बचपन में पाँच वर्ष की उम्र में ही सिर से पिता का साया उठ गया। जब उनके शव को श्मशान ले जाने की तैयारी की जा रही थी, उसी समय व्यास जी ने अपनी माँ से पूछा था-“अम्मा अब मुझे पढ़ाएगा कौन?” कुछ दिनों पहले ही मैंने क ख ग……. पढ़ना शुरू किया था। अम्मा का आँसू भरा उत्तर था- मैं पढ़ाऊँगी।” उन्होंने अपना वचन पूरी तरह निभाया भी।
बहराइच जिले में 10 मार्च 1934 को जन्मे प्रख्यात लेखक, पत्रकार व सम्पादक लल्लन प्रसाद व्यास का सम्पूर्ण जीवन आध्यात्मिक साहित्य प्रकाशन के कार्य में समर्पित रहा। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा अपने जिले में ही हुई। जब व्यास जी सातवीं में थे तो किसी पारिवारिक अनुष्ठान में हरिद्वार गए। वहाँ मनसादेवी माता मन्दिर में दर्शन के बाद मनौती मांगी -हे ! जगदम्बा, मुझे हाईस्कूल पास करा दो। हाईस्कूल पास होने के बाद विश्वविद्यालय जाने का सपना देखने लगे। यह सपना और किसी विश्वविद्यालय के लिए नहीं, केवल काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए था क्योंकि व्यास जी इसके संस्थापक महामना मालवीय जी के जीवन से बहुत प्रभावित थे।
पिताजी की मृत्यु के बाद इनकी मां ने इनके और छोटे भाई के भविष्य को ध्यान में रखते हुए सारे गहने बेच दिए और कुछ कर्ज लेकर दो पुराने मकानों के साथ तीन दुकानों को गिरवाकर नई बनवा दी। जिससे 120 रु. प्रतिमाह किराया आता था। इसमें से सौ रुपए मां, व्यास जी को बनारस भेज देती थीं जिसमें विश्वविद्यालय की फीस, किताब-कापियाँ और शहर में रहने खाने के खर्च पूरे होते थे। शेष 20 रुपये में मां और छोटा भाई किसी प्रकार काम चलाते थे। काशी विश्वविद्यालय से बी.कॉम करने के बाद व्यास जी ने आगे की पढ़ाई जारी नहीं रखी। पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते नौकरी शुरु कर दी किन्तु दो-तीन माह में ही स्वाभिमान ने जोर मारा और इन्होंने स्थायी सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया।
नौकरी के दौरान प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्रिका धर्मयुग में एक दो लेख जाने लगे थे फिर 1956 में मात्र 23 वर्ष की उम्र में लखनऊ के प्रसिद्ध दैनिक स्वतन्त्र भारत में सहायक सम्पादक लेखन का काम शुरु कर दिया। लेखन व पत्रकारिता के साथ हिन्दी में एम.ए. किया इसी बीच राजनैतिक दवाब के चलते स्वतन्त्र भारत से इस्तीफा देकर ज्ञान भारती के सम्पादक बन गए। फिर अगस्त 1962 में प्रकाशित बलिदान अंक और इसके बाद 26 जनवरी को इसका ‘देश रक्षा’ के अंक में एक साथ कई विद्वानों, राजनेताओं, सन्त-महात्माओं, सेनापतियों और सांस्कृतिक विभूतियों के लेख छपे थे, ऐसा शायद पहली बार हुआ था जिससे इनका मनोबल बढ़ा।
इसके बाद व्यास जी ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए “धर्मयुग” जैसे शिखर के हिन्दी साप्ताहिक में जीवित क्रान्तिकारियों पर एक लेखमाला प्रकाशित करना शुरु किया जिससे उनके जीवन की करूणा या दयनीय स्थिति भारत की जनता को पता चले और वे द्रवित होकर उनकी कुछ आर्थिक सहायता करें, फलस्वरूप अनेक सहृदय लोगों ने इन जीवित क्रान्तिकारियों की कुछ-न-कुछ सहायता की। बलिदानी इतिहास के प्रसिद्ध शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की बहन की सहायता तो स्वयं यूपी की तत्कालीन मुख्यमंत्री ने भी लेख पढ़कर ही की थी।
7 मई, 1964 को सौभाग्यवश व्यास जी को दक्षिण-पूर्व एशिया की यात्रा का अवसर मिला। इस यात्रा में इन्होने पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया या सुदूर पूर्व के देशों में भ्रमण किया। जिससे इनके जीवन को एक विस्तृत आयाम प्राप्त हुआ। इन्होंने विश्व रामायण सम्मेलनों के माध्यम से भगवान श्रीराम का कार्य व इतिहास सम्पूर्ण विश्व तक पहुँचाने में महती भूमिका निभायी।
सांस्कृतिक लेखक और विश्व पर्यटक के रूप में हिन्दी जगत में ख्याति अर्जित करने के बाद साल 1983 में विश्व साहित्य संस्कृति संस्थान नामक सांस्कृतिक संस्था की स्थापना की। इन्होंने भारत सहित 25 देशों में 22 अन्तर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलनों की अभूतपूर्व श्रृंखला का आयोजन श्रीराम जी की कृपा से किया। इसके पूर्व नागपुर के प्रथम और मारीशस के द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलनों में सहयोग किया।
व्यास जी का कहना है कि- मेरे मन ने महाकवि गोस्वामी तुलसीदास के दो भावों को अपना लिया। ‘स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा’ अर्थात आत्मसुख सन्तोष के लिये उन्होंने रामकथा लिखी से अन्त में ‘पायो परम विश्रामु राम समान प्रभु नहीं काहूं’ अर्थात ‘रामकथा लिखकर जीवन में परम विश्राम मिल गया, राम के समान कोई स्वामी नहीं है।’
1984 में व्यास जी नैमिषारण्य के स्वामी नारदानन्द जी के सम्पर्क में आकर आध्यात्मिक प्रकाशन जगत का लोकप्रिय व्यक्ति बन गये थे। 12 नवम्बर 2012 को इनका निधन हो गया। लल्लन प्रसाद व्यास जी ने दैनिक स्वतंत्र भारत के सह-सम्पादक के रूप में पत्रकारिता प्रारम्भ करके तरुण भारत की स्थापना एवं सम्पादन से लेकर ज्ञान भारती, प्राची दर्शन, आलोक भारती और हिन्दी प्रथम विश्व पत्रिका विश्व हिन्दी दर्शन के सम्पादन तक लगभग 5 दशक की पत्रकारिता जगत की यात्रा में अनेक कीर्तिमान स्थापित किए हैं।