डॉ अशोक दुबे

Shankracharya Jyanti : नारियल सुपारी आम्र और कदली के वृक्षों से सुशोभित केरल के कालड़ी ग्राम में नम्बूदरी ब्राह्मण चूड़ामणि शिवगुरु व विशिष्टा देवी के यहाँ ईसा पूर्व 508 वैराख शुक्ल तृतीया को भगवान चन्द्रमौलीश्‍वर के आशीर्वाद से पुत्र पैदा हुआ। द्वारिका मठस्थ जन्मपत्री के अनुसार, आचार्य शंकर का समय युधिष्ठिराब्द 2631 से 2663 माना गया है। इस बात की पुष्टि वहाँ से प्राप्त प्राचीन ताम्रपत्र के द्वारा हुई है।

भारत वर्ष की पुण्यभूमि पर अवतरित महान विभूतियों में आदिशंकर भगवत्पाद का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। देशभर में वे आद्य शंकराचार्य के नाम से विख्यात हैं। शंकर भगवत्पाद का आविर्भाव ऐसे समय में हुआ जबकि सम्पूर्ण भारतवर्ष की स्थिति संकटपूर्ण तथा शोचनीय थी। देशभर को एकसूत्र में बॉंधकर रखने वाला कोई सार्वभौम राजा नहीं था। छोटे-छोटे छप्पन से भी अधिक राज्यों में देश विभाजित हो गया था। सामाजिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न थी। सनातन धर्म के परिपालन में अनेक विकृतियाँ विसंगतियाँ तथा कुरीतियों का प्रवेश हो गया था। आध्यात्मिक क्षेत्र का संकट तो चरमबिन्दु पर था। वैदिक तथा अवैदिक बहत्तर से भी अधिक मत प्रचलित थे, जिनमें अनेक परस्पर विरोधी लगते थे।

यज्ञोपवीत संस्कार के समय ब्रह्मचारी प्रथम भिक्षा अपनी माँ से ही माँगता है किन्तु आचार्य शंकर ने प्रथम भिक्षा हेतु अपने गाँव में सफाई का कार्य करने वाली महिला के सम्मुख जाकर कहा, ‘माँ, भिक्षां देहि।’ शंकर की इस प्रथम भिक्षा ने ही संकेत दे दिया कि यह बटुक कुछ असामान्य है।

श्री शंकराचार्य ने करुणावतार बुद्ध को भगवान विष्णु का नवम अवतार मानकर, समाज के एकीकरण में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ दिया। उन्होंने प्रयत्‍नपूर्वक भगवान बुद्ध की अनेक शिक्षाओं को सनातनी हिन्दुओं के विचार के साथ समन्वित कर दिया। इस कारण समाज का व्यापक भेदभाव समाप्त हुआ।

ओंकारनाथ तीर्थ में नर्मदा के तट पर शंकर ने श्री गोविन्दपाद से संन्यास की दीक्षा ली और बहुत छोटी सी आयु में ही यह तरुण संन्यासी अनेक भ्रान्तियाँ नष्ट करता हुआ, सर्वदूर अद्वैत था प्रतिपादन करता चला गया। केरल से चलकर वे उत्तर में केदारनाथ और बद्रीनाथ तक आ गये और यहाँ से दक्षिण के चिदम्बरम तक जा पहुँचे। यह एक दार्शनिक विजय थी। भारत के इतिहास में सम्भवतया यह प्रथम अवसर था जब इतनी कम आयु होते हुए भी इस महान विद्वान ने अनेक धर्मशास्त्रों, दर्शनों, पुराणों के प्रकाण्ड पण्डितों को इतनी सरलता से पराजित कर दिया था। ऐसा लगता है कि वह आता था शास्त्रार्थ करता था और लोगों पर विजय प्राप्त कर आगे बढ़ जाता था। इस प्रकार एक नये सुधार युग का प्रारम्भ हुआ।

श्री आद्यशंकराचार्य की व्यापक सफलता के पीछे उनकी बौद्धिक प्रतिभा, अतुलनीय कर्मठता तथा उदारता थी। उन्होंने निरर्थक कर्मकाण्डों का खण्डन किया। उनके विचार से आत्मा ही एकमात्र सत्य है और वही चैतन्य, परिमाणरहित, निर्गुण और असीम परमानन्द है। श्री शंकर के वेदान्त का आधार ‘प्रस्थानत्रयी’ अर्थात उपनिषद ब्रह्मसूत्र तथा भगवद्गीता ही थे।

ग्यारह वर्ष के शंकर काशी के कर्णिका घाट के निकट रहने लगे। प्रात:काल शंकर शिष्यों के साथ गंगा स्‍नान को चले। रास्ते में कुरूप चाण्डाल कमर में बांधे चार कुतों के साथ बीच में खड़ा था जिसके शरीर से दुर्गन्ध आ रही थी। आचार्य शंकर ने देखा तो हटने को कहा, चाण्डाल अट्टहास कर संस्कृत में बोला- महाराज! सर्वात्मैक्य तथा अद्वैत का संदेश देने वाले आप किसे ‘गच्छदूरमिति’ कहकर हटने के लिये कह रहे हैं? अन्‍न निर्मित एक शरीर को दूसरे शरीर से दूर जाने के लिये कह रहे हैं या एक चैतन्य से दूसरे चैतन्य को दूर रहने के लिये आपका अभिप्राय क्या है? आत्मा तो सर्वव्यापी निष्क्रिय और सरल शुद्ध है। यदि देह को हटने के लिये कह रहे हो तो यह जड़ है, कैसे हट सकता है? तुम्हारी और हमारी देह किस अंश में भिन्न है? शंकर को अपनी भूल का बोध हुआ। अपना मनोभाव व्यक्त करते हुए कहा- जागृत स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में जो शुद्धचैतन्य स्पष्ट दिखता है। जो ब्रह्मा से लेकर पिपीलिका तक सभी प्राणियों के शरीर में विद्यमान है, वही मैं हूँ। ‘चाण्डालोऽस्तु स तु द्विजोऽस्तु गुरुरित्येषा मनीषा मम (शंकर ज्योति पृ-10-11)’ वह चाण्डाल हो या द्विज, मेरा गुरु है। ऐसा मैं समझता हूँ। शंकर को महादेव ने ही लीलाकर यह सत्यज्ञान कराया। आद्य शंकराचार्य को एक नया बोध हुआ, किसी भी शरीर से घृणा करना उचित नहीं। इस घटना ने उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ दिया। सभी प्राणियों के अन्दर आधारभूत समानता के सिद्धान्त को नयी परिभाषा मिल गयी।

श्री शंकराचार्य जी ने उस समय ईश्वर के विभिन्न रूपों के उपासकों के मध्य उत्पन्न हो उठने वाले संघर्षों को समाप्त कर समन्व्य स्थापित करने हेतु पंचायतन पूजा पद्धति प्रारम्भ की, जिसमें शिव, विष्णु, गणपति, सूर्य तथा शक्ति की एक साथ उपासना की व्यवस्था थी।

श्री शंकराचार्य ने करुणावतार बुद्ध को भगवान विष्णु का नवम अवतार मानकर, समाज के एकीकरण में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ दिया। उन्होंने प्रयत्‍नपूर्वक भगवान बुद्ध की अनेक शिक्षाओं को सनातनी हिन्दुओं के विचार के साथ समन्वित कर दिया। इस कारण समाज का व्यापक भेदभाव समाप्त हुआ। वैदिक ज्ञान के सन्दर्भ में आचार्य शंकर ने अनेक उदाहरण देते शूद्रों, स्त्रियों की स्थिति और उनके विशेषाधिकारों की समानता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक ज्ञानार्थीं के लिये ज्ञान का द्वार उन्मुक्त है तथा ज्ञान की शर्त केवल स्तुति है।

आचार्य शंकर ने उस समय की कठिन परिस्थितियों में युगानुकूलशास्त्रों की रचना की और सम्पूर्ण
देश की यात्रा भी सम्पन्न की। काशी की घटना के पश्‍चात शिव का आदेश मानकर वे बदरिकाश्रम
गये और वहाँ पर व्यास-गुहा में चार वर्ष रहकर उन्होंने, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भगद्गीता एवं प्रधान
उपनिषदों पर भाष्‍य रचना का कार्य सम्पन्‍न किया।

आचार्य शंकर ने उस समय की कठिन परिस्थितियों में युगानुकूलशास्त्रों की रचना की और सम्पूर्ण देश की यात्रा भी सम्पन्न की। काशी की घटना के पश्‍चात शिव का आदेश मानकर वे बदरिकाश्रम गये और वहाँ पर व्यास-गुहा में चार वर्ष रहकर उन्होंने, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भगद्गीता एवं प्रधान उपनिषदों पर भाष्‍य रचना का कार्य सम्पन्‍न किया।

बद्रीनाथ से आचार्य शंकर काशी आये और वहाँ से महान वैदिक कुमारिल भट्ट से मिलने प्रयाग आ पहुँचे। कुमारिल ने शंकराचार्य को अपने शिष्य मण्डन मिश्र के पास महिष्मती (बिहार) भेजा। शंकराचार्य ने अपनी विद्वता तथा विनम्रता से मण्डन मिश्र तथा उनकी विदुषी पत्‍नी उभय भारती को भी अपना अनुगामी बना लिया। दो बार पूरे भारत वर्ष का पैदल भ्रमण कर चार पीठों की स्थापना की। इसमें शृंगेरीमठ के सुरेश्‍वराचार्य, द्वारकामठ के हस्तामलकाचार्य, पूरी के पद्मपादाचार्य और ज्योर्तिमठ के तोटकाचार्य को प्रमुख आचार्य नियुक्त कर संन्यासी संघ स्थापित कर केदारनाथ पहुँचे। ईसा पूर्व 476 में बत्तीस वर्ष की आयु पूर्णकर योग द्वारा महासमाधि में लीन हो गयें।

”भज गोविन्दम् भज गोविन्दम् भज गोविन्दम् मूढ़मते, सम्प्राप्ते सन्निहिते काले, न हि न हि रक्षति डुकृञ्करणे।।” (चर्पट पंजारिका)

लेखक राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के अवध प्रांत के प्रांत प्रचार प्रमुख हैं।

Sanskrit Language | Bhopal Love Jihad | Dr BR Ambedkar | Pahalgam Terror Attack :

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *