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संघ को समझना है तो शाखा आइए

संघ को समझना है तो शाखा आइए

राजीव तुली

विभिन्न कारणों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चर्चा में रखना मित्रों तथा अमित्रों दोनों के लिए लाभप्रद रहता है। अमित्र लिखा है, शत्रु नहीं, क्योंकि संघ किसी को भी अपना शत्रु नहीं मानता है। समाज दो भागों में है—एक जो आज स्वयंसेवक हैं और दूसरे जो भविष्य में संघ से जुड़ेंगे, ऐसी संघ की कल्पना है। संघ की शत्रुता करने वाले लोग होंगे, उनको समाप्त करने की संघ की कोशिश नहीं है, बल्कि उनको भी साथ लेकर एक समृद्ध तथा शक्तिशाली समाज बनाने के लिए संघ कटिबद्ध है। पूर्व में ऐसे बहुत से महानुभाव, जो संघ से विरोध रखते थे, संघ को निकट से जानने के बाद संघ के प्रशंसक बने। महात्मा गांधी, बाबा साहब अंबेडकर, लोकनायक जयप्रकाश नारायण या सुप्रसिद्ध संपादक गिरिलाल जैन ऐसे कुछ नाम हैं, जिन्होंने संघ को निकट से जाना और संघ के हो गए।

संघ बाहर से देखने पर समझ नहीं आता, बाहर से समझने पर संघ आँख पर बंधी पट्टी से हाथी के शरीर के भाग को छूने जैसा लगता है। अधिकांशतः लोग संघ को पुस्तकें पढ़कर या एक-दो कार्यक्रमों या मीडिया द्वारा किए गए चित्रण से समझने का प्रयास करते हैं। कुछ संघ को हिंदूवादी, कुछ अतिवादी और कुछ अल्पसंख्यक विरोधी संगठन मानकर छवि बनाते हैं। बहुत से राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि भी अपने समर्थकों को समझाने के लिए तथा अपनी स्वार्थों की सिद्धि के लिए संघ की वैसी छवि, जो उनको सुविधाजनक लगती है, बताते हैं।

परंतु संघ क्या है, ये समझना है तो संस्कृत के इस श्लोक को समझना चाहिए। उत्तर है—सागरोपमः। यानी सागर की तुलना सागर से ही की जा सकती है, वैसे ही राम-रावण का युद्ध, राम-रावण के युद्ध के ही समान है। भारतीय साहित्य में उपमा अलंकार के दो घटक रहते हैं। एक उपमेय, दूसरा उपमान। हाथ की तुलना कमल से की जाती है और “कर कमल” कहा जाता है, इसमें कर ‘उपमेय’ है और कमल ‘उपमान’। संघ की तुलना की जाए, ऐसा कोई और नहीं है, इसलिए संघ संघ जैसा ही है, उसका कोई उपमान नहीं है। इसलिए संघ को समझना है तो संघ की शाखा में जाकर ही अनुभूति से समझा जा सकता है।

कंप्यूटर का हार्डवेयर समझाया जा सकता है, एक स्क्रीन है, एक कीबोर्ड है, एक माउस है, परंतु सॉफ्टवेयर वही समझ सकता है जिसने उसका अनुभव किया। अब अगला प्रश्न आता है कि संघ करता क्या है? सरल शब्दों में समझना हो तो संघ हिंदुओं का संगठन करता है। अगला प्रश्न है, हिंदू कौन और हिंदू क्या है? हिंदू की भौगोलिक दृष्टि से भी तुलना की जा सकती है और वैचारिक से भी। और हिंदू धर्म भी है। धर्म अंग्रेजी वाला रिलिजन नहीं है। पहले भौगोलिक दृष्टि वाला हिंदू समझते हैं।

अर्थात् समुद्र के उत्तर में हिमालय के दक्षिण में जो भूभाग है, उसका नाम भारत है। वहाँ जन्मे लोग भारती कहलाते हैं।

हिमालय से प्रारंभ होकर हिंद महासागर तक फैले भूभाग को भारत तथा इसमें रहने वालों को भारती कहा गया है। भारती कहें, राष्ट्रीय कहें या हिंदू कहें, एक ही अर्थ है। हिंदू धर्म भी है और जीवन जीने की पद्धति भी है। धर्म का अर्थ अंग्रेजी वाला रिलिजन नहीं है। अंग्रेजी में धर्म का कोई पर्याय भी नहीं है। पानी का धर्म है ऊँचाई से निचाई की ओर जाना। इसी प्रकार ऊर्जा का धर्म ऊष्ण से शीतल की ओर जाना है। परोपकार के लिए रहने योग्य बनाया गया स्थान धर्मशाला कहलाता है, समाज सेवा के लिए बनाई गई डिस्पेंसरी धर्मार्थ चिकित्सालय कहलाती है। क्या इनका शाब्दिक अनुवाद इन शब्दों के साथ न्याय कर पाएगा? धर्मार्थ चिकित्सालय को “हॉस्पिटल फॉर रिलिजन” कह सकते हैं क्या?

हिंदू समाज जिस प्रकार का सामंजस्य और भाव इस सृष्टि के वनस्पति, मनुष्य, जीव-जंतु इत्यादि में देखते हैं—इसे “मानव धर्म” भी कहना पर्याप्त नहीं है। जिस प्रकार हिंदू धर्म में पर्वतों यथा “देवतात्मा हिमालय”, पेड़-पौधों यथा “तुलसी माता”, नदियों यथा “गंगा मैया”, अर्थात् सम्पूर्ण सृष्टि के सामंजस्य की बात कही है, इसे “सृष्टि धर्म” कहना उचित हो सकता है। द्वैत-अद्वैत, साकार-निराकार, भौतिकवादी-अनासक्तिवादी, सब विचारों का सम्मान ही हिंदू धर्म है। जैन, बौद्ध, सिख, आर्यसमाजी, सनातनी सभी इन्हीं तथ्यों को मानने वाले हैं। किसी का मूर्ति पूजा में विश्वास है, तो कोई अमूर्त की पूजा करता है, कोई शिव-पार्वती की पूजा करता है, कोई राधा-कृष्ण की, कोई सीता-राम की, कोई दुर्गा की, परंतु किसी का कहीं भी दूसरे से विरोध नहीं है। इस्लाम या ईसाई रिलिजन के मानने वाले भी यदि अन्य मत, पंथ, सम्प्रदाय या रिलिजन का सम्मान करें और उनको सही मानें, तो किसी प्रकार का कोई विभाजन समाज में नहीं दिखेगा और वो भी हिंदू धर्म की विशाल परिधि में सम्मिलित हो जाएंगे। परंतु वो यदि ऐसा मानें तो अपने रिलिजन का प्रसार नहीं कर पाते।

इस धर्म को मानने वाले हिंदू हैं और क्योंकि उनका उद्गम और मूल इसी राष्ट्र से है, इसलिए ये हिंदू राष्ट्र है। “राष्ट्र” और राज्य दोनों में अंतर है। राष्ट्र लोगों से बनता है, एक राष्ट्र में कई राज्य हो सकते हैं, भारत में सदा रहे हैं। परंतु हिमालय से निकलने वाली गंगा का जल रामेश्वरम में अर्पित करने की पुरानी परंपरा है। देश के चार कोनों में बसे चार धामों की यात्रा से मोक्ष मिलता है, ऐसा विश्वास है। बारह ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के बिना जीवन सम्पूर्ण नहीं माना जाता। भारत के जन लोग इसे एक राष्ट्र, एक राष्ट्र बनाते हैं। जन का राष्ट्र बनने की कुछ मूल शर्तें हैं। जिस भूमि पर रहते हैं, उसके प्रति मनोभाव—उस भूमि को मातृभूमि, मातृभूमि, पितृभूमि, अपने सरल शब्दों में कहें तो माता-पिता मानते हैं। अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान का भाव रखते हैं। भारत भूमि में रहने वाले लगभग सब लोगों के पूर्वज समान हैं। तीसरा समान मूल्य व्यवस्था अर्थात् “भारत माता की जय” और “वन्दे मातरम्” का अभिमान। पश्चिम के विद्वानों को राष्ट्र और राज्य की संकल्पना से भारत की राष्ट्र की संकल्पना भिन्न है। पिछले एक हजार वर्षों में विभिन्न आक्रांताओं के कारण ये भाव और विचार कमजोर हुए हैं। हिंदू समाज जाति, उपजाति, मत, पंथ, सम्प्रदाय के आधार पर बनता है और अपने मूल से कटा है। इस राष्ट्र की मूल समस्या बाहर वालों के शक्तिशाली होने के कारण नहीं, यहाँ के समाज के कमजोर होने के कारण है। इस समाज को संगठित करने के लिए संघ की स्थापना 1925 में हुई और तब से संघ लगातार समाज को संगठित करने के लिए व्यक्ति निर्माण के काम में लगा हुआ है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने जिम्मे केवल एक काम लिया है। संघ की पद्धति से निर्मित स्वयंसेवक समाज को दिशा और दशा ठीक करने के लिए जो उपयुक्त लगता है, वो काम करते हैं। इसलिए संघ की तुलना किसी भी और संगठन से करना कहीं भी उचित नहीं लगता।

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