आप प्राचीन भारत के एक अत्यन्त प्रतिष्ठित ऋषि, महान दार्शनिक और ज्योतिष शास्त्र के स्तम्भ माने जाते हैं। वे सप्तऋषियों की परम्परा से जुड़े हैं और वेदव्यास के पिता थे। उनकी विद्वत्ता और आध्यात्मिक शक्ति के कारण उन्हें ‘महर्षि’ की उपाधि प्राप्त है।

​महर्षि पराशर का योगदान केवल आध्यात्म तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने विज्ञान और खगोलशास्त्र में भी अमूल्य ज्ञान दिया। ​

उनके द्वारा रचित बृहद पराशर होरा शास्त्र ग्रन्थ, जो भारतीय ज्योतिष (वेदांग ज्योतिष) का आधार स्तम्भ है। आज भी फलित ज्योतिष के अधिकांश सिद्धांत इसी ग्रंथ पर आधारित हैं।

​ अठारह पुराणों में सबसे महत्वपूर्ण ‘विष्णु पुराण’ की रचना महर्षि पराशर ने ही की थी, जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति और वंशावली का विस्तृत वर्णन है।

​कृषि पराशर उनका कृषि विज्ञान पर एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जो प्राचीन भारत की उन्नत खेती और मौसम विज्ञान को दर्शाता है।


​महर्षि पराशर शक्ति मुनि के पुत्र और महर्षि वशिष्ठ के पौत्र थे। वे अद्वैत दर्शन के ज्ञाता थे और उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य मानवता को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाना था।

​”पराशर ऋषि ने न केवल धर्म की स्थापना की, बल्कि उन्होंने समय, नक्षत्र और ग्रहों की गणना के माध्यम से मनुष्य के भाग्य और कर्म के बीच के संबंध को स्पष्ट किया।”

​उनकी शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं। भारतीय संस्कृति में उन्हें एक ऐसे ऋषि के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने ज्ञान की विभिन्न धाराओं—जैसे ज्योतिष, पुराण और कृषि—को एक सूत्र में पिरोया। उनका जीवन कठोर तपस्या और निरन्तर शोध का प्रतीक है, जिससे आने वाली पीढ़ियाँ युगों-युगों तक लाभान्वित होती रहेंगी।

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