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धर्म जीवन के प्रारम्भ से अन्त तक साथ रहने वाला शाश्वत तत्व है : डॉ. मोहन राव भागवत

उज्जैन। भगवान महाकाल की नगरी अवन्तिका उज्जयिनी में आयोजित युवा धर्म संसद के उद्घाटन सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन राव भागवत ने धर्म को जीवन के प्रत्येक पक्ष को दिशा देने वाला शाश्वत तत्व बताते हुए कहा कि धर्म केवल वृद्धावस्था में पढ़ने या समझने का विषय नहीं है, बल्कि मनुष्य के जन्म से मृत्यु तक उसके जीवन का आधार बना रहता है। उन्होंने युवाओं से धर्म को केवल कर्मकाण्ड अथवा किसी सम्प्रदाय विशेष के रूप में न देखकर उसके व्यापक और व्यावहारिक स्वरूप को समझने तथा उसे अपने आचरण में उतारने का आह्वान किया।

डॉ. भागवत ने कहा कि युवा धर्म संसद का आयोजन सुनकर उन्हें आनन्द हुआ, क्योंकि धर्म के विषय में युवाओं का विचार करना आज के समय में विशेष महत्त्व रखता है। सामान्यतः यह धारणा बन गई है कि धर्म वृद्धावस्था का विषय है और भगवद्गीता तथा रामायण जैसे ग्रन्थों का अध्ययन सेवानिवृत्ति के बाद किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह धारणा उचित नहीं है। धर्म सृष्टि के अस्तित्व के प्रारम्भ से उसके अन्त तक विद्यमान रहने वाला तत्व है। मनुष्य उसे माने या न माने, उसके अनुसार जीवन चलता है। उन्होंने सूर्य और गुरुत्वाकर्षण का उदाहरण देते हुए कहा कि किसी प्राकृतिक नियम को न मानने से उसका अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता। इसी प्रकार धर्म भी मनुष्य की इच्छा पर निर्भर नहीं है।

उन्होंने कहा कि धर्म को समझना आसान भी है और अत्यन्त गहन भी। धर्म के तत्व को समझने में पूरा जीवन लग सकता है। इसी सन्दर्भ में उन्होंने कहा कि धर्म के विषय में विभिन्न मत हो सकते हैं और धर्म का वास्तविक तत्व गहनता में निहित है। सन्तों ने इसे सरल रूप में परोपकार और परपीड़ा से जोड़कर समझाया है—“परहित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।” उन्होंने कहा कि युवा धर्म संसद में धर्म के विषय पर विचार-विमर्श होना है, इसलिए केवल सामान्य परिभाषाओं से काम नहीं चलेगा; धर्म के स्वरूप और उसके व्यावहारिक पक्ष का गम्भीर चिन्तन करना होगा।

धर्म जीवन के प्रारम्भ से अन्त तक साथ रहने वाला शाश्वत तत्व है : डॉ. मोहन राव भागवत

धर्म को समझने के लिए मन को पूर्वाग्रहों से मुक्त करना आवश्यक

डॉ. भागवत ने धर्म को समझने के लिए मन को पूर्वधारणाओं से मुक्त करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक लामा के पास गया। लामा ने उसके सामने चाय का कप रखा और उसमें चाय डालते रहे। कप भरने के बाद भी चाय डालते रहने पर व्यक्ति ने कहा कि कप भर चुका है और अब उसमें और चाय नहीं आ सकती। लामा ने कहा कि इसी प्रकार तुम्हारा मन भी पहले से प्राप्त ज्ञान और धारणाओं से भरा हुआ है। यदि नया ज्ञान प्राप्त करना है तो पहले मन को खाली करना होगा।

उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म को समझने के लिए मन में पहले से बनी धारणाओं और पूर्वाग्रहों पर पुनर्विचार आवश्यक है। धर्म किसी एक आयु, वर्ग अथवा सम्प्रदाय तक सीमित नहीं है। मनुष्य जब से समझने योग्य होता है, तभी से उसे धर्म के विषय में विचार करना चाहिए, क्योंकि धर्म उसके व्यक्तिगत जीवन से लेकर परिवार, समाज और समूची सृष्टि के संचालन तक से सम्बन्धित है।

धर्म और ‘रिलिजन’ में अन्तर

डॉ. भागवत ने कहा कि धर्म के विषय में भ्रम का एक प्रमुख कारण अपनी भाषा और परम्परागत अवधारणाओं का विस्मरण है। पश्चिमी समाज ने भारत में धर्म के आचरण को देखा, लेकिन उसे अपने सन्दर्भ में समझने के कारण धर्म का अनुवाद ‘रिलिजन’ के रूप में किया गया। बाद में भारतीयों ने भी धर्म के लिए ‘रिलिजन’ शब्द का प्रयोग शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि धर्म और रिलिजन को समान मानना उचित नहीं है।

उन्होंने कर्मकाण्ड को समझाते हुए कहा कि जैसे कुश्ती सीखने के लिए अखाड़े में अभ्यास करना पड़ता है, उसी प्रकार धर्म के आचरण में कुछ अनुशासन और कर्मकाण्ड की भूमिका होती है। कर्मकाण्ड धर्म का एक अंग हो सकता है, लेकिन वही सम्पूर्ण धर्म नहीं है। उन्होंने कहा कि धर्म मनुष्य को बाँधने वाला नहीं, बल्कि मुक्त करने वाला तत्व है। धर्म का सम्बन्ध धारणा से है—जो व्यक्ति, समाज और सृष्टि को जोड़ता है, स्थिर रखता है और उन्नति की दिशा देता है।

धर्म का अर्थ कर्तव्य और स्वभाव भी

डॉ. भागवत ने कहा कि धर्म का एक अर्थ कर्तव्य है। पुत्र धर्म, राजधर्म आदि इसी अर्थ को व्यक्त करते हैं। दूसरा अर्थ स्वभाव है। पानी का बहना और अग्नि का जलना उसके स्वभाव या धर्म का उदाहरण है। उन्होंने कहा कि धर्म वह है जिससे भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों प्रकार की उन्नति सम्भव हो। उन्होंने “यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः” का उल्लेख करते हुए कहा कि जिससे सांसारिक उन्नति और आध्यात्मिक कल्याण दोनों प्राप्त हों, वही धर्म है।

उन्होंने धर्म की अपनी समझ प्रस्तुत करते हुए कहा कि सम्पूर्ण विश्व की धारणा और उन्नति के लिए सबको जोड़ने वाला, सबको उन्नत करने वाला, जीव-जगत और वस्तुओं के स्वभाव को ध्यान में रखते हुए उनके कर्तव्य का निर्धारण करने वाला तथा भौतिक और आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने वाला अनुशासन धर्म है। उन्होंने कहा कि इस परिभाषा को कोई तत्काल स्वीकार न करे, बल्कि उस पर विचार करे।

धर्म केवल भाषण और पुस्तकों में नहीं, आचरण में है

डॉ. भागवत ने कहा कि धर्म की साधना केवल पुस्तकों के अध्ययन अथवा व्याख्यान सुनने से नहीं होती। धर्म को जीवन में उतारना पड़ता है। “आचारप्रभवो धर्मः” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि धर्म आचरण से प्रकट होता है। सृष्टि के प्रत्येक जीव और प्रत्येक वस्तु का अपना धर्म है। सभी के धर्म का समन्वय होने पर सृष्टि सुचारु रूप से चलती है।

उन्होंने महाभारत में युधिष्ठिर के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि युधिष्ठिर जीवनभर धर्म की खोज और उसके पालन के प्रयास में रहे। स्वर्गारोहण के समय जब उनके साथ चल रहा कुत्ता स्वर्ग में ले जाने से मना किया गया, तब उन्होंने कुत्ते को छोड़कर स्वर्ग जाने से इनकार कर दिया। उनके अनुसार उस कुत्ते ने अन्तिम समय तक उनका साथ दिया था और उसका साथ छोड़ना उचित नहीं था। इस प्रसंग को उन्होंने मित्रता और कर्तव्य के धर्म का उदाहरण बताया।

धर्म में सभी के हित का समन्वय

डॉ. भागवत ने राजा शिवि और कबूतर-बाज के प्रसंग के माध्यम से धर्म के समन्वयकारी स्वरूप को समझाया। उन्होंने कहा कि कबूतर अपनी रक्षा के लिए राजा शिवि की शरण में आया था, जबकि बाज के लिए कबूतर उसका प्राकृतिक आहार था। यदि केवल एक पक्ष का हित देखा जाता तो दूसरे के धर्म की हानि होती। राजा शिवि ने दोनों के धर्म की रक्षा के लिए अपने शरीर का मांस देने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य का कर्तव्य केवल अपने हित की रक्षा करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें दूसरे जीवों के अस्तित्व और हित की भी रक्षा हो।

उन्होंने कहा कि मनुष्य ने अपनी बुद्धि और सामर्थ्य के बल पर स्वयं को सृष्टि का प्रमुख बना लिया है। मनुष्य के पास न तो अन्य जीवों जैसी प्राकृतिक शक्ति है, न मोटी खाल, न सींग और न ही नुकीले दाँत। इसके बावजूद बुद्धि के कारण वह प्रकृति पर व्यापक प्रभाव डालता है। इसलिए उसके ऊपर सृष्टि के संरक्षण का उत्तरदायित्व भी है।

पर्यावरण संरक्षण भी धर्म का हिस्सा

डॉ. भागवत ने पर्यावरणीय असन्तुलन को मनुष्य के अधर्म से जोड़ते हुए कहा कि प्रकृति के साथ असन्तुलित व्यवहार के परिणाम आज पूरी दुनिया देख रही है। जीव-जन्तुओं और वनस्पतियों की अनेक प्रजातियाँ विलुप्त हो चुकी हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य को भोजन-श्रृंखला और प्रकृति के सन्तुलन का ध्यान रखना चाहिए। प्रकृति का अन्धाधुन्ध दोहन धर्मसम्मत आचरण नहीं है।

उन्होंने भारतीय परम्परा में प्रकृति के प्रति सन्तुलित दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य की प्रगति ऐसी होनी चाहिए जिसमें पृथ्वी, पर्यावरण और अन्य जीवों के अस्तित्व को नुकसान न पहुँचे। धर्म का उद्देश्य केवल मनुष्य का सुख नहीं, बल्कि समूची सृष्टि की धारणा है।

व्यवसाय में भी धर्म आवश्यक

डॉ. भागवत ने विदेशों में भारतीय उद्योगपतियों के साथ हुई बैठकों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनसे व्यवसाय के धार्मिक दृष्टिकोण के बारे में प्रश्न किए गए। उन्होंने कहा कि आज अनेक लोग आर्थिक रूप से आगे बढ़ने के बावजूद जीवन में सुख और सन्तोष का अनुभव नहीं कर पा रहे हैं। अत्यधिक धन कमाने की दौड़ में परिवार और व्यक्तिगत जीवन प्रभावित हो रहे हैं।

उन्होंने कहा कि व्यवसाय में धन कमाना गलत नहीं है। दोनों हाथों से कमाने का प्रयास किया जा सकता है, लेकिन अपने लिए आवश्यक धन रखने के बाद शेष संसाधनों का उपयोग समाज के हित में किया जाना चाहिए। उन्होंने भारतीय परम्परा में धर्मशालाओं, चिकित्सालयों और अन्य लोकहितकारी संस्थाओं की स्थापना का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना भारत में बहुत पुरानी रही है। आधुनिक समय में जिसे कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी कहा जाता है, उसके समान सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना भारतीय समाज में पहले से दिखाई देती रही है।

त्याग और परोपकार धर्म का आधार

डॉ. भागवत ने कहा कि भौतिक जीवन में सुख-सुविधा और आध्यात्मिक जीवन में अमरता के लिए त्याग आवश्यक है। उन्होंने “न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः” का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन में केवल संचय नहीं, बल्कि त्याग और परोपकार की भावना भी आवश्यक है।

उन्होंने बुद्ध के उपदेश “सब्बपापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसम्पदा, सचित्तपरियोदपनं” का उल्लेख करते हुए कहा कि दूसरों को पीड़ा न देना, अपनी आजीविका कुशलता से अर्जित करना और अपने चित्त को शुद्ध करना धर्म के व्यावहारिक पक्ष हैं। उन्होंने मधुमक्खी का उदाहरण देते हुए कहा कि वह फूल से मधु ग्रहण करती है, लेकिन फूल को नष्ट नहीं करती। इसी प्रकार मनुष्य को संसाधनों का उपयोग करते हुए प्रकृति और समाज को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए।

सत्य, करुणा, शुचिता और तप धर्म के आधार

डॉ. भागवत ने धर्म के चार प्रमुख आधार बताते हुए कहा कि सत्य, करुणा, शुचिता और तपस्या मनुष्य के जीवन को धर्ममय बनाते हैं। उन्होंने कहा कि सत्य यह है कि सृष्टि में विविधता दिखाई देती है, लेकिन उसके मूल में एकत्व का भाव है। इसी कारण मनुष्य में दूसरे जीवों के प्रति संवेदना उत्पन्न होती है।

उन्होंने कहा कि किसी अपरिचित व्यक्ति के दुर्घटनाग्रस्त होने पर भी हमारे भीतर स्वतः चिन्ता और संवेदना उत्पन्न होती है। किसी जीव के संकट में पड़ने पर मनुष्य की सहज प्रतिक्रिया करुणा की होती है। यह संवेदना मनुष्य के भीतर विद्यमान एकत्व के बोध से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य जैसे विकारों से ऊपर उठकर चित्त को निर्मल करना आवश्यक है। इसी से करुणा और संवेदना का विकास होता है।

भारत की परम्परा में धर्म और शक्ति का समन्वय

डॉ. भागवत ने कहा कि धर्म का अर्थ दुर्बल होना नहीं है। धर्म की रक्षा के लिए शक्ति भी आवश्यक है। श्रीराम और श्रीकृष्ण के उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि धर्म की स्थापना के लिए शक्ति और सामर्थ्य का उपयोग आवश्यक रहा है। उन्होंने कहा कि भारत की परम्परा में शक्ति का उद्देश्य दूसरों पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं, बल्कि संरक्षण करना रहा है।

उन्होंने कहा कि विद्या, धन और शक्ति यदि धर्म से जुड़ी न हों तो वे विवाद, अहंकार और दूसरों के उत्पीड़न का कारण बन सकती हैं। इसके विपरीत धर्मयुक्त विद्या ज्ञान के लिए, धन दान के लिए और शक्ति संरक्षण के लिए प्रयुक्त होती है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे विद्वान, धनवान और शक्तिशाली बनें, लेकिन अपनी शक्ति का उपयोग समाज और कमजोरों के संरक्षण के लिए करें।

भारत का लक्ष्य विश्वकल्याण

डॉ. भागवत ने कहा कि भारत को आर्थिक और सामरिक रूप से सशक्त बनना चाहिए, लेकिन केवल आर्थिक अथवा सामरिक शक्ति भारत का अन्तिम लक्ष्य नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि भारत की परम्परा विश्व को सुखी और शान्त बनाने की रही है। भारत का उद्देश्य स्वयं समृद्ध होकर उस समृद्धि और जीवन-दृष्टि का लाभ पूरी मानवता तक पहुँचाना होना चाहिए।

उन्होंने भारत की पन्थ-निरपेक्ष परम्परा का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय सन्दर्भ में राज्य ने सामान्यतः पन्थ और सम्प्रदाय के आधार पर भेदभाव नहीं किया। उन्होंने ‘सर्वपन्थ समादर’ और पन्थ-निरपेक्षता की अवधारणा को भारतीय सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार भारत ने भौतिक और आध्यात्मिक जीवन को एक-दूसरे से पूरी तरह अलग करके नहीं देखा, बल्कि जीवन को समग्र दृष्टि से समझा है।

युवाओं से धर्म को जीवन में उतारने का आह्वान

डॉ. भागवत ने कहा कि धर्म को केवल बड़े-बड़े सिद्धान्तों में खोजने की आवश्यकता नहीं है। हम भोजन के बाद कचरा निर्धारित स्थान पर डालते हैं, यातायात के नियमों का पालन करते हैं, अपनी उपासना-पद्धति के प्रति निष्ठावान रहते हैं और दूसरों की उपासना-पद्धतियों का सम्मान करते हैं— ये सभी धर्म के व्यावहारिक रूप हैं।

उन्होंने कहा कि मनुष्य की मनुष्यता ही मानव धर्म का आधार है। व्यक्ति की सफलता तभी सार्थक होती है, जब उसमें दूसरों की सफलता भी शामिल हो। उन्होंने कहा कि केवल स्वयं जीतना पर्याप्त नहीं है; वास्तविक सार्थकता तब है, जब व्यक्ति अपने साथ दूसरों को भी आगे बढ़ाए। इसी प्रकार केवल स्वयं जीना नहीं, बल्कि दूसरों को भी जीने का अवसर देना धर्म का भाव है।

डॉ. भागवत ने कहा कि करोड़ों रुपये कमाने वाला व्यक्ति भी यदि जीवन में सन्तोष और समाधान प्राप्त नहीं कर पाता तो उसकी आर्थिक उपलब्धियाँ अधूरी रह जाती हैं। इसके विपरीत धर्मानुकूल जीवन जीने वाला व्यक्ति परिस्थितियों के बावजूद सन्तोष और सार्थकता का अनुभव कर सकता है तथा उसके जीवन से दूसरे लोग प्रेरणा लेते हैं।

उन्होंने युवा धर्म संसद में उपस्थित युवाओं से अपेक्षा व्यक्त की कि वे धर्म के इन तत्वों पर गम्भीर और सार्थक संवाद करें तथा उन्हें अपने जीवन में लागू करने के उपायों पर विचार करें। उन्होंने कहा कि भारत के युवाओं का जीवन ऐसा होना चाहिए, जिससे भारत ही नहीं, बल्कि पूरा विश्व प्रेरणा ले। उन्होंने युवाओं को शुभकामनाएँ देते हुए अपने उद्बोधन का समापन किया।

कार्यक्रम के प्रारंभ में दीप प्रज्ज्वलन हुआ। इसके पश्चात स्वामी विवेकानंद एवं भारत माता के चित्र पर माल्यार्पण किया गया और राष्ट्रगीत के साथ उद्घाटन सत्र की औपचारिक शुरुआत हुई। स्वागत वक्तव्य में पूज्य आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण जी महाराज ने युवाओं को आत्मनिर्माण और भारत-बोध का संदेश देते हुए कहा कि अपने से नीचे को जीतने में वास्तविक विजय नहीं है, बल्कि जो आपसे उच्च है, उसे सिद्ध करने में विजय है। भारतीय युवा केवल युवा होने तक सीमित न रहे, बल्कि अपने निर्माण के साथ भारत को पहचाने। युवाओं के प्रश्नों में स्वयं युवा उपस्थित रहें और अपने प्रश्नों को बाजार, राजनीति अथवा अन्य बाहरी परिदृश्यों से प्रभावित होने के बजाय अपनी आत्मचेतना और जीवन-मूल्यों से जोड़कर देखें।

केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. श्रीनिवास बरखेड़ी ने युवाओं को भारत की ज्ञान परंपरा और आत्मबोध से जोड़ने का आह्वान करते हुए कहा कि युवाओं को ‘इंडिया से भारत’ की ओर ले जाने वाली चेतना के साथ आत्मवान बनना चाहिए। युवा पीढ़ी के भीतर आत्मविश्वास, ज्ञान और भारतीय दृष्टि का विकास ही समाज और राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी।

युवा धर्म संसद में देशभर के 25 राज्यों से लगभग 1600 युवा प्रतिभागी तथा 300 से अधिक शिक्षाविद, शिक्षक, शोधकर्ता, विद्वान एवं धर्माचार्य शामिल होकर धर्म, संस्कृति, शिक्षा, तकनीक, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्र निर्माण से जुड़े विषयों पर संवाद कर रहे हैं।

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