नरसिंह यात्रा और नानाजी देशमुख

महाराष्ट्र भले ही नानाजी देशमुख की जन्मभूमि रही है लेकिन उनकी कर्मभूमि #उत्तर_प्रदेश सहित हिन्दी पट्टी रही। भारतरत्न नानाजी देशमुख का विराट व्यक्तित्व भले ही देशस्तर का रहा हो लेकिन गोरखपुर क्षेत्र में तमाम ऐसे लोग हैं जिनके लिये नानाजी देशमुख परिवार के सदस्य से भी बढ़कर हैं।

भारतरत्न #नानाजी_देशमुख का केन्द्र #गोरखपुर था, जहाँ नानाजी देशमुख #संघ की जड़े मजबूत करने पहुँचे थे। गोरखपुर और आसपास के बुजुर्ग उन दिनों को याद करते हुए यही बता पाते कि देश अभी आजाद नहीं हुआ था। गोरखपुर और जिला हुआ करता था. न देवरिया जिला था न ही कुशीनगर। #हिन्दुत्व की अलख जगाते हुए सामाजिक समरसता का तानाबाना बुनने 1939 में गोरखपुर पहुँचे नानाजी ने यहाँ रहते हुए देखा कि घण्टाघर से निकलने वाली भगवान नरसिंह की शोभायात्रा में कीचड़ कालिख, काले रंग का जमकर प्रयोग किया जा रहा है। बेढंगे तरीके से इस अत्यन्त महत्वपूर्ण त्योहार को मनाया जा रहा है। जहाँ देखिये कोई सड़क पर दिख जाये तो कपड़े फाड़ देना, कालिख पोत देना आम बात थी।

नानाजी ने #भगवान_नरसिंह_यात्रा में आमजन की सहभागिता अधिक से अधिक कराने के लिये बड़ी पहल करने की ठानी। संघ की शाखाओं में आने वाले युवाओं, सामाजिक गतिविधियों में शामिल रहने वाले लोगों को साथ लिया। इसके बाद नानाजी ने एक हाथी का बन्दोबस्त किया। फिर महावत को सिखाया कि जहाँ भी हरे-काले रंग का ड्रम दिखे उसे हाथी से इशारा कर गिरवा दिया जाता।

नानाजी की यह टोली खुशनुमा माहौल में अबीर गुलाल उड़ाते हुए आगे बढ़ती और होली की खुशियों से सराबोर करते जाती। हालाँकि, इस काम में उनके सामने तमाम गतिरोध भी आये। तमाम जगहों पर विरोध झेला लेकिन वह साल-दर-साल अनवरत ऐसा ही करते रहे। धीरे-धीरे नानाजी की पहल को सबने स्वीकार किया और दिल खोलकर अपनी परम्पराओं के अनुसार नरसिंह यात्रा की शुरूआत की। कीचड़ या गन्दे रंगों का प्रयोग बिल्कुल बन्द हो गया। अब गोरखपुर की नरसिंह यात्रा की परम्परा पूरे देश में अनोखी मानी जाती है। संघ ने सम्भाली यात्रा की कमान देश में आजादी की माँग जोर पकड़ रही थी।

अँग्रेजों के पाँव उखड़ चुके थे। अब वह सत्ता हस्तान्तरण के बारे में सोच-विचार में पड़े थे। देश की परम्पराएँ भी करवट ले रहीं थीं। गोरखपुर में इसका आगाज नरसिंह यात्रा से हो चुका था। गोरखपुर में रहकर नानाजी देशमुख यहाँ की होली में प्रेम भाईचारा और सौहार्द का चटख रंग घोल चुके थे। कई साल के अथक प्रयास के बाद वह हुड़दंगी होली मनाने की परम्परा को बदल चुके थे।

अधिकारिक रिकार्ड के अनुसार 1948 से आरएसएस के स्वयंसेवकों ने भगवान नरसिंह की शोभायात्रा निकालने की कमान सम्भाल ली। अब तो हर साल संघ के सहयोग से नरसिंह यात्रा निकलती है। पहली बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी सांसद के रूप में 1996 में नरसिंह यात्रा में शामिल हुए थे। अब तो उनके बिना नरसिंह यात्रा अधूरी ही रहती है। शायद ही 1996 के बाद कोई ऐसा वर्ष रहा जब वह यात्रा की अगुवाई न किये हों।

मेरे पिता स्वर्गीय बनारसी गोपाल को चुनावी राजनीति में उतारने का श्रेय नानाजी को ही जाता है। दोनों लोगों का सम्बन्ध पिता-पुत्र के समान रहा जोकि आजीवन बना रहा। पिताजी बीएचयू से पोस्ट ग्रेजुएट कर लौटे थे। बीएचयू की छात्र राजनीति उन दिनों राजनारायण, चन्द्रशेखर जैसे समाजवादी सोच वाले नेताओं की शार्गिदी में उभार पर थी। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे विद्वानों से पूरा विवि अटा पड़ा था। पिता जी भी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ायी के दौरान छात्र राजनीति में उतरे और महामंत्री पद पर निर्वाचित हुए थे। हालाँकि, पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद वह सिविल सेवा की तैयारियों में लग गये। यही वह समय था जब किस्मत बदल रही थी और बीएचयू की छाँव से निकलने के बाद उनको एक महापुरुष का आशीर्वाद मिलने जा रहा था।

साल 1962 का कोई महीना रहा होगा। एक सन्त जैसे लगने वाले व्यक्ति घर पर पहुँचे थे। पिताजी से उनकी मुलाकात तो पहले हो चुकी थी लेकिन वह इस बार दादाजी से मिलने पहुँचे थे। पिताजी जब जीवित थे तो बताते थे कि नानाजी ने मिलकर उनसे यह कहा कि वह उनके बेटे को देश के लिये माँगने आये हैं और इसके बाद वह लौट गये। नानाजी के कहने पर 1962 में पिताजी को पहली बार जनसंघ के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ाया गया। कॉंग्रेस राज में पड़रौना विधानसभा सीट पर काफी बेहतर प्रदर्शन जनसंघ ने किया और दूसरे नम्बर पर रहे। इसके बाद नानाजी के ही कहने पर दोबारा टिकट मिला।

पडरौना की सीट जनसंघ की पक्की मानी जा रही थी लेकिन काँग्रेस के राज में चुनावी गड़बड़ियाँ हुई और कुछ वोटों से हरा दिया गया। इस चुनाव को लेकर विधानसभा दो दिनों तक नहीं चला। हजारों बैलेट जिस पर दीपक चुनाव चिन्ह पर मुहर लगा था, सड़कों के किनारे, खेतों में बिखरे पड़े मिले। नानाजी देशमुख के संगठन में रहने के दौरान पिताजी को जनसंघ का कई बार जिलाध्यक्ष बनाया गया। वह प्रदेश व राष्ट्रीय कार्यकारिणी का भी हिस्सा रहे। पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के जौनपुर चुनाव में उस टीम का हिस्सा रहे जो चुनाव संचालन के लिये बनी थी। नानाजी ने राजनीति की जो फौज तैयार की थी वह भी उनके ही बताये पदचिन्हों पर चला।

नानाजी इस देश के पहले ऐसे राजनेता रहे हैं जिन्होंने राजनीति से सन्यास लिया। नानाजी की तरह उनके नेतृत्व में राजनीति करने वाली पीढ़ी के तमाम सदस्यों ने भी राजनीति से एक उम्र के बाद सन्यास लिया था। मुझे याद है कि 90 के दशक के बाद पिताजी ने भी तमाम बार कहने के बाद भी चुनावी राजनीति से दूरी बना ली।

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