सनातन संस्कृति में संस्कारों का बड़ा महत्व है। संस्कारों की सम्पन्नता से शारीरिक, मानसिक आदि सभी परिशुद्धियाँ (पूर्ण शुद्धि) होती हैं। मानव जीवन को शुद्ध करने की चरणबद्ध प्रक्रिया का नाम संस्कार है। लौकिक जीवन में मनुष्य आनन्द का संचय करते हुए त्रुटि रहित परम लक्ष्य की प्राप्ति संस्कारों से ही करता है। ऐसे में संस्कारों को जानना सबके लिये आवश्यक है।
संस्कारों की ज्ञान प्राप्ति की इस यात्रा में सर्वप्रथम संस्कार शब्द का अर्थ समझने का प्रयास करते हैं। संस्कार शब्द का अर्थ ही है, दोषों का परिमार्जन (त्रुटियाँ हटाना) करना। जीव के दोषों और कमियों को दूरकर उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन चारों पुरुषार्थ योग्य बनाना ही संस्कार का उद्देश्य है।
शबर स्वामी ने संस्कार शब्द का अर्थ बताते हुए कहा है कि, ‘संस्कारों नाम स भवति यस्मिन् जाते पदार्थो भवति योग्यः कश्चिदर्थस्य।’ अर्थात संस्कार वह है, जिसके होने से कोई पदार्थ या व्यक्ति किसी कार्य के लिये योग्य हो जाता है। तन्त्रवार्तिक के अनुसार ‘योग्यतां चादधानाः क्रियाः संस्काराः इत्युच्यन्ते।’ अर्थात संस्कार वे क्रियाएँ तथा रीतियाँ हैं, जो योग्यता प्रदान करती हैं। यह योग्यता भी दो प्रकार की होती है। प्रथम है पापमोचन से उत्पन्न योग्यता तथा नवीन गुणों से उत्पन्न योग्यता। संस्कारों से नवीन गुणों की प्राप्ति तथा पापों या दोषों का मार्जन होता है। ऐसे में सबसे पहले बात आती है कि संस्कार कितने प्रकार के होते हैं? अब संस्कारों की संख्या देखी जाये तो इस विषय में स्मृतिशास्त्र में मतभेद पाया जाता है। कहीं 48 संस्कार तो कहीं 25 और कहीं 16 संस्कार बतलाये गये हैं।
ऋषि जातुकर्ण्य ने ब्राह्म संस्कार की संख्या सोलह बतलायी है। जो हैं-
1. गर्भाधान, 2. पुंसवन, 3. सीमन्तोन्नयन, 4. जातकर्म, 5. नामकरण, 6. अन्नप्राशन, 7. चूडाकरण, 8. उपनयन, 9. वेदारम्भ, 10. ब्रह्मवर्त, 11. वेदव्रत, 12. गोदान, 13 समावर्तन, 14. विवाह, 15. ब्रह्मावर्त और 16. अन्त्यकर्म
इसी प्रकार महर्षि ऑगराने पूर्वोक्त गर्भाधानादि षोडश संस्कारों के साथ आग्रयण, अष्टका, श्रावणीकर्म, आश्वयुजीकर्म, प्रत्यवरोहण, दर्शश्राद्ध, वेदारम्भ, वेदोत्सर्जन, प्रतिदिन सम्पन्न किये जाने वाले पंच महायज्ञ इनको मिलाकर पच्चीस संस्कार स्वीकार किये हैं। गौतम स्मृति में चालीस संस्कारों का वर्णन है। अन्यत्र आठ गुणों के साथ अड़तालीस संस्कारों का उल्लेख हुआ है। इस प्रकार सनातन संस्कृति में संस्कारों का विशेष स्थान है.
भिन्न-भिन्न ऋषियों द्वारा बताये गये भिन्न-भिन्न संस्कार
संस्कार-विमर्शक प्रधान ग्रन्थों में भिन्न-भिन्न प्रकार एवं नामों से संस्कारों की नामावली दी गयी है। इसका संक्षिप्त विवरण यहाँ प्रस्तुत है-
आश्वलायनगृह्यसूत्र
1. विवाह, 2. गर्भाधान, 3. पुंसवन, 4. सीमन्तोन्नयन, 5. जातकर्म, 6. नामकरण, 7. चूडाकरण, 8. उपनयन, 9. समावर्तन और 10. अन्त्येष्टि।
बौधायनगृह्यसूत्र
1. विवाह, 2. गर्भाधान, 3. पुंसवन, 4. सीमन्तोन्नयन, 5. जातकर्म, 6. नामकरण, 7. उपनिष्क्रमण, 8. अन्नप्राशन, 9. चूडाकरण, 10. कर्णवेध, 11. उपनयन, 12. समावर्तन और 13. पितृमेध।
पारस्करगृह्यसूत्र
1. विवाह, 2. गर्भाधान, 3. पुंसवन, 4. सीमन्तोन्नयन, 5. जातकर्म, 6. नामकरण, 7. निष्क्रमण, 8. अन्न-प्राशन, 9. चूडाकरण, 10. उपनयन, 11. केशान्त, 12. समावर्तन और 13. अन्त्येष्टि।
वाराहगृह्यसूत्र
4. 1. जातकर्म, 2. नामकरण, 3. दन्तोद्गमन, अन्नप्राशन, 5. चूडाकरण, 6. उपनयन, 7. वेदव्रत, 8. गोदान, 9. समावर्तन, 10. विवाह, 11. गर्भाधान, 12. पुंसवन और 13. सीमन्तोन्नयन।
वैखानसगृह्यसूत्र
1. ऋतुसंगमन, 2. गर्भाधान, 3. सीमन्तोन्नयन, 4. विष्णुबलि, 5. जातकर्म, 6. उत्थान, 7. नामकरण, 8. अन्नप्राशन, 9. प्रवासागमन, 10. पिण्डवर्धन, 11. चौलक, 12. उपनयन, 13. पारायण, 14. व्रतबन्धविसर्ग, 15. उपाकर्म, 16. उत्सर्जन, 17. समावर्तन और 18. पाणिग्रहण
मीमांसा दर्शन अनुसार
1. गर्भाधान, 2. पुंसवन, 3. सीमन्तोन्नयन, 4. जातकर्म, 5. नामकरण, 6. अन्नप्राशन, 7. चूडाकरण, 8. उपनयन, 9. ब्रह्मव्रत, 10. वेदव्रत, 11. समावर्तन, 12. विवाह, 13. अग्न्याधान, 14. दीक्षा, 15. महाव्रत और 16. सन्यास ।
व्यासस्मृति अनुसार
1. गर्भाधान, 2. पुंसवन, 3. सीमन्तोन्नयन, 4. जातकर्म, 5. नामकरण, 6. निष्क्रमण, 7. अन्नप्राशन, 8. वपनक्रिया (या चूडाकरण), 9. कर्णवेध, 10. उपनयन (व्रतादेश), 11. वेदारम्भ, 12. केशान्त, 13. समावर्तन, 14. विवाह, 15. विवाहाग्निपरिग्रह तथा 16. त्रेताग्नि-संग्रह।