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राष्ट्रधर्म के “जल है तो कल है” विशेषांक के विमोचन समारोह में सुनील आम्बेकर जी का उद्बोधन

राष्ट्रधर्म के निरन्तर प्रयास को मैं प्रणाम करता हूँ। लगभग स्वाधीनता के साथ ही, उसी वर्ष अगस्त माह में ही, 47 में यह कार्य प्रारम्भ हुआ और जैसा नाम है राष्ट्रधर्म, उसी की भाँति लगातार यह कार्य चलता गया और ऐसे वरिष्ठ जन, जिनका नाम हम आदर्श के रूप में लेते हैं — पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी, नाना जी और एक बहुत बड़ी श्रृंखला है, हम अभी देख रहे थे। तो यह विचार-मन्थन का एक गहरा प्रयास है और इतने वर्षों में, इतनी पीढ़ियों में, उसने एक प्रभाव उत्पन्न किया है। मैं राष्ट्रधर्म के आज जितने भी वर्तमान पदाधिकारी हैं — प्रवेश जी, अशोक जी, मनोज कान्त जी, पवन जी — बहुत सारे लोग यहाँ हैं, बहुत सारे लेखक जो लगातार लिखते हैं, सभी को बहुत बधाई देता हूँ और ढेर सारी शुभकामनाएँ देता हूँ कि उनका यह कार्य लगातार और अधिक गति से, अधिक व्यापक रूप से निरन्तर आगे चलता रहे और उनके हाथों से जो राष्ट्रधर्म है, वह लगातार चलता रहे। आज हमारे बीच में, राष्ट्रधर्म के ही कारण, जो जल का विशेष अंक वे आज लेकर आए हैं, उस निमित्त हमारे बीच में उपस्थित पद्मश्री से सम्मानित श्री उमाशंकर जी, श्रीमान पोपटराव जी और आप सभी को वन्दन, अभिवादन। दोनों, जो आज हमें अतिथि के रूप में प्राप्त हुए हैं, दोनों के कार्य अतिशय, अत्यन्त अभिनन्दनीय हैं। उमाशंकर जी ने जल के क्षेत्र में जो कार्य किया है — और जखनी, हम शायद नाम से भी जानते होंगे जखनी — उस क्षेत्र में, क्योंकि चित्रकूट के आस-पास जाने का मुझे भी बहुत वर्षों से अवसर मिला, इसलिए उन्होंने जो कार्य किया है, वह वास्तव में… ऐसा क्षेत्र, जहाँ बिल्कुल सूखा था — बुंदेलखंड प्रसिद्ध ही इसलिए था कि वहाँ सूखा था — आज उस क्षेत्र में बहुत सारे ऐसे गाँव हैं, ऐसा क्षेत्र है, जहाँ की परिस्थिति बदली है और इस कार्य की विशेषता है कि इसमें समस्त लोगों ने… मतलब यह केवल किसी सरकारी योजना का क्रियान्वयन नहीं है, उसके साथ वहाँ के जो सारे स्थानीय लोग हैं, उनकी सहभागिता है और उनकी सहभागिता से जो वातावरण बना, उसने एक लोकजागरण किया है।अभी हम लोग श्रीमान पोपटराव जी की कहानी सुन ही रहे थे। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि जिस तरीके से एक गाँव में अगर कोई एक व्यक्ति जीवन का एक ध्येय बनाकर चलता है, तो किस तरीके से… जहाँ ऐसा लगता है कि कभी कोई अच्छा काम करने जाओ, तो लोग बोलते हैं कि अरे, कोई साथ नहीं देता, अरे, कोई साथ नहीं आता — ऐसा सामान्यतः बहुत सारे लोग बोलते हैं। कई लोगों से पूछो कि अच्छा काम आप क्यों नहीं करते हो, तो उसका एक महत्व का कारण रहता है कि अरे, कोई साथ नहीं आता है। जबकि यह सच नहीं है। आप दोनों के कार्य में यह अनुभव आया कि प्रारम्भिक काल में उपेक्षा जरूर होती है, क्योंकि लोग भी बात समझते नहीं हैं। ऐसा नहीं है, बात समझते हैं, परन्तु दूसरे अनुभवों के आधार पर उन्हें आपके कार्यों पर विश्वास नहीं होता। आप जब सातत्य से कार्य करते हैं और आपकी विश्वसनीयता बनती है, तो फिर आपके कार्य में साथ देने के लिए सारे लोग आपके साथ चलना प्रारम्भ कर देते हैं।उमाशंकर जी के काम में भी यही अनुभव आया। पोपटराव जी के काम में तो धीरे-धीरे वह गाँव देखकर अब कई गाँवों में उत्साह आया है। बहुत सारे लोग हैं, जो उनका गाँव देखने जाते हैं और उससे अनुभव लेते हैं। अब वे चूँकि आदर्श ग्राम योजना के प्रमुख मुखिया बन गए हैं, तो बहुत सारे लोगों को उस योजना का लाभ अब मिल रहा है और मैं निश्चित रूप से यह चाहता हूँ कि आज उनके आने का परिणाम यह होना चाहिए कि यहाँ से यह संदेश और भी लोगों तक जाए और अगर हमारे नौजवान लोग अपनी-अपनी जगह पर ऐसी पहल करते हैं, तो वे अपने जीवन में ही वह परिवर्तन देख सकते हैं। कितने कम समय में यह परिवर्तन सम्भव है! और आज, जब पूरे शहरों का दौर चल रहा है और जहाँ लोग कहते थे कि अब गाँव उजड़ जाएँगे, वहाँ पर ऐसी कहानी है; या नदी-नाले सूखते चले जाएँगे, वहाँ पर भी ऐसी कहानियाँ हैं और ये किताबों की कहानियाँ नहीं हैं, ये जीवन की कहानियाँ हैं, वास्तविक कहानियाँ हैं। और ये कहानियाँ केवल एक कहानी नहीं हैं कि एक जगह हो गया, बाकी जगह सम्भव नहीं — ऐसा नहीं है; ये मॉडल्स हैं। मॉडल मैं इसलिए कह रहा हूँ कि अपनी-अपनी जगह पर इनका क्रियान्वयन किया जा सकता है, इनको लागू किया जा सकता है। और इस दृष्टि से जो यह कार्य है, उस कार्य को ही आधार बनाकर आज राष्ट्रधर्म ने जल के संदर्भ को लेकर जो विशेषांक बनाया, वह वास्तव में प्रासंगिक है, आज के लिए अत्यन्त आवश्यक है और मैं निश्चित रूप से यह बात कहूँगा कि इसका संदेश पूरे देश में जाने की आवश्यकता है और इस दृष्टि से हम सब मिलकर जरूर प्रयास करेंगे। और आज एक बात बदली है। वह बात यह है कि अब पूरे देश में इस बात के बारे में जागृति होने लगी है। जागृति का एक कारण जागरण के जो कार्य हुए, वे भी हैं, परन्तु दूसरा भी एक कारण है, क्योंकि अब पानी के अभाव की जो अनुभूति है, वह अब धीरे-धीरे सबको आ रही है। अभी कई जगह अनुभव में आ रहा है कि अब बड़े शहरों में भी पानी का अभाव समझ में आ रहा है। और पानी भी… वैसे तो भगवान ने पानी दिया, भगीरथ जैसे लोगों ने प्रयास किए, गंगा जी आईं और हम पानी से समृद्ध हुए और पानी को अपने पंच तत्वों में से एक महत्वपूर्ण तत्व के रूप में हम सब मान्यता देते हैं और उसको उतना ही महत्व भी देते हैं। हमारी संस्कृति में तो पानी, मतलब, भगवान का स्वरूप है। और पानी की जो नदियाँ हैं, वे हमारे लिए माँ के स्वरूप में हैं। गंगा माँ का स्नान है, तो नर्मदा माँ का दर्शन है। मतलब ये नदियाँ हमारे लिए भगवान के, माँ के रूप में हैं। अभी मैं कुछ दिन लंदन में था, तो लंदन में अपने यहाँ के भारतीय लोग आजकल बहुत रहते हैं, तो यहाँ से, काशी से लोग गए थे और लंदन की जो थेम्स नदी है, वहाँ पर थेम्स नदी पर गंगा आरती का आयोजन किया था, प्रतीक के रूप में। तो यह जो नदी को अब… और यह बात वहाँ बहुत प्रशंसनीय हुई, क्योंकि हम सभी लोग समझ रहे हैं कि आने वाले समय में अगर पानी की भगवान के स्वरूप में पूजा नहीं करेंगे, उसको उस स्वरूप में नहीं रखेंगे, तो यह संकट सब जगह आएगा।अब दो बातें समझने की हैं कि दुनिया में पर्यावरण की बात बहुत हो रही है। आजकल पर्यावरण, मतलब, हर समय में कोई न कोई ऐसा एक फैशनेबल शब्द होता है — मैं फैशनेबल ही कहता हूँ, क्योंकि किसी न किसी तरीके से घूम-फिर के सारे मंचों पर यह बात बोली जाती है। थोड़ी बढ़ा-चढ़ाकर भी बोली जाती है। और, क्या बोलते हैं, पॉलिटिकली करेक्ट दिखने के लिए भी कई लोग उसका उल्लेख करते रहते हैं। इसलिए मैं उसको फैशनेबल कहता हूँ। तो आजकल पर्यावरण की बात बहुत ज्यादा हो रही है। अब बात समझने की यह है कि क्या पानी की चिंता केवल इसलिए की जाए कि उसका अभाव हो रहा है, पर्यावरण की चिंता इसलिए की जाए कि उसके कारण मनुष्य को तकलीफ हो रही है? यह महत्व का प्रश्न है। और यह दृष्टिकोण का प्रश्न है। हम उसको किस तरीके से देखते हैं, यह महत्व का विषय है।देखिए, आज पूरी दुनिया में जो बात उठ रही है — दुनिया के बहुत सारे देशों में, पश्चिम में — यह बात इसलिए उठ रही है, क्योंकि उन्होंने तो यह चिंतन किया था कि भाई, हम तो दुनिया के राजा हैं, हम ही दुनिया के सब कुछ हैं और इस सृष्टि में जितनी भी बातें हैं, वे हमारे भोग-उपभोग के लिए हैं। और इसलिए हम अपने हिसाब से इनका उपयोग कर सकते हैं। आज उनकी तरफ से जो यह जोर से चिंता आ रही है, वह इसलिए नहीं आ रही कि उन्हें इसके प्रति कोई ऐसा भाव है, बल्कि इसके कारण मनुष्य को तकलीफ हो रही है, इसलिए यह चिंता उमड़ कर आई है। तो क्या हमारी चिंता भी उसी प्रकार की है? अगर हमारी चिंता भी उसी प्रकार की है, तो हम भी उसी सोच में चले गए हैं, अपनी संस्कृति से दूर। जबकि हमारी संस्कृति की सोच है कि हम इसके सर्वस्व नहीं हैं, यह हमारे अधीन नहीं है, हम सब मिलकर सृष्टि हैं। इस सृष्टि के हम एक अंग हैं।अभी पूजनीय सरसंघचालक जी अपनी यात्रा में थे, तो एक जगह उनसे पूछा गया कि हिंदुत्व को आप क्या कहेंगे? उन्होंने कहा, हिंदुत्व का मतलब अपनापन होता है। अपनापन — हिंदुत्व का मतलब यह अपनापन, क्योंकि हम सब एक-दूसरे से जुड़े हैं और इसलिए हम ऐसा जिएँ कि जिसके कारण बाकी लोग भी आराम से जी सकें। मनुष्य भी जी सकें, सृष्टि में दूसरे भी — पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, नदी-नाले — सब आराम से रह सकें। हम ऐसा जीवन जिएँ, यह हिंदू की समझ है, संस्कृति है, हिंदू का धर्म है। और हमारे पूर्वज इसी भाव से, एक आत्मीयता के भाव से, श्रद्धा के भाव से, अपनेपन के भाव से अपने व्यवहार को निश्चित करते चले गए, जिसको हम संस्कृति भी बोल सकते हैं। और जिसका मुख्य आधार यह था कि हम ऐसा जिएँ कि जिसके कारण बाकी लोग भी आराम से जी सकें। वह तो हमारी संस्कृति में आगे भी जाता है कि हम ऐसा बोलें कि जिसके कारण बाकी लोग भी शान्ति से, सुख से उसको सुन सकें। हम ऐसा लिखें भी। आजकल लोग बहुत सारी बातें लिखते हैं, बहुत सारी बातें बोलते हैं। ऐसी बोलते हैं कि जिनका कोई अर्थ नहीं होता है, जिनका कोई आधार नहीं होता और जिनमें लोक-कल्याण की कोई बात नहीं होती। महत्व की बात है, लोक-कल्याण की बात नहीं होती। और इसलिए यह हमारी संस्कृति का महत्वपूर्ण आधार है। और आज अगर हमारे देश में भी पर्यावरण की समस्या आ रही है, जल की समस्या आ रही है, गंगा को, नदी को माँ समझने वाले देश में भी अगर जलस्रोत गंदे हो रहे हैं, तो यह केवल जल के गंदे होने का लक्षण नहीं है। यह लक्षण हमारी उस संस्कृति में कोई न कोई भेद या कोई न कोई मिश्रण आने का लक्षण है। और इसीलिए यह केवल पानी की एक छोटी-सी प्रॉब्लम नहीं है, यह केवल भौतिक जगत की समस्या नहीं है। यह हम लोगों की सोच, धर्म के प्रति हमारी आस्था, श्रद्धा, हमारी समझ और उसके अनुसार हमारे व्यवहार की समस्या है। और इसलिए इस समस्या को केवल जल के रूप में देखेंगे, तो कई बार ऐसा होता है कि समस्या तो सही है, लेकिन उसके उपाय क्या होंगे? जैसे पिछली शताब्दियों में हुआ कि आर्थिक दृष्टि से असमानता आ गई और उसके कारण कुछ लोग शोषित हो रहे थे, गरीब हो रहे थे — समस्या तो सही थी। तो उसके समाधान के रूप में जिस तरीके से विचार निकले, कम्युनिज़्म जैसे विचार निकले और उन्होंने जिस तरीके के उसके सॉल्यूशन दिए… प्रॉब्लम तक ठीक था। बाबा साहब अंबेडकर ने अपने अंतिम भाषण में — जो उन्होंने 20 नवम्बर, 1956 को काठमांडू में दिया था, जिसमें वे जागृति बौद्ध परिषद में बोल रहे थे — बोला कि जहाँ तक समस्या का प्रश्न है, मार्क्स और बुद्ध उसे समान रूप से देखते हैं। परन्तु जहाँ समाधान का प्रश्न आता है, वहाँ वे दोनों एकदम भिन्न हो जाते हैं। और वे आगे कहते हैं कि जब तक भगवान बुद्ध का मार्ग उपलब्ध है, तब तक दुनिया के शोषित, पीड़ित, दलित लोगों को मार्क्स के मार्ग पर, कम्युनिज़्म के मार्ग पर जाने की कोई जरूरत नहीं है। तो महत्त्वपूर्ण है कि जब हम जल की समस्या की ओर देख रहे हैं, तो उसके समाधान क्या होंगे?समाधान में भी रास्ता हमारा होना चाहिए, सांस्कृतिक होना चाहिए, धार्मिक होना चाहिए। क्योंकि दुनिया में ऐसी बहुत समस्याएँ हैं, जिनके समाधान के रूप में… कभी-कभी बोलते हैं न कि बीमारी से दवा खतरनाक। तो दुनिया में कुछ समस्याओं के समाधान भी ऐसे हो रहे हैं। और इसलिए अगर कोई अधिकारों का असन्तुलन हो रहा है, तो अधिकार प्राप्त होने चाहिए, समान रूप से अधिकार मिलने चाहिए। परन्तु समान अधिकारों को लेने के लिए क्या आपसी संघर्ष ही रास्ता होगा? एक-दूसरे से लड़ना ही रास्ता होगा, या अपने कर्तव्य का ही ध्यान रखकर एक-दूसरे की चिन्ता करना भी उसका रास्ता हो सकता है? वह भारत का रास्ता है। और इसलिए सामाजिक समस्याओं के लिए भी वैसे प्रश्न उठाए गए, प्रश्नों के समाधान के रूप में वैसे सॉल्यूशंस उठाए गए। और इसलिए जल का प्रश्न केवल जल का नहीं है। दुनिया में यह बताया गया कि मजदूरों का प्रश्न मजदूरों का है, महिलाओं का प्रश्न महिलाओं का है, विद्यार्थियों का प्रश्न विद्यार्थियों का है। नहीं, यह सोच गलत है, बाइनरीज़ में सोचना गलत है। हमारी सोच यह है कि महिलाओं का प्रश्न केवल महिलाओं का नहीं, पूरे समाज का है। विद्यार्थियों का प्रश्न पूरे समाज का है, मजदूरों की आर्थिक समस्या केवल मजदूरों की कैसे होगी, पूरे समाज की है, पूरे राष्ट्र की है। और इसलिए जल की समस्या को केवल जल के एक्टिविस्ट लोगों की समस्या मानेंगे या उनका प्रश्न मानेंगे और उनके ही समाधान, उन्हीं का रास्ता होगा, तो गलत होगा। अगर यह जल का विषय आ रहा है और उसका संकट आ रहा है, तो यह हमारी पूर्ण सभ्यता, हमारी संस्कृति, हमारे भारत के मानवीय जीवन, उसके आदर्शों का प्रश्न है। और इसीलिए… हम लोग देखते कैसे हैं? पिछले दिनों कोई एक फिल्म बना रहे थे ‘वॉटर’ नाम से। बड़ा विरोध हुआ, वह आ नहीं पाई। लेकिन बाद में कुछ आई, फिर चली नहीं। ऐसा कुछ हुआ, लेकिन प्रश्न यह है कि आप अगर H2O देखते हैं, आप केमिकल फ़ॉर्मूला ही देखते हैं, तो वॉटर है। आप उसके साथ एक भाव से देखते हैं, तो जल है। वह जीवन है, वह संस्कृति है, वह हमारे जीवन की आत्मा है। तो यह देखने का दृष्टिकोण है और फिर उसके आधार पर हमारे समाधान होंगे। और इसलिए उस संस्कृति के जागरण के साथ अगर हम इस भाव को जगाते हैं, जल की चिंताओं को उनके सामने रखते हैं, पर्यावरण की चिंताओं को हम सामने रखते हैं, तो धीरे-धीरे पूरे समाज का भाव उस दृष्टि से बदलता है।आज पोपटराव जी के काम को गहराई से समझेंगे, तो उन्होंने केवल गाँव की समस्या — लोग मुंबई जा रहे हैं — इतना ही नहीं किया, उन्होंने गाँव की एक खुली संस्कृति को ही एक स्वरूप दिया कि हम एक-दूसरे के साथ मिलकर जिएँगे, तो कैसे जी सकते हैं। उमाशंकर जी के काम में विस्तार से जाएँगे, तो उन्होंने एक ऐसी संस्कृति का निर्माण किया, जिसमें सारे लोग मिलकर अपने जलस्रोतों की ओर ध्यान दे रहे हैं और उनको अपने जीवन का एक प्रमुख हिस्सा मान रहे हैं। और इसलिए उस संस्कृति का जागरण और उस संस्कृति की समझ बहुत ज्यादा जरूरी है। अन्यथा दुनिया में तो लोग यह प्रेडिक्ट कर रहे हैं कि वॉटर के लिए वॉर्स होंगे, मतलब किसी ने तो इतना तक बोल दिया कि जो वर्ल्ड वॉर होगा, वह पानी पर होगा। अगर हम पानी के रूप में ही सोचेंगे, तो जरूर होंगे। अगर पानी की पॉलिटिक्स होगी, तो जरूर होगा; कार्बन क्रेडिट की पॉलिटिक्स होगी, तो जरूर होगा; पूरी नेशनल-इंटरनेशनल पॉलिटिक्स होगी, लेकिन समाधान नहीं होगा। और इसलिए अगर समाधान करना है, तो हमें उस दृष्टि से, एक समग्र दृष्टि से सोचना होगा और उस समग्र दृष्टि का उदाहरण भारत को देना पड़ेगा, वह उदाहरण देने की स्थिति में हमें आना पड़ेगा, केवल थ्योरी से नहीं होगा। आज हमारे देश में भी पानी किसका है, इस पर राज्यों के विवाद होते हैं, लगातार होते हैं। पानी किस राज्य का? भाई, पानी तो सबका है, इस देश में सबका है। पानी भी सबका है। गुजरात में ध्रुव भट्ट करके एक बड़े साहित्यकार हैं, उनका बहुत प्रसिद्ध साहित्य है, उनकी किताबें बहुत अच्छी होती हैं। ‘समुद्रान्तिके’ किताब है और भी उनकी किताबें हैं, कभी आप लोगों को मौका मिले तो पढ़िए। छोटी होती हैं, लेकिन बहुत मार्मिक कथन और वर्णन होता है। तो उसमें एक बड़ा सरकारी अधिकारी है और वे लोग समुद्र के आस-पास के क्षेत्र में वॉटर सर्वे के लिए जाते हैं, पूरे लैंड सर्वे और वॉटर सर्वे के लिए जाते हैं। वे जाते हैं, बहुत गर्मी है, धूप है, कष्ट में आते हैं और देख रहे हैं कि वहाँ तो ग्रामीण लोग रह रहे हैं। उनको लगता है कि ग्रामीण लोग हैं, अनपढ़ हैं, थोड़ी सामान्य परिस्थिति में हैं। वे तो बहुत बड़ी यूनिवर्सिटी से पढ़े हुए हैं। धीरे-धीरे वे गाँव की तरफ जाते हैं, तो एक पहला घर आता है, घर में कुआँ है और पानी के लिए बाल्टी लटकी हुई है और एक छोटी-सी बालिका वहाँ पर खेल रही है। तो वे उससे पूछते हैं, क्या मैं आपका पानी ले सकता हूँ? बालिका बोलती है, पानी हमारा थोड़ी होता है, पानी भगवान का होता है, सबका होता है — ऐसा बोलकर वह निकल जाती है, कुछ नहीं बोलती, खेलते-खेलते निकल जाती है। ध्रुव भट्ट उसके बारे में अपना पूरा अनुभव लिखते हैं कि यह मेरे लिए कल्चरल शॉक था। जहाँ हमारे यहाँ पानी के नल के लिए लड़ाई होती रहती है कि सार्वजनिक नल पर पानी कहाँ से आएगा, कैसा आएगा, और जब यह बात सुनते हैं, तो उन्हें कल्चरल शॉक होता है कि मैंने क्या समझ लिया था। यह जो बात है, वह मूल में अपने यहाँ थी, जितने भी पानी के संग्रह होते थे। और पानी का संग्रह लोग इस तरीके से करते थे, जिसके कारण पूरे समुदाय के लिए उपयोग होता था। हमारे समाज में भी जब यह बात आई कि पानी हमारा है, एक जात का पानी दूसरी जात वाला नहीं ले सकता, यह ऊँची जात का है, नीची जात वाला हाथ नहीं लगा सकता, उस कुएँ में वह आ सकता है? उस जलस्रोत में वह आ सकता है? वह स्पर्श नहीं कर सकता — जबकि जलस्रोत में तो सारे लोग एक साथ हैं — तो यह बात वहाँ से शुरू होती है कि हम कहाँ से कहाँ जाते हैं और फिर हमारी कहानी यहाँ तक पहुँचती है। तो जब हम जल के बारे में विचार कर रहे हैं, तो हमें बहुत सारी बातों के बारे में विचार करना होगा। अब जब सारे गाँव के लोग एक साथ मिलकर किसी जलस्रोत को, किसी कुएँ को अच्छा करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से वे केवल जल को ठीक नहीं करते, वे अपनी संस्कृति को भी ठीक कर लेते हैं। सब मिलकर अपने जल को सँवारते हैं, सँभालते हैं, उसका उपयोग भी करते हैं, उसको भगवान की तरह, मंदिर की तरह साफ-सुथरा भी रखते हैं। और इसी संस्कृति के पुनर्जागरण की देश को जरूरत है, उसी के पुनर्स्मरण की आवश्यकता है। और जितना स्मरण इस बात का होगा, तो फिर जल की शुद्धता होगी, वायु की शुद्धता होगी, अन्न की शुद्धता होगी और सब कुछ — मन की भी शुद्धता, बुद्धि की भी शुद्धता। आजकल हम लोग जिस जमाने में चल रहे हैं, हमारे हाथ में मोबाइल है, बहुत सारा पॉल्यूशन होता है, बहुत सारे विचार आते हैं, बहुत सारी बातें आती हैं, तो यह प्रदूषण की समस्या व्यापक है। और एक जगह से शुरू करेंगे, कोई जल से शुरू करेंगे, तो ध्यान में आएगा कि बाकी बहुत सारे प्रदूषण भी दूर हो गए। कहीं से भी आप शुरू कर सकते हैं; आप अन्न से शुरू करेंगे, तो जल भी ठीक हो जाएगा, हवा भी ठीक हो जाएगी। अगर कहीं से भी शुरू करो, तो हो जाएगा। और इसलिए आज जिस मोड़ पर हम एक राष्ट्र के नाते खड़े हैं — एक तरफ हमने पुनः एक बार अपनी संस्कृति का, अपने धर्म का, अपने योग जैसी एक महत्वपूर्ण क्रिया का स्मरण कर लिया है, जिसके कारण पूरी दुनिया को भी इसका परिचय हो रहा है। हमारा जो सबसे बड़ा जल का उत्सव होता है, कुम्भ, उसने पूरी दुनिया को हमारी जल की संस्कृति से परिचित भी कराया है। और वह पूरी दुनिया के लिए आकर्षण का एक उत्सव बन गया है। हमारे लिए तो है ही, दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है। अब उसके पीछे जो भाव है, उस भाव को भी साक्षात रूप में लाना अत्यंत आवश्यक है। और आर्थिक दृष्टि से भी हम लोग अब आगे बढ़ रहे हैं। हर मापदंड पर, जीवन के हर क्षेत्र में हम आगे बढ़ रहे हैं। और यह हम सबके लिए सुखद भी है और स्वाभिमान का भी विषय है, गर्व का विषय है, जिसके कारण पूरे विश्व में जहाँ भारत एक उपेक्षा का पात्र था, अब एक सम्मान का पात्र बन रहा है। ऐसे समय में हम लोगों के लिए बहुत आवश्यक है कि हमारा प्रगति का रास्ता कैसा रहेगा, विकास की हमारी धारणा कैसी रहेगी।हम जो अपने शहर बना रहे हैं, वे शहर हमारे कैसे बनेंगे? अगर हम पानी को बचाना चाहते हैं, तो हमें कैसे जीना है, इसके बारे में भी सोचना पड़ेगा। मैं कई बार आजकल बड़े टाउन प्लानर्स से मिल रहा था, उनके पूरे बड़े समूह से। मैंने उनसे पूछा था कि आप लोग जब प्लानिंग करते हैं, तो हमारे पास पानी कितना है, हमारी हवा कैसी है, हमें पानी कितना लगेगा, इसकी भी प्लानिंग आपकी टाउन प्लानिंग में रहती है? वहाँ बारिश कितनी आएगी, आस-पास में कितने लोग रह सकते हैं? तो वास्तव में हमारे मुंबई में हैबिटेट नाम का एक स्कूल है, स्कूल ऑफ़ हैबिटेट, वे लोग इस पर एक समग्र चिंतन करते हैं। उनसे मेरी जितनी भी चर्चा हुई, तो पुराने समय से कोई भी जगह ऐसी होती थी कि जहाँ रहना, वहाँ भोजन भी हो सकता है, खेती हो सकती है, पानी शुद्ध मिल सकता है, रह सकते हैं, सुरक्षित जगह है, बाढ़ से भी बचाव हो सकता है। परन्तु आज हम इतने मॉडर्न होने के बाद भी हमारी प्लानिंग्स में ये बातें नहीं हैं, क्योंकि एक लालच के कारण — मतलब एक लालच हमारी रहने की, एक लालच बनाने वालों की और एक लालच बनने की परमिशन देने वालों की — इसके कारण हमारी टाउन प्लानिंग ऐसी लगती है कि जैसे हमारे पुराने लोग ऐसे ही रहते थे, जबकि हम लोग तो मोहनजोदड़ो संस्कृति वाले लोग हैं, जहाँ किस तरीके से टाउन प्लानिंग होती थी! परन्तु आज अगर हम लोग अपनी टाउन प्लानिंग को देखेंगे, तो बड़ी ही अस्त-व्यस्तता है। अब लखनऊ थोड़ा ठीक हो रहा है, परन्तु पूरे देश में मुंबई, दिल्ली से लेकर सब जगह इस बात का अभाव है और इस बात का परिणाम हमारे पानी पर हो रहा है। मैं मुंबई में देखता हूँ, मुंबई का पानी हमारे वाडा से आता है, ठाणे जिले से आता है। ठाणे जिले में हमारे वनवासी जनजाति लोग रहते हैं। वहाँ बड़े-बड़े टैंक, तालाब बने हुए हैं, वहाँ से बड़े पाइपों में पानी मुंबई आता है। उस पानी को वहाँ के लोग स्पर्श भी नहीं कर सकते। अब यह प्रश्न बड़ा प्रश्न है, ऐसे कैसे होगा? अगर इन प्रश्नों का समाधान नहीं किया गया, शहरों में बैठकर लोग समाधान नहीं करेंगे, तो समस्याएँ आएँगी। हमें लगेगा कि कोई शक्तियाँ आ रही हैं, वे यह कर रही हैं — होंगी, लेकिन उनको मौका हम देंगे। और इसलिए हमारी समस्याओं का समाधान हमें सही तरीके से निकालना पड़ेगा, उसके लिए पहल करनी पड़ेगी। उस दृष्टि से विचार करने का यह समय है और हम केवल आर्थिक प्रगति नहीं करना चाहते, क्योंकि दुनिया के बहुत सारे देश हैं, जिन्होंने अपनी प्रगति की एट द कॉस्ट ऑफ़ पॉल्यूशन, एट द कॉस्ट ऑफ़ उनका परिवार, उनकी संस्कृति, जीवन-मूल्य — उसकी कीमत देकर उन्होंने अपनी आर्थिक प्रगति की है। इस कारण से इतनी सारी समस्याएँ आ रही हैं। अब जब हम आर्थिक प्रगति की ओर बढ़ रहे हैं, तो अपनी संस्कृति के साथ — जिसमें पर्यावरण भी आता है, जिसमें जल का संरक्षण भी आता है — उसके साथ हमें अपने रास्ते बनाने होंगे। एक दिन में यू-टर्न नहीं होगा, हम बहुत आगे निकल चुके हैं, परन्तु अगर हम शोध शुरू करेंगे, तो निश्चित रूप से हम आने वाले समय में एक अच्छा मॉडल हमारे लिए भी, आने वाली पीढ़ियों के लिए और पूरी दुनिया के लिए दे सकते हैं। इस दृष्टि से आज विचार महत्वपूर्ण है। विचार के इस मोड़ पर राष्ट्रधर्म यह अंक लाया है, इसलिए यह वास्तव में बहुत अभिनंदनीय है। मैं उनको बधाई देता हूँ और आप सब लोगों से यही आह्वान करता हूँ कि इस पर निश्चित रूप से जरूर चिंतन-मंथन करें।धन्यवाद।

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