता हूँ, जिस दिन न उठा पाऊँ, समझ लेना रज्जू अब बूढ़ा हो गया है।’ उनकी यह विनोदप्रियता और सहजता उन्हें कार्यकर्ताओं के हृदय का सम्राट बनाती थी।
परम्परा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण.….
वे अंधानुकरण के घोर विरोधी थे और हर परम्परा को तर्क की कसौटी पर कसते थे। उनका मानना था कि परम्परा का सम्मान आवश्यक है, लेकिन यदि वह समय के साथ
वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर खरी न उतरे, तो उसमें सुधार करने का साहस भी हममें होना चाहिये।
व्यक्ति नहीं विचार थे…….
रज्जू भैया का सम्पूर्ण जीवन एक ऐसी किताब की तरह है, जिसके हर पन्ने पर त्याग, तपस्या और तार्किकता की स्याही से राष्ट्रभक्ति की गाथा लिखी गयी है। उन्होंने दिखाया कि कैसे एक व्यक्ति विज्ञान की ऊँचाइयों को छूते हुए भी जमीन से जुड़ा रह सकता है। उनकी धवल मुस्कान, खादी के वस्त्र और स्नेहपूर्ण वाणी आज भी उन अनगिनत लोगों की स्मृतियों में जीवित है, जिनका जीवन उनके स्पर्श मात्र से बदल गया। रज्जू भैया केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार थे- एक ऐसा विचार जो हमें निरन्तर याद दिलाता रहेगा कि जीवन की सार्थकता स्वयं के लिये जीने में नहीं, बल्कि तिल-तिल कर समाज के लिये जलने में है।
ज्ञान का अन्तिम लक्ष्य सेवा……
आज के युग में, जब शिक्षा का बाजारीकरण हो रहा है और विज्ञान का उपयोग विनाश के लिये हो रहा है, रज्जू भैया का जीवन हमें याद दिलाता है कि ज्ञान का अन्तिम लक्ष्य सेवा है और जीवन की सार्थकता राष्ट्र के लिये जीने में है। उनकी यह विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिसे सदैव एक प्रकाश स्तम्भ का कार्य करती रहेगी। 14 जुलाई 2003 को जब वे पंचतत्व में विलीन हुए, तो देश ने केवल एक संघ प्रमुख को नहीं खोया, बल्कि एक महान वैज्ञानिक, एक आदर्श शिक्षक और एक तपस्वी समाज-
सेवी को खो दिया।
