अधिकारों से पहले कर्तव्य पूर्ति का भाव रखें सभी नागरिक – डॉ. कृष्ण गोपाल जी

नालागढ़, हिमाचल प्रदेश। संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त 02 फरवरी को आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी में मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने संघ की सौ वर्षों की यात्रा के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तन के पञ्च परिवर्तन (सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, नागरिक कर्तव्य और स्व भाव जागरण) पर विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि गौरवशाली इतिहास होने के बावजूद अपना देश लगभग एक हजार वर्षों तक पराधीन रहा। पराधीनता ने हिन्दू समाज को आत्मकेन्द्रित बना दिया, जिससे एकत्व और संगठन का अभाव हो गया। हिन्दू समाज को संगठित करने के उद्देश्य से डॉ. हेडगेवार जी ने सन् 1925 में विजयादशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। हिन्दू की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति किसी मत-पंथ को मानता हो, किसी भी पूजा पद्धति को अपनाता हो, अगर वह इस भारत भूमि को अपनी माता मानता है तो वह हिन्दू है। हिन्दुत्व एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह एक विशाल पुस्तकालय के समान है।

उन्होंने कहा कि आज देशभर में संघ की लगभग 83 हजार शाखाएं चलती हैं। स्वयंसेवकों द्वारा संचालित 40 से अधिक संगठन राष्ट्र पुनरुत्थान के कार्य में रत है। पंच कपरिवर्तन के माध्यम से समाज परिवर्तन पर उन्होंने कहा कि हमारा परिवार संस्कारों का केंद्र बने, मातृभाषा में व्यवहार हो, स्व का भाव जागृत करने के लिए अपने इतिहास की गौरवशाली परम्परा की जानकारी, स्वाभिमान की भावना, अपने पूर्वजों की उपलब्धियों पर गर्व की अनुभूति, पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन का संकल्प, समाज समरसता से युक्त, ऊंच-नीच की भावना से मुक्त बने एवं समाज के सभी नागरिक अपने अधिकारों से पहले कर्तव्य पूर्ति का भाव रखें।

प्रमुख जन गोष्ठी में उद्योगपति, प्रशासनिक सेवा अधिकारी, व्यापारी, चार्टेड अकाउंटेंट, पूर्व सैनिक, शिक्षाविद्, चिकित्सक, अधिवक्ता, प्रोफेसर, अभियंता, राष्ट्रीय खिलाड़ी, कथावाचक और विभिन्न सामाजिक धार्मिक संगठनों से 262 प्रमुख लोग उपस्थित रहे।

गोष्ठी के समापन पर आशीर्वचन में श्री श्री 1008 जगद्गुरु विकासदास जी महाराज ने कहा कि संघ के कार्य को समाज का सहयोग मिले तथा समाज की सहभागिता बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि देश की एकता एवं अखंडता को मजबूती देने के लिए सकल हिन्दू समाज को संगठित होने की आवश्यकता है।

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