पूजनीय गुरुजी को साक्षात्कार हुआ था या नहीं इस सम्बन्ध में महाराष्ट्र के एक सन्त श्री दत्ता ने अपनी श्रद्धांजलि सभा में कहा- मेरे व्याख्यानों का कार्यक्रम जब नागपुर में आयोजित हुआ, तब मैंने देखा कि एक दाढ़ी-मूँछ व लम्बे केश वाले सज्जन कार्यक्रम में आये हैं। मैंने अपने साथियों से पूछा कि वे कौन है? तब बताया गया कि वे गुरुजी गोलवलकर हैं। उन्हें अपने कार्यक्रम में देखकर मुझे कौतूहल हुआ और दूसरे दिन उनसे मिलने डॉ. हेडगेवार भवन चला गया। उनसे एकान्त में वार्तालाप में मैंने योग सम्बन्धी कुछ प्रश्न पूछे। मैंने अनुभव किया कि वे जो उत्तर देते थे वे एक स्तर आगे के रहते थे।
इस प्रकार एक-एक सीढ़ी हम ऊपर उठते गये। अन्त में मैंने उनसे एक प्रश्न पूछ लिया ‘गुरुजी क्या आपको भगवान के दर्शन हुए हैं?’ उन्होंने मेरी ओर कुछ देर तक देखा और मेरा हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा कि ‘एक शर्त पर बताता हूँ कि किसी से कहोगे नहीं।’ मेरे हाँ कहने पर उन्होंने कहा- ‘हाँ, हुआ है। संघ पर लगे प्रतिबन्ध के समय जब मैं सिवनी जेल में था और खाट पर बैठे हुए सारे घटनाक्रम के बारे में चिंतित हो रहा था, तब मुझे लगा कि कोई मेरे कन्धे को दबा रहा है। जब पलटकर ऊपर देखा तो तो साक्षात् जगज्जननी-माँ सामने खड़ी थी। उसने आश्वस्त करते हुए कहा- ‘सब ठीक होगा।’
उसी बलबूते पर तो आगे के सारे संकटों का मैं दृढ़ता के साथ सामना कर सका।’ और यह सुनाते हुए श्री दत्ता ने कहा- ‘चूंकि अब वे दिवंगत हो गये हैं, इसलिये उनको दिये गये अभिवचन से मैं मुक्त हो गया हूँ और यह बात आप सबको बता रहा हूँ।’ ऐसे एक अध्यात्म-शक्तिसम्पन्न व्यक्ति के दर्शन, निर्देशन, सान्निध्य और नेतृत्व का लाभ हम सबको मिल सका, इसे अपने पूर्वजन्मों के सुकृत का ही परिणाम मानना होगा। पूजनीय गुरुजी को कर्क रोग होने का कारण क्या था इस सम्बन्ध में श्रीगुरु जी के साथ वार्तालाप का स्मरण हो आया। अनौपचारिक बातचीत में प्राणायाम के सम्बन्ध में उन्होंने कहा कि प्राणायाम किसी योग्य गुरु के निर्देशन में ही किया जाना चाहिये।
प्राणायाम की क्रिया-पूरक और रोचक तो विशेष हानिकारक नहीं किन्तु कुम्भक अति सावधानी की अपेक्षा रखता है। यदि गड़बड़ हुआ तो प्राण नियंत्रित होने के स्थान पर कुपित हो जाता है। यह कहते ही उन्होंने अपना खुद का अनुभव सुनाया- ‘मैं रोज संध्या करते समय प्राणायाम भी किया करता था। एक दिन कक्ष का द्वारा भिड़ा हुआ था। मैं जब कुम्भक की स्थिति में था तब शरीर किसी भी प्रकार का धक्का सहन करने की स्थिति में नहीं था। इसी समय 4 वर्ष की बच्ची आयी और मेरी पीठ पर लग गयी। उसके कारण छाती में बायीं ओर जो दर्द शुरू हुआ, वह आज तक नहीं गया। आगे चलकर हमें देखा उसी स्थान पर कर्क की गठन उभर गयी। (स्रोत : पूर्व सरसंघचालक मा. के.सी. सुदर्शन जी के लेख से)
