The Government of India had prevented the King of Nepal from attending the RSS program.

ये कहानी तब की है जब अभिनेत्री मनीषा कोइराला के दादा बीपी कोइराला नेपाल के प्रधानमंत्री थे और नेपाल के राजा थे महेंद्र वीर विक्रम शाह. 1965 में आरएसएस के मकर संक्रांति उत्सव के लिए नेपाल के राजा महेंद्र वीर विक्रम शाह को भारत आना था. लेकिन तभी एक कूटनीतिक विवाद पैदा हो गया. भारत ने नेपाल के राजा को वीजा ही नहीं दिया. आखिर क्यों हुआ था ये विवाद?

नेपाल दुनिया का इकलौता हिंदू राष्ट्र रहा है. भारत के कई मंदिरों में जो अधिकार यहां के राजाओं, शंकराचार्य तक को नहीं हैं, वो नेपाल के राजाओं को मिले हैं. लोकतंत्र में ये बात अजीब लग सकती हैं, लेकिन परम्पराएं सदियों पुरानी हैं, इसलिए सम्मान बना हुआ है. ऐसे में दुनिया भर में हिंदुओं के सबसे बड़े संगठन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का नेपाल के राजा को अपने कार्यक्रम में बुलाना स्वाभाविक घटना थी, लेकिन ये अस्वाभाविक तब बन गई, जब केन्द्र सरकार ने राजा को वीजा देने से मना कर दिया. दिलचस्प बात है कि उन दिनों केन्द्र में लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे.

इस घटना से नेपाल के दो किरदार जुड़े हैं, एक थे राजा महेंद्र वीर विक्रम शाह और दूसरे थे नेपाल में पहली बार जनमत से चुने गए प्रधानमंत्री बीपी कोइराला. बीपी अभिनेत्री मनीषा कोइराला के दादा थे. उन दिनों केन्द्र की कांग्रेस सरकार पर नेहरू के अंतिम दिनों से ही कामराज के नेतृत्व में सिंडिकेट हावी था. मोरारजी देसाई और इंदिरा गांधी को किनारे कर उसने ही लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री बनाया था. उनकी आकस्मिक मौत के बाद दोबारा से मोरारजी देसाई के खिलाफ इंदिरा गांधी को मैदान में उतार दिया गया. सिंडिकेट की पकड़ के चलते इंदिरा को ज्यादा सांसदों के वोट मिले और वो प्रधानमंत्री चुन ली गई.

बीपी कोइराला ने नेपाल में भी ‘कांग्रेस की ब्रांच’ खोल दी

सिंडिकेट के कांग्रेस नेताओं के अच्छे रिश्ते बीपी कोइराला से थे क्योंकि बीपी कोइराला आजादी से पहले ना केवल भारत में पढ़े थे, बल्कि कांग्रेस में शामिल भी हो गए थे. वो बीएचयू बनारस व कोलकाता यूनीवर्सिटी में पढ़े. फिर दार्जिलिंग में वकालत की प्रैक्टिस भी की. भारत की आजादी के बाद उन्होंने यहीं सोशलिस्ट नेपाली नेशनल कांग्रेस की स्थापना भी की. जाहिर है वो कांग्रेस के नाम को ही नेपाल में भी बढ़ाना चाहते थे. इस तरह गांधीजी के नाम के सहारे उन्हें भारत में रहने वाले नेपालियों का सहयोग तो मिला ही, जब नेपाल में भी ‘नेपाली कांग्रेस’ नाम से पार्टी लांच की तो उन्हें वहां जबरदस्त सहयोग मिला, टूट कर वोट भी, और वो दो तिहाई बहुमत से प्रधानमंत्री भी चुन लिए गए.

यहां राजा महेन्द्र की कहानी भी जानना जरूरी है. नेपाल में पहली लोकतांत्रिक सरकार बनने से 110 साल पहले तक ‘राणा वंश’ का शासन चल रहा था जिन्होंने नेपाल के असली राजा त्रिभुवन को एक महल में बंद कर उन्हें नाम का राजा घोषित कर रखा था. उनके बेटे युवराज महेन्द्र की पढ़ाई भी किसी स्कूल में नहीं हुई बल्कि महल में ही अध्यापक उन्हें पढ़ाने आते थे. ऐसे में कहीं ना कहीं राजा त्रिभुवन और युवराज महेन्द्र के अंदर अपना राज वापस लाने की इच्छा भी थी. जनता भी राणा वंश से परेशान थी. राजा त्रिभुवन ने विद्रोह को हवा दी. बीपी कोइराला ने भी आंदोलन किया और एक दिन फिर से राजा त्रिभुवन 1951 में नेपाल के राजा बन गए, लेकिन वास्तविक शक्तियों के साथ.

राजा महेन्द्र लोकतंत्र को लाए, भारत जैसे केन्द्रीय संस्थान स्थापित किए

इधर महेन्द्र ने बाद में राणा वंश की राजकुमारी इंद्र राज्यलक्ष्मी से विवाह कर लिया. लेकिन उसकी जल्द मौत के बाद जब महेन्द्र ने उसकी छोटी बहन रत्ना से शादी करने का विचार किया तो राजा त्रिभुवन नाराज हो गए और उन्होंने मना कर दिया. पिता की इच्छा के विपरीत उन्होंने रत्ना से विवाह किया. इस शर्त के साथ कि वो उनके साथ कोई बच्चा पैदा नहीं करेंगे. लेकिन बाद में पिता की मौत के बाद 13 मार्च 1955 को वो राजा बन गए. उनके राज में नेपाल राष्ट्र बेक और सुप्रीम कोर्ट जैसे संस्थान स्थापित किए गए. उन्होंने चुनी हुई सरकार यानी लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी लाने का वायदा किया और पूरा भी किया.

नया संविधान बनाया गया कि निचले सदन में 109 सदस्य होंगे, ऊपरी सदन में 36 सदस्य होंगे, 18 चुने हुए और 18 मनोनीत. संविधान में भर्तियों के लिए पहले लोक सेवा आयोग के गठन का भी प्रावधान किया गया. नेपाली को आधिकारिक भाषा और देवनागरी को आधिकारिक लिपि घोषित किया गया, एक महालेखा नियंत्रक का भी प्रावधान किया गया लेकिन चुनाव आयोग का प्रावधान इस संविधान के अंदर नहीं था और ना ही राष्ट्रपति का, क्योंकि राजा ही सबके ऊपर थे, और वो राष्ट्रपति जैसी कम शक्तियों वाले राज्य प्रमुख के रूप में काम नहीं कर सकते थे.

इस तरह 1959 में नेपाल में पहली बार राजा महेन्द्र ने चुनाव करवाए, हालांकि वो खुद भी आंशकित थे कि नेपाल इस व्यवस्था को पसंद करेगा कि नहीं. लेकिन जब बीपी कोइराला को जनता ने चुना तो इतने वोट पाकर कोइराला खुद हैरान थे. उन्होंने शपथ ली और प्रधानमंत्री बन गए. करीब 18 महीने बाद अचानक राजा ने आपातकालीन शक्तियों का उपयोग करते हुए 15 दिसम्बर 1959 को सरकार भंग कर दी, और सारी व्यवस्था अपने हाथ में ले ली. कोइराला पर आरोप लगाए कि नेपाल में उनके राज में भ्रष्टाचार काफी बढ़ गया था, पार्टी हित को राष्ट्र हित से ऊपर जाकर प्रचारित किया और कानून व्यवस्था पटरी से उतर गई. जबकि उस वक्त के अखबार बताते हैं कि बीपी कोइराला राजा से बिना सलाह के बड़े-बड़े फैसले खुद ही लिए जा रहे थे. राजा को भड़काने वालों की कमी नहीं थी, राजा ने अपनी सत्ता लोकतंत्र के लिए ताक पर रखकर ये प्रयोग किया था, जो उनको लगता था कि फेल हो गया है. उनको अपने प्रधानमंत्री का रिमोट कंट्रोल भारत की कांग्रेस सरकार के हाथ में लगता था.

नेपाल के राजा को इनकार के पीछे था कांगेस का ये डर

कोइराला की सरकार गिरने के बाद से ही नेहरू सरकार नेपाल के राजा से नाराज चल रही थी. राजा भी अपने पीएम के कांग्रेसी होने से नाराज थे. नतीजा ये हुआ कि भारत और नेपाल के रिश्ते कमजोर होने लगे थे और भारत की बेरुखी से आहत नेपाल का झुकाव चीन की तरफ बढ़ता जा रहा था. ऐसे में गुरु गोलवलकर 1963 में नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर दर्शन के लिए गए तो नेपाल के राजा महेन्द्र से मुलाकात की. गुरु गोलवलकर ने उन्हें संघ के किसी कार्यक्रम में भारत आने के लिए भी कहा. भारत आने के बाद गुरु गोलवलकर ने इस मुलाकात की सूचना पत्र लिखकर पीएम पंडित नेहरू को भी दी.

25 दिसम्बर 1964 को नेपाल रेडियो ने एनाउंस किया कि राजा महेन्द्र जनवरी 1965 में आरएसएस के मकर संक्रांति उत्सव के लिए भारत के नागपुर शहर जाएंगे. जैसे ही ये ऐलान हुआ इसका सबसे ज्यादा असर चीन और पाकिस्तान में हुआ, वो ये मानकर चल रहे थे कि राजा के भारत की कांग्रेस सरकार से अच्छे सम्बंध नहीं हैं, लेकिन राजा संघ के कार्यक्रम में नागपुर जाने का मतलब है उनका झुकाव भारत की तरफ होना, वैसे भी दोनों में हिंदू बहुतायत में है.

इधर गुरु गोलवलकर को ये उम्मीद नहीं थी कि भारत सरकार इस कार्यक्रम के लिए नेपाल के राजा का वीजा भी रोक सकती है. दिसम्बर 1964 में नेपाल दूतावास ने भारत सरकार को नेपाल के राजा महेन्द्र और उनके सहयोगियों के नागपुर कार्यक्रम के लिए वीजा की एप्लीकेशन दी. लेकिन भारत के विदेश मंत्रालय की तरफ से जवाब मिला कि बिना सरकार के आधिकारिक कार्यक्रम के, किसी भी निजी संस्था के कार्यक्रम में आना ठीक नहीं है. उसने नेपाल के राजा को वहां ना जाने की सलाह दी और वीजा देने से मना कर दिया. इसके ठीक पांच दिन बाद 10 जनवरी को नेपाल के राजा ने अपना नागपुर दौरा रद्द कर दिया. आर के मलकानी अपनी किताब द आरएसएस स्टोरी में लिखते हैं कि, ‘कांगेस सरकार को डर था कि नेपाल राजा के इस दौरे से संघ और जनसंघ दोनों की लोकप्रियता बढ़ जाती.

पोप के स्वागत में पीएम, राष्ट्रपति बम्बई गए, हिंदू राजा को आने भी नहीं दिया’

भारत सरकार के इस रवैये पर गुरु गोलवलकर ने कोई भी सार्वजनिक बयान नहीं दिया. लेकिन नेपाल के प्रधानमंत्री तुलसी गिरि ने बेहद तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सीधे कांग्रेस की केन्द्र सरकार पर हमला बोल दिया, और कहा कि, “राजा के संघ के कार्यक्रम को सम्बोधित करने में क्या दिक्कत है? जब बम्बई में पोप ने कांग्रेस की ही सभा को सम्बोधित किया था, तब कोई दिक्कत क्यों नहीं थी? एक हिंदू राजा के एक हिंदू संगठन के कार्यक्रम में जाने से रोकने पर आपत्ति क्यों होनी चाहिए? जब वेटिकन स्टेट का प्रमुख बॉम्बे आता है, तो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों उसका स्वागत करने पहुंच जाते हैं, लेकिन जब हिंदू राज्य नेपाल का राजा एक हिंदू रैली सम्बोधित करने के लिए भारत आना चाहता है, तो दबाव डालकर उसकी यात्रा रद्द करवा दी जाती है”.

11 जनवरी को राजा महेन्द्र ने एक पत्र गुरुजी को भेजा कि उन्हें कितना दुख है इस कार्यक्रम में ना आ पाने का और एक पत्र साथ में भी भेजा ताकि उनके सम्बोधन को उस कार्यक्रम में उनकी तरफ से पढ़ा जा सके. दिलचस्प बात ये रही कि संघ प्रमुख और प्रधानमंत्री, दोनों ने ही इस विषय पर सार्वजनिक बयान देने से परहेज किया. हालांकि संघ की तरफ से ऑर्गनाइजर के 16 जनवरी 1965 के लेख में सरकार के इस कदम को हिंदू विरोधी बताकर उसकी जोरदार भर्त्सना की गई.

फिर भी शास्त्रीजी दो-दो बार नेपाल गए

खास बात ये है कि नेपाल के राजा के यहां शास्त्रीजी उसी साल 3 दिन की यात्रा पर अप्रैल के महीने में गए. साथ ही 3 करोड़ रुपये की बाढ़ सहायता भी दी. नेपाल और भारत के प्राचीन रिश्तों को भी याद दिलाया, उसे भारत का दोस्त बताया. इतना ही नहीं नेपाल विदेश मंत्रालय की 1965 की ईयरबुक समेत कई किताबों में भी दावा किया गया है कि उसी साल शास्त्रीजी ने फिर से नेपाल की यात्रा की. लेकिन इस यात्रा को आधिकारिक रिकॉर्ड में गुप्त रखा गया, 11-12 दिसम्बर की इस यात्रा के दौरान नेपाल ने भारत को भरोसा दिलाया कि पाकिस्तान को भारत के खिलाफ सहयोग नहीं करेगा और ना अपने एयरस्पेस का इस्तेमाल उसे करने देगा. उसी साल अगस्त सितम्बर में भारत पाक का युद्ध हुआ था, सो तनाव बरकरार था. इन दोनों यात्राओं को देखा जाए तो दो बातें स्पष्ट होती हैं कि भारत की तत्कालीन केन्द्र सरकार नेपाल से रिश्ते खराब करने के पक्ष में कतई नहीं थी, लेकिन वो ये भी नहीं चाहती थी कि नेपाल में जो सत्ता में आए, वो आरएसएस से अपने रिश्ते मजबूत रखे.

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