एक सैनिक की आँखों में बसा विभाजन का दर्द
कृष्णनन्द सागर
मेरे एक मित्र श्री विजयेद्रनाथ शर्मा की बेटी की शादी में श्री अर्जुन देव रौली से भेंट हुई। भारतीय वायुसेना से ग्रुप कैप्टन के पद से अवकाश प्राप्त रौली जी ने मेरे प्रश्नों के उत्तर में बहुत संक्षिप्त रूप में केवल इतना ही कहा। इससे अधिक वे कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हुए।
– लेखक
“मैं १६४७ में लाहौर से फगवाड़ा संघ शिक्षावर्ग में गया था। शिक्षावर्ग समाप्त होने पर मैं सीधा लाहौर पहुँचा था। वहाँ दो-तीन सप्ताह पंजाब रिलीफ कमेटी के कैम्प में सेवा कार्य करता रहा। उसके बाद मैं लाहौर से निकला। इधर आने पर पता चला कि मेरे परिवार के लोग सड़क मार्ग से काफिले के साथ नारोवाल से अमृतसर आ रहे थे। डेरा बाबानानक पर रावी नदी का पुल है। पुल पार कर लेते तो वे हिन्दुस्थान पहुँच जाते और डेरा बाबानानक से वे अमृतसर आ जाते। लेकिन नारोवाल और डेरा बाबानानक के बीच में ही इस काफिले पर मुसलमानों ने आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण में मेरे परिवार के २७ लोग सरे आम सड़क पर कतल कर दिए गए।”
मेरे द्वारा कुछ और प्रश्न पूछने पर वे बहुत ही आर्द्रस्वर में बोले-
“अब मैं उन बातों को याद नहीं करना चाहता। इसलिए मैं कुछ नहीं बता सकूँगा। कृपया इस विषय में कुछ मत पूछिये। मैने घर में भी अपने बच्चों से इस विषय में कभी बात नहीं की। आप पुनः वह सब मुझे याद मत कराएँ।”
इसके बाद मैं उनसे और कोई प्रश्न नहीं कर सका।
अर्जुन देव रौली, ग्रुप कैप्टन
ए-55, सेक्टर-21, नोएडा
साक्षात्कार दि. 26-5-2004
विभाजनकालीन भारत के साक्षी

