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बाँस हो रहा खास

बाँस हो रहा खास

पर्यावरण संरक्षण के साथ रोजगार

लखनऊ। बाँस की खेती किसानों के लिये सिर्फ पारम्परिक खेती नहीं, बल्कि एक अच्छा करियर और कारोबार का जरिया बन सकती है। सही प्रजाति और वैज्ञानिक तरीके से बाँस की खेती की जाये तो किसान खेती के साथ-साथ हर साल लाखों रुपये की कमायी कर सकता है। बाँस से सिर्फ कच्चा माल ही नहीं, बल्कि अगरबत्ती की तीलियाँ, माचिस की तीलियाँ, आइसक्रीम स्टिक, टूथपिक, फर्नीचर, बोर्ड, चारकोल, पाउडर और बिजली उत्पादन के लिए बायोमास जैसे कई उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। यानी खेत में तैयार होने वाला बाँस आगे चलकर वैल्यू एडिशन के जरिए बड़े कारोबार का आधार बन सकता है।


प्रतापगढ़ निवासी ललित शर्मा ने इसी सोच के साथ बाँस को अपने करियर और कारोबार का आधार बनाया। वर्ष 2013 में उन्होंने सोलर एनर्जी डेवलपमेन्ट कोऑपरेटिव सोसाइटी का गठन किया। इसमें इंजीनियर, बीटेक, डिप्लोमा और आईटीआई जैसे तकनीकी रूप से शिक्षित करीब 210 बेरोजगार युवा जुड़े। शुरुआत सोलर एनर्जी से हुई, लेकिन बाद में बाँस और बायोमास के क्षेत्र में सम्भावनाएँ देखकर उन्होंने अपना फोकस बदल दिया। आज प्रदेशभर में करीब 700 एकड़ क्षेत्र में बाँस का प्लान्टेशन कराया जा चुका है और लक्ष्य 3,000 एकड़ तक पहुँचने का है।

एक बीघे से शुरू किया सफर

ललित शर्मा ने बताया कि शुरुआत में उन्होंने तमसा नदी के ऊपर वन विभाग की संस्था के साथ सिल्ट सफायी और नदी के दोनों किनारों पर बाँस लगाने का काम स्वयंसेवक के रूप में किया। इस काम में बाँस के पौधों की सफलता और जीवित रहने की दर अच्छी रही। इससे उन्हें बाँस की खेती को बड़े स्तर पर करने की प्रेरणा मिली। इसके बाद वर्ष 2019 में उन्होंने अपनी एक बीघा जमीन पर बाँस का प्लान्टेशन शुरू किया। इसके लिये मध्य प्रदेश के बड़वानी स्थित टिशू कल्चर लैब रेवा फ्लोरा कल्चर से पौधे लिये और उत्तर प्रदेश के लिये एजेंसी भी ली। उन्होंने बाँस का छोटा ग्रीनहाउस तैयार किया और धीरे-धीरे अपने प्लान्टेशन का विस्तार करते गये। आज 65 एकड़ में बस की खेती कर रहे हैं।
इतना ही नहीं वह अन्य किसानों को भी बाँस की खेती के लिये प्रेरित करते हैं, यही कारण है कि पूरे प्रदेश भर में एक बीघे से शुरू हुआ यह प्रयोग अब सैकड़ों एकड़ तक पहुँच चुका है। उनका लक्ष्य करीब 3,000 एकड़ में बाँस का प्लान्टेशन तैयार करना है, ताकि इससे करीब 2 मेगावाट का पावर प्लांट सुचारू रूप से चलाया जा सके। अब वह बाँस की खेती की चाह रखने वाले किसानों को पौध भी उपलब्ध कराते हैं।

2015 से बढ़ा बायोमास पर फोकस

ललित शर्मा ने बताया कि, वर्ष 2015 में बाँस को वन विभाग के दायरे से हटाकर घास की श्रेणी में रखने के बाद इसके उत्पादन और उपयोग की सम्भावनाएँ बढ़ीं। इसके बाद उन्होंने बायोमास और बायो-गैसिफायर के जरिए बिजली उत्पादन की दिशा में काम शुरू किया। उन्होने बताया कि बाँस तेजी से तैयार होने वाला ऐसा पौधा है, जिसका इस्तेमाल ऊर्जा उत्पादन से लेकर घरेलू उपयोग और औद्योगिक उत्पादों तक में किया जा सकता है। यही वजह है कि उन्होंने बाँस को केवल खेती के रूप में नहीं, बल्कि व्यावसायिक तौर पर विकसित करने पर जोर दिया।

एक एकड़ से 40-60 टन बायोमास

ललित शर्मा ने बताया कि, एक एकड़ में बाँस की नियमित कटिंग की जाये तो सालाना करीब 40 से 65 टन तक बायोमास प्राप्त किया जा सकता है। शुरुआती वर्षों में उत्पादन कम रहता है, लेकिन प्लान्टेशन विकसित होने के बाद लगातार उत्पादन मिलता रहता है। उन्होंने बताया कि टिशू कल्चर से तैयार बाँस अपेक्षाकृत जल्दी परिपक्व हो जाता है। रोपण के करीब 14 महीने बाद पहली कटिंग की जाती है। इसमें पुराने या मूल पौधे को हटाने की प्रक्रिया भी शामिल होती है और करीब 8 से 10 टन प्रति एकड़ बायोमास मिलता है। इसके बाद लगभग साढ़े तीन साल के आसपास मुख्य फसल मिलने लगती है।

40 से 120 वर्ष जीवन काल

बाँस की सबसे बड़ी खासियत इसकी लम्बी उत्पादक अवधि है। ललित शर्मा ने बताया कि, एक अच्छी तरह विकसित बाँस का पौधा 40 से 120 साल तक हर साल उत्पादन दे सकता है। एक पौधे से कमसे कम 8 बाँस निकलते हैं। एक एकड़ में करीब 450 से 500 पौधे लगाए जा सकते हैं और पूरी तरह विकसित होने पर करीब 4,000 बाँस तक उत्पादन होता है। हालांकि बाँस की वृद्धि और उत्पादन उसकी प्रजाति, जलवायु, सिंचायी, मिट्टी और प्रबन्धन पर निर्भर करता है।

तेज बारिश के अनुकूल

बाँस को दुनिया के तेजी से बढ़ने वाले पौधों में गिना जाता है। ललित शर्मा के अनुसार, तेज बारिश और अनुकूल मौसम में कुछ बाँस की प्रजातियों की लम्बाई बहुत तेजी से बढ़ सकती है। उनके अनुसार कुछ परिस्थितियों में पौधे की लम्बाई प्रतिदिन करीब एक मीटर से सवा मीटर तक बढ़ती देखी गयी है। देशी बीज से तैयार बाँस को उत्पादन योग्य होने में करीब साढ़े पांच साल लग सकते हैं, जबकि टिशू कल्चर से तैयार कुछ किस्में करीब 18 महीने से तीन साल में परिपक्व हो जाती हैं।

व्यवसाय के अनुसार लगाएं बाँस

बाँस की अलग-अलग प्रजातियों का इस्तेमाल अलग-अलग कामों में किया जाता है। Bambusa Balcooa को बायोमास, चारकोल और ऊर्जा उत्पादन के लिये उपयोगी बताया गया है। इसमें अच्छी मात्रा में बायोमास मिलता है। वहीं टुण्डला बाँस से माचिस और अगरबत्ती की तीलियाँ, आइसक्रीम व कुल्फी स्टिक, टूथपिक, ईयरबड्स और बोर्ड आदि बनाये जा सकते हैं। ललित शर्मा के अनुसार, एक बाँस से करीब 2.5 से 3 किलो तक तीलियाँ तैयार हो सकती हैं। एक किलो तीलियाँ 100 से 150 में बिकती हैं। एक बाँस में करीब तीन किलो तीलियाँ बनती हैं। बाकी वेस्ट का पाउडर बनाकर बेचा जा सकता है, जो बाजार में 27 रूपये किलो बिक रहा है।

बुद्धा बाँस

बुद्धा बाँस का आकार मटके जैसा दिखायी देता है। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से फेंसिंग और सजावटी सामान बनाने में किया जाता है। वहीं मूली बाँस का इस्तेमाल बाँसुरी बनाने में किया जाता है। इसके अलावा एस्पर जैसी नयी किस्म भी बाजार में आयी है, जो झुण्ड में न निकलकर अलग-अलग पौधों के रूप में बढ़ती है। इसमें एक एकड़ में करीब 1,000 से 1,200 पौधे लगाये जा सकते हैं।

बाँस से कई तरह के उत्पाद

बाँस की खेती का फायदा सिर्फ बाँस बेचने तक सीमित नहीं है। इसके अलग-अलग हिस्सों से कई तरह के उत्पाद तैयार किये जा सकते हैं। अगरबत्ती और माचिस की तीलियों के अलावा इससे आइसक्रीम स्टिक, टूथपिक, ईयरबड्स, बोर्ड और घरेलू उपयोग की वस्तुएँ बनायी जा सकती हैं।

बाँस से फर्नीचर, सजावटी सामान और बाड़ भी तैयार की जाती है। बाँस के बचे हुए हिस्से को बेकार समझने के बजाय उसका इस्तेमाल पाउडर, चारकोल और ऊर्जा उत्पादन में किया जा सकता है। इस तरह एक ही फसल से कई स्तर पर कमाई की सम्भावना बनती है।

अपशिष्ट से भी आय का रास्ता

ललित शर्मा के अनुसार, बाँस के वेस्ट मटेरियल को प्रोसेस करके पाउडर बनाया जाता है। इसकी कीमत करीब 27 रुपये प्रति किलो तक है। इसी तरह बाँस से चारकोल और बायोमास तैयार करके ऊर्जा क्षेत्र में इस्तेमाल किया जा सकता है। यानी किसान अगर सिर्फ बाँस बेचने के बजाय उसका वैल्यू एडिशन करे तो आमदनी के नये रास्ते खुल सकते हैं। यही मॉडल बाँस की खेती को सामान्य खेती से अलग एक कारोबारी मॉडल बनाता है।

एक एकड़ से डेढ़-दो लाख कमाई

ललित शर्मा ने बताया कि, बाँस की खेती में सही देखभाल और बाजार से जुड़ाव होने पर एक एकड़ से करीब डेढ़ से दो लाख रुपये महीने तक की कमाई सम्भव है। हालाँकि यह आय प्रजाति, उत्पादन, कटिंग, बाजार भाव, श्रम, सिंचायी और वैल्यू एडिशन पर निर्भर करेगी। उन्होंने बताया कि वर्तमान में उनके साथ करीब 22 कर्मचारी काम कर रहे हैं। बाँस की खेती पर्यावरण संरक्षण के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर भी पैदा कर सकती है।

नदी किनारे बाँस लगाने के लाभ

ललित शर्मा ने बताया कि, नदियों और जलस्रोतों के किनारे बाँस का प्लान्टेशन मिट्टी के कटाव को कम करने में मदद करता है। बाँस की जड़ें मिट्टी में फैलकर मजबूत जाल जैसा ढाँचा बनाती हैं, जिससे मिट्टी को पकड़ने में मदद मिलती है। उन्होने बताया कि बाँस की जड़ें पानी की ओर फैलती हैं और जमीन को बाँधने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस कारण नदी किनारे होने वाले मिट्टी के कटाव को कम करने के लिये भी बाँस का इस्तेमाल किया जाता है।

खेती के लिये कैसी जमीन जरूरी

ललित शर्मा का कहना है कि बाँस की एक खासियत यह है कि इसे किसी एक विशेष प्रकार की मिट्टी तक सीमित नहीं किया जा सकता। पर्याप्त धूप और पानी उपलब्ध होने पर यह कई तरह की जमीन में उग सकता है। नदी किनारे की रेतीली या बालू वाली जमीन में भी इसके प्लान्टेशन की सम्भावना रहती है। जिस जमीन पर घास उग रही है, वहाँ बाँस की खेती की जा सकती है। हालाँकि शंका समाधान के लिये व्यावसायिक खेती शुरू करने से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से मिट्टी, पानी, प्रजाति और बाजार की जानकारी ले सकते हैं।

पहले तैयार करें कच्चा माल

ललित शर्मा नये कारोबारियों को सलाह देते हैं कि बाँस आधारित उद्योग शुरू करने से पहले कच्चे माल की व्यवस्था करें। दूसरे किसानों या बाजार से बाँस खरीदकर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय पहले अपना प्लान्टेशन तैयार करना ज्यादा सुरक्षित मॉडल हो सकता है। उन्होने बताया कि पहले बाँस लगायें और जब प्लान्टेशन उत्पादन देने की स्थिति में पहुँच जाये, तब मशीनरी और वैल्यू एडिशन की दिशा में आगे बढ़ें। कारोबार के लिये कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है।

नया रोजगार मॉडल

ललित शर्मा की कहानी एक बीघे से शुरू होकर सैकड़ों एकड़ तक पहुँचने की कहानी है। उनका मॉडल बताता है कि बाँस को सिर्फ खेत की फसल के तौर पर देखने के बजाय इसे ऊर्जा, उद्योग, घरेलू उत्पाद और वैल्यू एडिशन से जोड़ा जा सकता है। अगर किसान प्लान्टेशन के साथ प्रोसेसिंग और बाजार की व्यवस्था भी तैयार करे तो बाँस रोजगार और कारोबार का बड़ा आधार बन सकता है। हालाँकि बड़े स्तर पर निवेश करने से पहले पौधों की वास्तविक उपज, स्थानीय बाजार, सरकारी नियम, पानी की उपलब्धता, श्रम लागत और बिक्री के खरीदारों का आकलन करना जरूरी होगा।

पर्यावरणीय एवं आर्थिक महत्व

बाँस तेजी से बढ़ने और कटायी के बाद प्राकृतिक रूप से दोबारा विकसित होने की क्षमता के कारण एक टिकाऊ और उपयोगी कच्चा माल माना जाता है। बाँस के परिपक्व तनों की कटायी के बाद भी जमीन के अन्दर मौजूद राइजोम (भूमिगत तना) जीवित रहता है। इससे नए अंकुर निकलते हैं और पौधा दोबारा विकसित हो जाता है। ऐसे में उचित प्रबन्धन के साथ बाँस की खेती में बार-बार नये पौधे लगाने की जरूरत कम हो जाती है।

पर्यावरण की दृष्टि से भी बाँस महत्वपूर्ण है। यह कार्बन पृथक्करण में योगदान देता है और तेजी से बढ़ने के कारण वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने में मदद करता है। इसकी जड़ें मिट्टी को बाँधे रखती हैं, जिससे मृदा अपरदन कम करने में सहायता मिलती है। बाँस का उपयोग लकड़ी के विकल्प के रूप में होने से प्राकृतिक वनों पर दबाव और लकड़ी पर निर्भरता भी घटायी जा सकती है। आर्थिक रूप से बाँस से फर्नीचर, कागज, निर्माण सामग्री, हस्तशिल्प और जैव-ऊर्जा जैसे कई उद्योग जुड़े हैं। बाँस आधारित उद्योगों से निकलने वाले अवशेषों और उप-उत्पादों का इस्तेमाल चारकोल व बायोचार जैसे मूल्यवर्धित उत्पाद बनाने में किया जा सकता है। इससे अपशिष्ट कम होता है, संसाधनों का बेहतर उपयोग होता है और किसानों व उद्योगों के लिये अतिरिक्त आय के अवसर पैदा होते हैं।

बाँस के प्रकार व उपयोग

  1. Bambusa balcooa मजबूत और मोटी दीवार वाला बाँस है जिसका उपयोग फर्नीचर, बोर्ड, हस्तशिल्प तथा चारकोल निर्माण में किया जाता है।
  2. Dendrocalamus strictus से चारकोल, बायोचार, फर्नीचर और कागज बनाए जाते हैं।
  3. Dendrocalamus asper का उपयोग खाद्य बाँस की कोपलों, फर्नीचर, फ्लोरिंग और पैनल बनाने में किया जाता है।
  4. Bambusa tulda मुख्य रूप से अगरबत्ती स्टिक, चटाई, बुने हुए उत्पाद और कागज उद्योग में उपयोगी है।
  5. Bambusa bambos निर्माण, फर्नीचर और हस्तशिल्प के लिए उपयोगी है
  6. Bambusa vulgaris से फर्नीचर, हस्तशिल्प और कागज बनाए जाते हैं।
  7. Dendrocalamus hamiltoni खाद्य बाँस की कोपलों तथा अन्य बाँस उत्पादों के लिए उपयोगी है।
  8. Melocanna baccifera का उपयोग घरेलू एवं हस्तशिल्प उत्पादों में किया जाता है।
  9. Bambusa nutans & Bambusa polymorpha का उपयोग मुख्यतः फर्नीचर, निर्माण और हस्तशिल्प में किया जाता है।

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