Shri Ramanujacharya Jayanti : प्रत्येक प्राणी में ईश्वर के दर्शन करने वाले आचार्य रामानुज
डॉ. गोपाल सिंह
Shri Ramanujacharya Jayanti : उपनिषदों में बिखरे हुए ब्रह्म, जीव और जगत सम्बन्धी विचारों का संग्रह महर्षि बादरायण ने ब्रह्मसूत्र शीर्षक ग्रंथ में किया। सूत्र रूप में उपलब्ध इस गूढ़ ज्ञान को सर्वजन संवेद्य बनाने के लिये अनेक आचार्यों ने ब्रह्मसूत्र पर टीकाएँ लिखी, जिनमें सबसे प्रसिद्ध नाम भगवान आदि शंकराचार्य और आचार्य रामानुज का है। उन्होंने क्रमश: अद्वैतवाद और विशिष्टाद्वैतवाद की स्थापना की। इन दोनों आचार्यों ने अपनी व्याख्या में ईश्वर का जीव और जगत से तादात्म्य सम्बन्ध स्थापित किया है। जैसा कि उपनिषदों में कहा गया है कि यह सम्पूर्ण चराचर जगत ईश्वर से ही व्याप्त है। अत: प्रत्येक प्राणी में ईश्वर के ही दर्शन करने चाहिये। दोनों आचार्यों ने अपने-अपने स्तर पर इस अवस्था की प्राप्ति के भिन्न-भिन्न मार्ग बताये हैं।
शंकराचार्य ज्ञान मार्गी हैं और वे ब्रह्म, जीव और जगत सम्बन्धी प्रश्नों को अन्त: प्रज्ञा और बुद्धि द्वारा सुलझाने का प्रयत्न करते हैं। ज्ञानमार्गी शंकर के अनुसार, ब्रह्म का ज्ञान ही ब्रह्म प्राप्ति का साधन है। वह घोषणा करते हैं- ‘ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति’ अर्थात ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है। इस आधार पर अद्वैत वेदान्त सभी प्रकार की भेद दृष्टि का निराकरण करके सम्पूर्ण हिन्दू समाज को एकता के सूत्र में बाँधने का कार्य करता है। किन्तु ज्ञान मार्ग प्रत्येक व्यक्ति के लिये सहज साधन नहीं हो सकता अपितु कुछ प्रज्ञावान और विवेकवान व्यक्ति ही इसका उपयोग करके दुख व क्लेश से मुक्ति पा सकते हैं। वहीं, दूसरे प्रमुख व्याख्याता आचार्य रामानुज का दर्शन विशिष्टाद्वैतवाद के रूप में जाना जाता है। इसमें आचार्य रामानुज ने एक प्राणी का दूसरे प्राणी से एवं सभी प्राणियों के ईश्वर से प्रत्यक्ष सम्बन्ध को बड़े ही व्यवहारिक ढंग से समझाया है।
रामानुज के अनुसार ईश्वर के समक्ष सभी प्राणी समान हैं तथा प्रेम एवं भक्तिपूर्वक ईश्वर की उपासना करके उसका सामीप्य पाया जा सकता है। उनके अनुसार जीव और जगत ईश्वर के अंश हैं तथा ईश्वर अंशी हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवों में मौलिक एकता का होना अनिवार्य है। अर्थात एक अंश और दूसरे अंश में अभेद सम्बन्ध है किन्तु अंश अर्थात जीव अंशी अर्थात परमात्मा से भिन्न तो है किन्तु पृथक नहीं। अर्थात जीव और जीव में सजातीय-विजातीय और स्वागत तीनों प्रकार के भेदों का अभाव है। सरल शब्दों में कहें तो प्रत्येक जीव ईश्वरीय सत्ता का ही विस्तार हैं। अत: जीवों में स्वरूपगत एकता है जो भी भिन्नता परस्पर दिखाई देती है, वह भ्रम है। रामानुज के इस दर्शन ने एक तरफ समाज में व्याप्त भेदभाव जाति-पाति जैसी कुरीतियों का अन्त किया तो दूसरी ओर भक्ति मार्ग के रूप में प्राणियों को ईश्वर प्राप्ति का एक सहज और सरल मार्ग भी दिया। रामानुज द्वारा प्रवर्तित इस दर्शन को भक्ति काल के संतों और भक्तों द्वारा आगे बढ़ाया गया। गोस्वामी तुलसीदास अंश-अंशी सम्बन्ध की व्याख्या करते हुए बड़े सरल शब्दों में कहते हैं, ‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी, सहज अमल चेतन गुन रासी।’
चौदहवीं शताब्दी से उत्तर भारत में प्रकट हुई भक्ति की पवित्र मन्दाकिनी का स्रोत रामानुजाचार्य और उनके विशिष्टाद्वैतवाद का दर्शन है।
ईसाइयत और इस्लाम में जहाँ मनुष्य को मूलत: पापी बताया गया है, जो पाप से मुक्ति के लिये ईश्वर की शरण में जाता है। वहीं हिन्दू धर्म में आत्मा को शुद्ध एवं निष्पाप एवं चैतन्य स्वरूप माना गया है जो सांसारिक विषय वासनाओं में फंसकर कलुषित हो जाती है किन्तु ईश्वर की भक्ति द्वारा पुन: अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त कर लेती है। गोस्वामी जी ने सहज, अमल और चेतन शब्दों द्वारा इसी सत्य की ओर संकेत किया है। वस्तुत: समाज और धर्म के लिये यदि हमें रामानुजाचार्य के प्रदेय का मूल्यांकन करना है तो इसे हम दो भागों में बाँटकर समझ सकते हैं। पहला रामानुजाचार्य द्वारा प्रत्यक्ष किये गये कार्य और दूसरा उनके शिष्यों और शिष्यों के भी शिष्यों द्वारा किये गये कार्य। काशी के महान संत और आचार्य स्वामी रामानन्द रामानुजाचार्य की ही शिष्य परम्परा में ही आते हैं। इन सन्त रामानन्द के 12 शिष्य थे। इन 12 शिष्यों में सभी जाति वर्ग के लोग थे जैसे कबीर (जुलाहा) सेन (नाई) धन्ना (जाट) इत्यादि। स्वामी रामानन्द के ही एक शिष्य नरहर्यानन्द हुए जो राम भक्ति शाखा के स्तम्भ गोस्वामी तुलसीदास के गुरु थे। कह सकते हैं की चौदहवीं शताब्दी से आरम्भ हुए। भक्ति आन्दोलन की सगुण और निर्गुण दोनों ही धाराओं के प्रणेता स्वामी रामानन्द और उनके परम गुरु रामानुजाचार्य थे। चौदहवीं शताब्दी से उत्तर भारत में प्रकट हुई भक्ति की पवित्र मन्दाकिनी का स्रोत रामानुजाचार्य और उनके विशिष्टाद्वैतवाद का दर्शन है।
भक्ति आन्दोलन एक ओर जातियों और वर्गों में बँटे हिन्दू समाज को एकजुट करने का कार्य करता है तो दूसरी ओर अपने पौरुष से हताश हिन्दुओं में नयी शक्ति और ऊर्जा का संचार भी करता है। कबीर और तुलसी दोनों एक तरफ जातिवाद का खण्डन कर समाज में समरसता लाने का प्रयत्न करते हैं तो दूसरी ओर वे विधर्मी तुर्कों से लड़ने की प्रेरणा भी देते हैं। यहाँ कबीर के कुछ दोहे दृष्टव्य हैं। सामाजिक समरसता का सन्देश देते हुए कबीर कहते हैं- ‘एक बूँद के सृष्टि रची है को बाभन को सूदा।’ कबीर जाति-पाति, वर्ग और भाषा के आधार पर हिन्दू समाज को विभाजित करने के प्रत्येक प्रयत्न का विरोध करते रहे। इसका आधार वह अद्वैतवाद की विचारधारा से ही ग्रहण करते हैं। उनके अनुसार पूरी सृष्टि एक ही चेतन सत्ता की अभिव्यक्ति है। अत: सारे बाह्य भेद निरर्थक हैं- ‘साईं के सब जीव हैं कीरी कुंजर दोउ।’ इसी प्रकार अपने धर्म संस्कृति और ईश्वर में अपनी अडिग निष्ठा प्रकट करते हुए कबीर कहते हैं- ‘राम भज बउरे जुलम करता है भारी, कबीर पकरी टेक राम की तुरक रहे पचि हारी।’ कबीर की भांति ही समाज में समरसता, सौहार्द और समन्वय की स्थापना के लिये गोस्वामी तुलसीदास ने भी अभूतपूर्व प्रयत्न किया। कबीर ने जहाँ अपनी डांट फटकार वाली शैली से यह कार्य किया। वहीं, तुलसी ने रामकथा और उस कथा के विभिन्न जीवन प्रसंगों के माध्यम से समाज को समरसता का सन्देश दिया। शबरी के जूठे बेर खाते राम, केवट और गुह्य राज को गले लगाते राम, एक पक्षी की अन्त्येष्टि अपने निज पूर्वजों की भांति करते राम के चरित्र के माध्यम से गोस्वामी जी ने सामाजिक समरसता के उच्चतम आदर्श की ही प्रतिष्ठा की है। जो अप्रत्यक्ष रूप से गुरु परम्परा के आधार पर रामानुजाचार्य से ही जुड़ा हुआ है। इसी प्रकार तुलसी ने शैव-वैष्णव, निर्गुण और सगुण, ज्ञान और भक्ति, लोक और वेद, राजा और प्रजा, संस्कृत और लोक भाषा अवधी के बीच एक समन्वित मार्ग की प्रस्तावना की जो की एक समरस समाज की स्थापना करने के लिए आवश्यक था।
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इस प्रकार रामानुजाचार्य जी ने जिस वैष्णव भक्ति की नींव रखी वह कालान्तर में उत्तर भारत में सामाजिक समन्वय और सामाजिक समरसता की स्थापना का प्रत्यक्ष आधार बना। वस्तुत: समाज में पूर्णत:, समता, समरसता और सौहार्द का वातावरण तब तक नहीं बन सकता जब तक हम अपनी अंतरात्मा में इस सत्य की अनुभूति नहीं कर लेते कि संसार के सभी प्राणियों में एक ही चेतन सत्ता विराजमान है। अत: रंग रूप आकृति और स्वभाव में भिन्नता होते हुए भी सभी प्राणियों में मौलिक एकता है। इसी की प्रतीति करवाने के लिये आचार्य रामानुज ने विशिष्टाद्वैत का दर्शन एवं भक्ति मार्ग की प्रस्तावना की। और जिसे व्यावहारिक रूप देने में चौदहवीं शताब्दी के सन्तों एवं भक्तों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
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