भगवान बुद्ध ने रामनगरी में किया था चातुर्मास
चातुर्मास का धार्मिक महत्व केवल सनातन परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि बौद्ध परंपरा में भी इसका विशेष स्थान रहा है। इतिहासकारों और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, भगवान गौतम बुद्ध ने भी वर्षा ऋतु के दौरान अयोध्या (प्राचीन साकेत) में चातुर्मास किया था। वर्तमान में राम जन्मभूमि से करीब डेढ़ किमी की दूरी पर स्थित दंत धावन कुंड को इसी ऐतिहासिक परंपरा का प्रमुख साक्षी माना जाता है।
इतिहासकार डॉ. हरिप्रसाद दुबे बताते हैं कि दंत धावन कुंड ऐसा स्थल है, जहां एक ओर त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के दंतधावन की पौराणिक मान्यता जुड़ी है, वहीं दूसरी ओर गौतम बुद्ध के चातुर्मास (वर्षावास) और साधना के ऐतिहासिक संदर्भ भी मिलते हैं। यही कारण है कि यह स्थान भारतीय संस्कृति की दो महान आध्यात्मिक परंपराओं का संगम माना जाता है।
डॉ. दुबे के अनुसार, चीनी यात्रियों फाहियान और ह्वेनसांग के यात्रा-वृत्तांत तथा लाला सीताराम की पुस्तक ””अयोध्या का इतिहास”” में उल्लेख मिलता है कि भगवान बुद्ध ने अपने चातुर्मास का धार्मिक महत्व केवल सनातन परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि बौद्ध परंपरा में भी इसका विशेष स्थान रहा है।
इतिहासकारों और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, भगवान गौतम बुद्ध ने भी वर्षा ऋतु के दौरान अयोध्या (प्राचीन साकेत) में चातुर्मास किया था। वर्तमान में राम जन्मभूमि से करीब डेढ़ किमी की दूरी पर स्थित दंत धावन कुंड को इसी ऐतिहासिक परंपरा का प्रमुख साक्षी माना जाता है।
इतिहासकार डॉ. हरिप्रसाद दुबे बताते हैं कि दंत धावन कुंड ऐसा स्थल है, जहां एक ओर त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के दंतधावन की पौराणिक मान्यता जुड़ी है, वहीं दूसरी ओर गौतम बुद्ध के चातुर्मास (वर्षावास) और साधना के ऐतिहासिक संदर्भ भी मिलते हैं। यही कारण है कि यह स्थान भारतीय संस्कृति की दो महान आध्यात्मिक परंपराओं का संगम माना जाता है।
डॉ. दुबे के अनुसार, चीनी यात्रियों फाहियान और ह्वेनसांग के यात्रा-वृत्तांत तथा लाला सीताराम की पुस्तक ””अयोध्या का इतिहास”” में उल्लेख मिलता है कि भगवान बुद्ध ने अपने

