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जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के कारण यूरोप सहित अन्य देश सभ्यतागत संकट का सामना कर रहे

जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के कारण यूरोप सहित अन्य देश सभ्यतागत संकट का सामना कर रहे

काशी। प्रज्ञा प्रवाह एवं दीनदयाल उपाध्याय पीठ के संयुक्त तत्वाधान में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय स्थित समाज विज्ञान संकाय के सभागार में आयोजित ”जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के कारण सभ्यतागत संकट व्याख्यान में प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय सह संयोजक चन्द्रकांत जी ने कहा कि जनसांख्यिकीय परिवर्तन से सभ्यतागत संकट यूरोप में विकराल रूप धारण कर रहा है। किसी देश में शरणार्थियों की संख्या बढ़ने पर उस देश की सभ्यता में क्षरण होता है। लोकतंत्र में सहिष्णुता का स्थान होना चाहिए, परन्तु यह कायरता में नहीं बदलना चाहिए। इसी सभ्यतागत संकट का वर्तमान में लोकतंत्र पद्धति का अनुसरण करने वाले भारत सहित सभी देश सामना कर रहे हैं।

यूरोप एक केस स्टडी” विषयक व्याख्यान में उन्होंने कहा कि यूनाइटेड किंगडम में एक शब्द प्रचलित है, जिसे ग्रूमिंग गैंग्स कहा गया। भारत में प्रचलित लव जिहाद से सौ गुना ज्यादा कट्टरता इस गैंग के सदस्यों में पाई जाती है। यूरोप के देशों में तलाक का प्रतिशत अत्यधिक है। ऐसी दशा में इसका दंश झेल रही बालिकाओं को इस समूह के सदस्य अपना लक्ष्य बनाते है और कम से कम 10 से 20 लोगों के मध्य इन बालिकाओं को वस्तु की तरह रखते हैं। यूनाइटेड किंगडम में यह सदस्य शरणार्थी के रूप में प्रवेश करते हैं। विधि के अनुसार ऐसे शरणार्थियों को न्यूनतम जीवनोपयोगी व्यवस्था देना, उस देश का कार्य है जहां ये आए हैं। इसी का लाभ लेकर धीरे-धीरे पूरे यूरोप में ऐसे शरणार्थियों की संख्या बढ़ गयी है जो प्रत्यक्ष रूप से लोकतांत्रिक व्यवहार में अपनी सीधी दखल रखते हैं। वर्तमान परिवेश में 650 सांसदों में 90 ऐसे संसदीय क्षेत्र हैं, जहां ये शरणार्थी निर्णायक भूमिका में हैं। मुख्य वक्ता ने स्पष्ट किया कि जिन राष्ट्रों में लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं है, वहां सभ्यतागत संकट नहीं है।

प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य रामाशीष जी ने कहा कि ऐसी सभ्यताएं जो विलुप्त होने की कगार पर हैं, उनका संरक्षण और संवर्धन यह भारतीय चिंतन है। परन्तु मिशनरी तथा इस्लामिक चिंतन के कारण विश्व की कई सभ्यताएं परिवर्तित होने अथवा नष्ट होने के मार्ग पर हैं। भारत जैसे देशों में जहां लोकतांत्रिक पद्धति का पालन होता है, वहां सभ्यता के संरक्षण के लिए अपनी संख्या बढ़ाएं तथा एक-एक व्यक्ति अपना विचार, अपना कार्य राष्ट्रहित में समर्पित करे। व्याख्यान की प्रस्तावना दीनदयाल उपाध्याय पीठ के समन्वयक प्रो. टी.पी. सिंह जी ने प्रस्तुत की। कार्यक्रम का प्रारम्भ दीप प्रज्ज्वलन एवं महामना मालवीय और पं. दीनदयाल उपाध्याय के चित्र पर पुष्पांजलि से हुआ। विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने कुलगीत प्रस्तुत किया।

बड़ी संख्या में सामाजिक विज्ञान संकाय के विभिन्न विभागों के प्रोफेसर, शोध छात्र तथा विद्यार्थी उपस्थित रहे। संचालन शोध छात्रा रंजना सिंह एवं धन्यवाद शोध छात्र कमलाकान्त दूबे ने किया।

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