नानाजी देशमुख एक प्रख्यात समाज सुधारक थे जिन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दिया। नानाजी का जन्म 11 अक्टूबर 1916 को शरद पूर्णिमा के दिन महाराष्ट्र के कडोली नामक ग्राम में एक मराठीभाषी देशस्थ ब्राह्मण परिवार में में हुआ था। आर्थिक अभाव मे बचपन में नानाजी ने अपनी स्कूली शिक्षा का खर्च उठाने के लिये सब्जियाँ बेचीं। नानाजी को सीकर के रावराज से हाई स्कूल में पढ़ने के लिये छात्रवृत्ति मिली। बाद में उन्होंने पिलानी के बिरला कॉलेज में पढ़ायी किया।
संघ और नानाजी
पढ़ायी के दौरान 1934 में नानाजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गये। 15 अगस्त 1940 को नानाजी को संघ का कार्य शुरू करने के लिये गोरखपुर भेजा गया। अपने मिलनसार स्वभाव से वे महन्त दिग्विजय नाथ, गीता प्रेस के संस्थापक भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार, बाबा राघव दास आदि जैसे प्रतिष्ठित लोगों के सम्पर्क में आये। अपनी असाधारण योग्यता के द्वारा वे संघ की शाखाओं का तेजी से विस्तार करने में सक्षम हुए। नानाजी ने तीन वर्षों के भीतर इस क्षेत्र में लगभग 250 आरएसएस शाखाएँ शुरू करायी। 1952 में उन्होंने गोरखपुर मे भारत का पहला सरस्वती शिशु मन्दिर स्थापित किया। आज पूरे भारत में इन स्कूलों की संख्या 30,000 से अधिक है। राष्ट्रधर्म प्रकाशन के प्रबन्ध निदेशक के पद पर रहते हुए नानाजी ने राष्ट्रधर्म मासिक पत्रिका, पाञ्चजन्य साप्ताहिक तथा स्वदेश समाचार पत्र का प्रकाशन किया। नानाजी ने 1968 में नई दिल्ली में दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की और उसके माध्यम से देश में एक वैचारिक संवाद की शुरुआत की।
राजनैतिक जीवन
1975 में सामाजिक कार्यकर्ता जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रान्ति के आह्वान के पीछे प्रेरक कारक नानाजी देशमुख थे। नानाजी ने जेपी आन्दोलन के प्रति जनभावना जगाने में प्रमुख भूमिका निभायी और वे लोकनायक जयप्रकाश नारायण के घनिष्ठ और अन्तरंग मित्र बन गये। सन 1977 में लोकसभा चुनाव की घोषणा के तीन दिन बाद ही जनसंघ, लोकदल, संगठन कांग्रेस और सोशलिस्ट पार्टी का विलय कर जनता पार्टी का गठन किया गया। नानाजी देशमुख ने बलरामपुर से चुनाव लड़ा और कांग्रेस की उम्मीदवार और बलरामपुर की रानी को भारी अन्तर से पराजित किया। मोरार जी देसाई नानाजी देशमुख को अपने मंत्रिमण्डल में शामिल करना चाहते थे परन्तु नानाजी ने इस प्रस्ताव को सहर्ष अस्वीकार कर दिया।
नानाजी का स्वदेशी ग्राम
वर्ष 1978 में नानाजी ने सामाजिक पुनर्निर्माण के लिये अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा और अनुभव सार्वजनिक जीवन के प्रति समर्पित करने का निर्णय लिया। इस काम के लिये उन्होंने सबसे पहले उत्तर प्रदेश के गोण्डा में लोकनायक जयप्रकाश नारायण और उनकी धर्मपत्नी प्रभावती देवी जी की स्मृति में ग्राम स्वराज की अवधारणा को साकार करते हुए जयप्रभा ग्राम स्थापित किया। उन्होंने परंपरागत स्वदेशी साधनों से गाँव का विकास किया।
नानाजी और चित्रकूट
नानाजी ने 1991 में देश के प्रथम ग्रामीण विश्वविद्यालय की स्थापना चित्रकूट में की जिसका नाम महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय रखा गया। नानाजी तीन वर्षों तक इस विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलाधिपति रहे। नानाजी ने शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वाबलम्बन व सदाचार इन चार बिन्दुओं को आधार बनाकर संस्थान के माध्यम से चित्रकूट व आसपास के पिछड़े हुए 500 गाँवों में विकास की नींव रखी। परम्परागत उद्योगों के विकास, जैविक खेती, जल प्रबन्धन के द्वारा धीरे-धीरे गाँवों की दशा व दिशा बदली। नानाजी द्वारा चित्रकूट परियोजना एवं आत्म निर्भरता के लिये अभियान की शुरूआत 26 जनवरी, 2002 में चित्रकूट में की गयी, जिसके द्वारा चित्रकूट के आसपास के 500 चयनित ग्रामों को आत्मनिर्भर बनाया गया।
पुरस्कार एवं सम्मान
भारतीय ग्रामीण तथा सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए नानाजी को सन 1999 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। उनकी राष्ट्रीय सेवा के सम्मान में वर्ष 1999 में उन्हें राज्यसभा के लिये मनोनीत किया गया। नानाजी देशमुख को भारतवर्ष के कई विश्वविद्यालयों, जैसे पुणे विश्वविद्यालय, कानपुर विश्वविद्यालय, बुदेलखण्ड विश्वविद्यालय, बड़ोदा विश्वविद्यालय एवं चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट. की मानद् उपाधि से सम्मानित किया गया। गया। उन्हें मरणोपरान्त भारत सरकार द्वारा भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 2019 में भारतरत्न से सम्मानित किया गया था। उनके स्मृति में मध्य प्रदेश में “नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय” एवं “नानाजी देशमुख प्रशिक्षण एवं शोध संस्थान” स्थापित किया गया। भारत सरकार द्वारा 11 अक्टूबर 2017 को नानाजी देशमुख की जन्मशताब्दी के अवसर पर एक स्मारक डाक टिकट जारी किया गया।
नानाजी 95 वर्ष की उम्र में ग्रामोदय विश्वविद्यालय, चित्रकूट में 27 फरवरी 2010 को ब्रम्हलीन हो गए। उनकी वसीयत के अनुसार, उनके शरीर को मेडिकल कॉलेज को दान कर दिया गया। वे आधुनिक युग के ऋषि थे जिन्होंने अपना जीवन राष्ट्र सेवा में समर्पित कर दिया।