धर्म का द्वितीय लक्षण : क्षमा

धर्म का द्वितीय लक्षण : क्षमा

डॉ. बिपिन कुमार पाण्डेय
शिक्षक, ज्योतिर्विज्ञान विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ

शक्ति की सर्वोच्च अभिव्यक्ति विजय में नहीं, क्षमा में होती है; क्योंकि विजय केवल शत्रु को परास्त करती है, जबकि क्षमा शत्रुता का ही अंत कर देती है। जहाँ प्रतिशोध सभ्यता का अवसान करता है, वहीं क्षमा संस्कृति का उदय करती है। मनुष्य की वास्तविक विजय शत्रु को पराजित करने में नहीं, बल्कि अपने क्रोध, अहंकार और प्रतिशोध पर विजय प्राप्त करने में निहित है। आज का मानव विज्ञान और तकनीक की अभूतपूर्व ऊँचाइयों को स्पर्श कर चुका है, किन्तु मानसिक अशान्ति, सामाजिक कटुता, पारिवारिक विघटन और वैश्विक संघर्ष उसके सामने गंभीर चुनौती बनकर खड़े हैं। ऐसे संक्रमणकाल में भारतीय संस्कृति का शाश्वत संदेश- क्षमा मानवता के लिए प्रकाशस्तम्भके समान है।

भारतीय धर्मदर्शन में धर्म का अर्थ किसी सम्प्रदाय विशेष से नहीं, बल्कि जीवन को धारण करने वाले श्रेष्ठ आचरण से है। मनुस्मृति ने धर्म के दस लक्षणों का उल्लेख करते हुए कहा है-

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ।।

इन दस लक्षणों में क्षमा को द्वितीय स्थान दिया गया है। यह केवल क्रम नहीं, बल्कि यह उद्घोष है कि धैर्य के पश्चात् मनुष्य को देवत्व की ओर ले जाने वाला सर्वोच्च गुण क्षमा है। संस्कृत की ‘क्षम्’ धातु से निर्मित ‘क्षमा’ शब्द सहनशीलता, उदारता और प्रतिशोध के त्याग का द्योतक है। यही धातु ‘क्षमता’ का भी मूल है, जो यह संकेत देती है कि वास्तविक क्षमा सदैव सामर्थ्य की अभिव्यक्ति होती है, दुर्बलता की नहीं।

भारतीय ग्रन्थों में क्षमा का आदर्श अत्यन्त ऊँचे स्तर पर प्रतिष्ठित है। लंका-विजय के उपरान्त जब हनुमान राक्षसियों को दण्डित करना चाहते हैं, तब माता सीता करुणा का अनुपम संदेश देती हैं- ‘न कश्चिन्नापराध्यति – इस संसार में ऐसा कोई नहीं जिससे कभी अपराध न हुआ हो। यह वचन बताता है कि न्याय का सर्वोच्च रूप करुणा से संयुक्त होना चाहिए।महाभारत के काश्यपगीता प्रकरण में क्षमा को धर्म, यज्ञ, वेद, सत्य और ब्रह्म तक की संज्ञा दी गई है-

क्षमा धर्मः क्षमा यज्ञः क्षमा वेदाः क्षमा श्रुतम् ।
क्षमा ब्रहा क्षमा सत्यं क्षमा तपः क्षमा शौचम् ।।

यहाँ क्षमा केवल नैतिक सद्गुण नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करने वाली आध्यात्मिक शक्ति है। यही कारण है कि भारतीय चिंतन में क्षमा आत्मविजय, लोकमंगल और ब्रह्मप्राप्ति का सेतु मानी गई है।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने क्षमा को दैवी सम्पदा तथा अपनी दिव्य विभूति बताया है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में विजय रथ की रज्जु के रूप में क्षमा का चित्रण कर स्पष्ट किया कि शक्ति तभी कल्याणकारी बनती है जब वह क्षमा और करुणा से नियंत्रित हो। जैन धर्म ने ‘उत्तम क्षमा’ को दशलक्षण धर्म का प्रमुख आधार माना, जबकि बौद्ध दर्शन ने उद्घोष किया कि वैर का अंत वैर से नहीं, बल्कि अवैर और क्षमा से होता है।

अब्दुर्रहीम खानखाना ने कहा-

“छिमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात ।’

और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने इस सत्य को अमर शब्द दिए-

“क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो।’

अर्थात् क्षमा उसी को शोभा देती है जो प्रतिकार करने में समर्थ होते हुए भी विवेकवश दण्ड का परित्याग करे। सामर्थ्य से रहित व्यक्ति का मौन विवशता हो सकता है, परन्तु सामर्थ्यवान की क्षमा चरित्र की सर्वोच्च गरिमा है।

आज का समाज संवाद से अधिक विवाद, सह-अस्तित्व से अधिक संघर्ष और सहयोग से अधिक प्रतिशोध की ओर अग्रसर दिखाई देता है। आधुनिक मनोविज्ञान भी स्वीकार करता है कि क्षमा मानसिक तनाव, क्रोध और अवसाद को कम कर आत्मिक शान्ति प्रदान करती है। सामाजिक स्तर पर यही गुण विश्वास, सहयोग और समरसता की आधारशिला बनता है।

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