भाऊराव देवरस: सजीव अस्तित्वरूप
भाऊराव देवरस लखनऊ आए थे। पुराने कुछ सहयोगी उनसे बात कर रहे थे। अचानक वे बोल पड़े, ‘सुनो! डॉ. हेडगेवार की पीढ़ी के लोग एक-एक कर चले गए। दो-चार बचे हैं। मेरा नंबर तो पहले है।’ यह बात है, 9 मार्च, 1992 की। कुछ दिनों बाद ही पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जन्मस्थली नगला चंद्रभान में…