अ नेक पौराणिक कथाओं में भगवान विश्वकर्मा का उल्लेख प्राप्त होता है जिन्हें उत्कृष्ट वास्तु कला और भवनों का निर्माण करने के लिए जाना जाता है। भारतीय संस्कृति में भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि के प्रथम शिल्पी, दिव्य वास्तुकार तथा निर्माण-कला के अधिष्ठाता देवता के रूप में सम्मान दिया जाता है। वे शिल्प, वास्तुकला, अभियंत्रिकी, धातु-कला, यंत्र-निर्माण तथा हस्तकला के प्रतीक माने जाते हैं। भारत की प्राचीन सभ्यता में भवन निर्माण, मंदिर स्थापत्य, मूर्तिकला और नगर नियोजन जैसी कलाओं के विकास में विश्वकर्मा की परंपरा का विशेष महत्व माना गया है। इसी कारण प्रत्येक वर्ष विश्वकर्मा जयंती श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है।
पौराणिक ग्रंथों में भगवान विश्वकर्मा का उल्लेख देवताओं के दिव्य शिल्पकार के रूप में मिलता है। मान्यता है कि उन्होंने स्वर्गलोक का निर्माण किया, भगवान शिव के लिए त्रिशूल, भगवान विष्णु के लिए सुदर्शन चक्र, इंद्र का वज्र तथा अनेक दिव्य आयुध और भवनों का निर्माण किया। विभिन्न पुराणों में उनके द्वारा द्वारका, इंद्रपुरी और अन्य दिव्य नगरों के निर्माण का वर्णन मिलता है। यद्यपि ये विवरण धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं का हिस्सा हैं, फिर भी वे भारतीय शिल्प एवं वास्तु परंपरा के आदर्शों को अभिव्यक्त करते हैं।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारतीय शिल्पकला विश्व को प्राचीन और समृद्ध कलाओं में गिनी जाती है। प्राचीन मंदिर, स्तूप, गुफाएँ, दुर्ग, महल, बावडियाँ और ऐतिहासिक नगर भारतीय कारीगरों की अद्भुत प्रतिभा के साक्षी हैं। पत्थर पर बारीक नक्काशी, धातु की उत्कृष्ट प्रतिमाएँ, लकड़ी की कलात्मक कारीगरी तथा स्थापत्य की वैज्ञानिक योजना भारतीय निर्माण कला की विशिष्ट पहचान रही है। यह परंपरा निरंतर जारी है। भारतीय वास्तुकला केवल भवन निर्माण तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें प्रकृक्ति, पर्यावरण, दिशा, प्रकाश, वायु और सौंदर्य का भी समन्वय देखने को मिलता है। प्राचीन मंदिरों, महलों और नगरों की योजनाओं में कला और उपयोगिता का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। यही कारण है कि भारतीय स्थापत्य कला आज भी विश्वभर के शोधकर्ताओं और पर्यटकों को आकर्षित करती है।
भगवान विश्वकर्मा को विशेष रूप से शिल्पकारों, अभियंताओं, वास्तुकारों, बढ़ई, लोहार, स्वर्णकार, मशीन संचालकों, उद्योगों में कार्यरत कर्मचारियों तथा तकनीकी क्षेत्र से जुड़े लोगों द्वारा आराध्य देव के रूप में पूजा जाता है। विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर कारखानों, कार्यशालाओं, कार्यालयों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों में मशीनों, औजारों और उपकरणों की पूजा की जाती है। विश्वकर्मा जयंती का यह पर्व श्रम, कौशल, तकनीकी दक्षता और सृजनशीलता के सम्मान का संदेश देता है। आधुनिक भारत में ‘मेक इन इंडिया’, कौशल विकास, आत्मनिर्भरता और तकनीकी नवाचार जैसे अभियानों के संदर्भ में भी कुशल कारीगरों, इंजीनियरों और शिल्पियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। नई शिक्षा नीति में भी शिल्पकला को प्रमुखता दी जा रही है। भगवान विश्वकर्मा भारतीय शिल्प, वास्तुकला और निर्माण-कला के आदर्श प्रतीक माने जाते हैं। विश्वकर्मा जयंती केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि श्रम, कौशल, तकनीकी उत्कृष्टता, सृजनशीलता और राष्ट्र निर्माण का उत्सव भी है। हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में लकड़ी पर नक्काशी करके अनेकों वर्षों के परिश्रम से भव्य मंदिरों का निर्माण किया जा रहा है। पत्थरों और लकड़ी से स्थानीय शैली में भवन बनाना और विभिन्न शैलियों में मंदिरों का निर्माण करना हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण अंग रहा है। यह परंपरा आज भी निरंतर अग्रसर है। विश्वर्मा के वंशज भारतीय आज भी वास्तुकला और भवन एवं मंदिर निर्माण में आदर्श स्थापित कर रहे हैं।