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संस्कृति और सभ्यता

संस्कृति और सभ्यता

‘संस्कृति’ और ‘सभ्यता’ इन दो शब्दों के मूलार्थ ही उनके सही अर्थ को विशद करते हैं। ‘संस्कृति’ शब्द ‘सम्कृ’ यानी ‘सम’ उपसर्गयुक्त ‘कृ’ धातु से बना है। इस धातु का अर्थ जब, अच्छा करना, योग्य करना, भूषित करना होता है, तब व्याकरण के नियम के अनुसार संस्कृति में ‘स्’ यह वर्ण डालना पड़ता है। तभी उस धातु से संस्कृति, संस्कार आदि शब्द बनते हैं। यह भाग्य “परि” उपसर्गयुक्त ‘कृ’ धातु को भी प्राप्त है और इसलिए परिष्कार, परिष्करण, परिष्कृति ऐसे शब्द बनते हैं। अगर ‘सु’ वर्ग का अंतर्भाव न किया जाय तो शब्द बनेंगे ‘संकर’, ‘परिकर’ तो संस्कृति का अर्थ होगा अच्छा बनना, अच्छा बर्ताव करना। जैसा है वैसा रहना यह प्रकृति है। प्रकृति से भी ऊपर उठना संस्कृति है, प्रकृति से नीचे गिरना यह विकृति है।

संस्कृति और प्रकृति

एक छोटा-सा उदाहरण भूख लगने पर खाना, यह प्रकृति है पर स्वयं भूखे रहकर अन्य भूखे को खिलाना यह संस्कृति है और दूसरे की वस्तु को छीनकर खाना यह विकृति है। पशु प्रकृति से चलते हैं उन्हें न संस्कृति आती है, न विकृति। अच्छी हरी घास पड़ी हो और उसको खाने के लिए दो बैल एकदम वहां आ जाये तो उनमें से तगड़ा बैल यह नहीं कहेगा कि भाई तुम भूखे दिखते हो, तुम पहले खाओ, मैं बाद में खाऊंगा। पेट में भूख है, तगड़ा बैल उस पर टूट पड़ेगा-यह प्रकृति है किन्तु पशुओं को विकृति नहीं आती। पेट भरने के बाद बची घास को तगड़ा बैल गठड़ी बांध कर घर नहीं ले जायेगा। आदमी का भरोसा नहीं है। मनुष्य में जैसे विकृति आ सकती है। वैसे ही संस्कृति भी आ सकती है।

सभ्यता बहिरंग

‘सभ्यता’ क्या है? उसमें मूल शब्द ‘सभा’ है। सभा के लिए जो उचित, जो अनिंदनीय है वह सभ्यता है। ‘सभा’ समूहवाची शब्द है। दो-तीन लोगों की सभा नहीं होती, उसमें अनेक लोग होते हैं। उनकी उपस्थिति में हमारे कपड़े कैसे हों, भाषा कैसी हो, परस्पर का व्यवहार कैसा हों, यह ठीक से बताने वाले गुण का नाम ‘सभ्यता’ है। स्पष्ट है कि ‘सभ्यता’ का सम्बन्ध बहिरंग से है, जब कि संस्कृति का सम्बन्ध अंतरंग से है।

सांस्कृतिक आदर्श

‘संस्कृति’, अच्छे-बुरे, श्रेष्ठ-अभेष्ठ, वंदनीय निंदनीय निश्चित करने के मापदण्ड बताती है। इन मापदण्डों का नाम ही जीवनमूल्य है। मूल्य तब निर्माण होता है, जब उसको प्रस्थापित करने के लिए व्यक्ति या समाज उसकी कीमत चुकाता है। कीमत (Price) और मूल्य (value) में अंतर है। अपनी संस्कृति के आदर्श याने वे व्यक्ति होते हैं, जिन्होंने मूल्य को प्रस्थापित करने के लिए भारी कीमत
चुकाई होती है।

श्रीरामचंद्र का युवराजपद पर अभिषेक करने का निर्णय होता है किन्तु ऐन समय सौतेली माता कहती है कि तुम नहीं, मेरा पुत्र भरत राजा बनेगा और तुम्हें 14 वर्षों तक जंगल में रहना पड़ेगा। श्रीराम उनकी बात मान कर वनवास में चले जाते हैं। स्वयं पिता कहते हैं कि मुझे कारावास में डालो और तुम राजा बनो, किन्तु श्रीराम नहीं मानते। आज के जैसा जनमतसंग्रह अयोध्या में उस समय किया जाता, तो केवल दो मत छोड़कर अयोध्या की सारी जनता श्रीराम के पक्ष में खड़ी होती। श्रीराम ने अपने सुखों की कीमत अदा कर वचनपालन का मूल्य प्रस्थापित किया। कवि वाल्मीकि लिखते हैं- ‘रामो द्विर्नाभिभाषते’। इस तरह श्रीराम हमारे संस्कृति के आदर्श बनते हैं।

भरत भी आदर्श

और भरत! वे भी हमारी संस्कृति का आदर्श हैं। उन्हें अनायास राज्य मिला, किन्तु वे सिंहासन पर नहीं बैठे श्रीराम को मनाने के लिए चित्रकूट गये। वहां दोनों के बीच यह चर्चा नही होती कि मैं राजा बनूंगा। भरत अपने बड़े भाई की बात मान लेते हैं, किन्तु शर्त रखते हैं कि तुम्हारी चरण पादुकाएं सिंहासन पर आरूढ़ रहेंगी और श्रीराम से वे कहते हैं-‘मैं चौदह वर्षों तक जटाचीरधारी (जटा और वल्कल धारण करने वाला) बनूंगा और 14 वर्षों के बाद अगर आप अयोध्या नहीं आयेंगे, तो मैं अपनी देह अग्निसात् कर दूँगा’। वाल्मीकि के शब्द हैं-
हैं।

चतुर्दशे हि सम्पूर्णे वर्षे ऽहनि रघूत्तम ।
न द्रक्ष्यामि यदि त्वां तु प्रवेक्ष्यामि हुताशनम् ।।

इस तरह भरत भी हमारी संस्कृति के आदर्श बनते हैं।

विश्व के दुःख निवारण के लिए

एक राजपुत्र, जिस के चरणों में सारे सुख और आनंद सेवारत हैं, एक दिन रथ में बैठकर घूमने निकलता है। वह एक बूढ़े को देखता है, एक शवयात्रा देखता है। उसका चित्त इस संसार के दुःख से अभिभूत हो जाता है। वह स्वयं बूढ़ा नहीं था, तरुण था, सुंदर था, उसकी सुंदर पत्नी थी, एक प्रिय पुत्र था, किन्तु वह सब छोड़कर राजमहल से निकलकर दूर चला जाता है क्यों? इसलिए कि सारे जगत् के जो दुःख हैं, उनको मिटाने का उपाय वह ढूंढ़ना चाहता था इस हेतु वह सारे आकर्षण छोड़ देता है। वही भगवान बुद्ध हमारी संस्कृति का आदर्श हैं।

स्वामिनिष्ठा

पन्ना धाय को राजपुत्र की रक्षा का दायित्व मिला था। हत्यारा नंगी तलवार लेकर आता है और पूछता है कि राजपुत्र कहां है? पन्ना धाय, अपने पुत्र के बिछौने की और अंगुलि निर्देश करती है और अपनी आँखों के सामने अपने पुत्र की हत्या होती देखती है। पन्ना धाय स्वामिभक्ति का मूल्य प्रस्थापित करती है।

परदारेषु मातृवत्

एक तरुण योद्धा राजा के सामने पराभूत शत्रु सरदार की लावण्यशाली तरुणी पेश करता है। इस आशा से कि राजा खुश होगा, किन्तु राजा उस लावण्यवती तरुणी को सुरक्षा व सम्मान देकर उस के घर पहुँचाने की व्यवस्था करता है। छत्रपति शिवाजी ‘मातृवत् परदारेषु’ का जीवनमूल्य प्रस्थापित करते हैं।

धर्मनिष्ठा

सात और नौ वर्षों की क्या आयु होती हैं? वे बच्चे ही तो थे किन्तु इस छोटी उमर में भी गुरु गोविंदसिंहजी के दो पुत्रों ने दीवार की चिनाई में मरना पसंद किया, किन्तु धर्म का त्याग नहीं किया। अपना जीवन और मरण धर्म की रक्षार्थ हैं, यह मूल्य फतेहसिंह और जोरावरसिंह ने अपने प्राणों की बलि देकर प्रस्थापित किया।

अनेक उदाहरण

ऐसे कितने ही उदाहरण हैं। स्वप्न में दिया हुआ वचन पूर्ण करने वाला राजा हरिश्चंद्र, देवों की विजय हेतु अपनी अस्थियां प्रदान करने वाला दधीचि, एक वर्ष के अंदर जिसकी मृत्यु होने वाली है जानते हुये भी उसी के साथ विवाह करने वाली और साक्षात् यमराज से विवाद कर पति के प्राण वापस लाने वाली सावित्री, आत्मज्ञान के लिए सारी संपदा का मोह छोड़ने वाली मैत्रेयी स्वतंत्रता के लिए जंगल में निर्वासित जीवन जीने वाले महाराणा प्रताप, हाथी के पैरों तले अन्यायपूर्वक पिता की हत्या कराने वाले राजा की भाई की मुक्तता के लिए, अपनी सारी संपत्ति देने वाला खंडो बल्लाल, देश के स्वातंत्रय के लिए फांसी के फंदे को पुष्पाहार समझकर ‘वन्दे मातरम्’ की घोषणा करने वाले क्रांतिकारी ये सब हमारे आदर्श हैं। सत्य, शील, धर्मनिष्ठा, स्वामिनिष्ठा, त्याग, बलिदान, विजय आदि जीवनमूल्य प्रतिष्ठित करने के लिए जिन्होंने अपने जीवन की कीमत चुकाई वे सारे हमारे संस्कृतिक आदर्श हैं और ये मूल्य ही हमारी संस्कृति है।

संस्कृति का मूलाधार

इस संस्कृति के मूल में हमारी ‘धर्म’ की अवधारणा है। जो लोग ‘धर्म’ का अनुवाद ‘रिलिजन’ कर ‘धर्म’ और ‘रिलिजन’ को समकक्ष मानते हैं, वे ‘धर्म’ का अपमान करते हैं। ‘रिलिजन’ धर्म का केवल एक हिस्सा मात्र है। ‘धर्म’ वह है, जो प्राणिमात्र की धारणा करता है। महाभारत कहता है कि ‘धारणाद् धर्म इत्याहुः’। ‘धर्म’ शब्द संस्कृत की ‘धृ’ धातु से बना है ‘धृ’ का अर्थ है, धारण करना, जोड़ना, अर्थात् जो जोड़ता है वह ‘धर्म’ है। ‘धर्म’ जोड़ने का यानी व्यापकता से जोड़ने का काम करता है। हम अपने लिए कितना भी बडा मकान बनायें, वह ‘धर्म’ नहीं होता, जब औरों के निवास की व्यवस्था की जाती है, तब ‘धर्मशाला’ खड़ी होती है। धर्मशाला यह रिलीजस स्कूल नहीं है। हम अपने लिए कितनी भी दवाइयों का संग्रह करें, वह ‘धर्म’ नहीं। जब औरों के स्वास्थ्य की चिन्ता और उसके अनुरूप व्यवस्था की जाय, तब ‘धर्मार्थ’ अस्पताल तैयार होता है। धर्मार्थ अस्पताल ‘हास्पिटल फार रिलिजन’ नहीं है और ‘धर्मकांटे’ पर रिलिजन की तोल नहीं होती। धर्म एक व्यापक अवधारणा है। वह व्यष्टि (व्यक्ति), समष्टि (मानव समाज), सृष्टि (मानवेतर चराचर जगत) और अन्त में परमेष्ठी (परमात्मा) इन चारों को जोड़कर रखता है, इसलिए उसका नाम ‘धर्म’ है। इस धर्म की नींव पर हमारी संस्कृति की भव्य इमारत खड़ी है इसलिए वह बताती है कि पहले दो, बाद में स्वयं खाओ (तेन त्यक्तेन भुंजीथा)। जिस समाज से आपको धन मिला है, उस समाज को उसका कुछ हिस्सा दो बाद में उपभोग करो। इस लिए दान ‘धर्म’ हो गया उपनिषद् कहता है- ‘श्रद्धया देयम्, अश्रद्धया अदेयम्, श्रिया देयम्, हिया देयम्’ (यानी श्रद्धा से देना चाहिए, अश्रद्धा से नहीं देना चाहिए, अपनी संपत्ति के अनुरूप देना चाहिए और उसका अहंकार नहीं होना चाहिए। हमने कम ही दिया ऐसा मानकर लज्जा का अनुभव करना चाहिए।

सृष्टि के साथ

मानव समाज के साथ चराचर सृष्टि को भी अपने जीवन में स्थान देनेवाला यह अपना धर्म है। इसी के कारण, शिला पत्थरों वाली भूमि, भूमाता, मातृभूमि बनती है। नदी लोकमाता होती है गंगा ‘मैया’ होती है, गौ गोमाता कहलाती है। चराचर सृष्टि का ध्यान हमेशा मन में बना रहे, इस हेतु बैल और सांप को भगवान् शंकरजी के साथ, गरुड़ को विष्णु के साथ, गौ को श्रीकृष्ण के साथ, हंस को मां सरस्वती के साथ, गणपति के साथ जोड़ दिया गया है। छोटे से चूहे को भी वैसे ही पेड़ भी। तुलसी को भगवान् श्री विष्णु से, बिल्वदल श्रीशंकरजी से, औदुंबर श्रीदत्तात्रेय से, दूर्वा श्री गजानन से जुड़ी हैं इस लिए हमारी संस्कृति में, निसर्गपर विजय (Conquest of Nature) का व्यवहार नहीं है। निसर्ग की पूजा करते हैं, उसका शोषण नहीं पोषण करते हैं। अपने प्राचीन महापुरुषों को पर्यावरण (Environment) शब्द भले ही मालूम नहीं होगा, फिर भी उन्होंने उसकी उचित रक्षा की व्यवस्था की है।
और अन्त में, जो चैतन्य चराचर सृष्टि में ओतप्रोत है, चेतन के साथ सब को जोड़ता है। यह केवल ‘रिलिजन’ का विषय है। यह धर्म का पारमार्थिक अंग है किन्तु धर्म जैसा पारमार्थिक है, वैसा वह ऐहिक भी है। वैशेषिकों की ‘धर्म’ की परिभाषा हमें निरंतर ध्यान में रखाना चाहिए- ‘यतोभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः’ अर्थात् जिस से ऐहिक उन्नति और पारमार्थिक कल्याण साध्य होता है वह धर्म है। इस सृष्टि में ओतप्रोत चैतन्य का ही नाम परमात्मा है और अपनी संस्कृति की मान्यता है कि उसके अनेक नाम हो सकते हैं उसको प्राप्त करने के भिन्न-भिन्न मार्ग भी हो सकते हैं। इन सब मार्गों को अर्थात संप्रदायों, पंथों, उपासना पद्धतियों आदि सभी विविधताओं की हमारे धर्म में मान्यता है।

संस्कृति के लिए सभ्यता

संपूर्ण चराचर सृष्टि को अपने में समा लेनेवाले अपने ‘धर्म’ के आधार पर अपने संस्कृति का यानी जीवनमूल्यों का महान प्रासाद खड़ा है। इसका सम्बन्ध अंतरंग से है। अंतरंग शुद्ध, सुंदर और स्वच्छ होना चाहिए, वैसे ही बहिरंग भी सुंदर होना चाहिए यानी ‘सभ्यता’ संस्कृति का वैभव और उसकी सुंदरता बढ़ाने वाली चाहिए। यदि कपड़ा स्वच्छ हो उस पर लोहा कपड़े की चमक और बढ़ेगी। यदि कपडा गन्दा हो, मैला हो और उस पर लोहा किया गया, तो वह कपड़ा कैसा दिखेगा, आप ही सोचिये? सभ्यता के लिए अंग्रेजी में शब्द है Civilization. जो uncivil यानी जंगली है, नागरिकता से दूर है, उसको नागर जैसे बनाना, अच्छे मकान, अच्छी सड़कें, अच्छे कपड़े, बोलचाल की अच्छी भाषा, घरों में अच्छे उपकरण, अच्छी सजावट-ये सारे सभ्यता के आविष्कार हैं, किन्तु ये आविष्कार भी अपने जीवनमूल्यों के अनुरूप होने चाहिए। युग के साथ हम अवश्य बदलेंगे, किन्तु नित्य यानी जो शाश्वत और सनातन है, उसका अवश्य ध्यान रखेंगे। इस लिए हमारी भाषाओं में ‘शाश्वत धर्म’ और ‘युगधर्म’ ये दो संज्ञाएँ प्रचलित हैं। उदाहरणार्थ, मनुष्य द्वारा कपड़े पहनना यह शाश्वत धर्म है। उन कपड़ों के आकार, प्रकार यह युगधर्म है। अंतरंग सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा करते हुये हमने युगानुकूल परिवर्तन किया है।

सभ्यता के आविष्कार परिवर्तनीय होते हैं पर सांस्कृतिक मूल्य चिरस्थायी होते हैं। ‘धर्म’ की मजबूत नींव पर अपनी संस्कृति का भव्य महल खड़ा है, उस महल के रंग और बहिरंग सजावट यह सभ्यता है। धर्म, संस्कृति और सभ्यता के इस परस्पर सम्बन्ध को हम ध्यान में रखकर चलेंगे तो, हम ‘राष्ट्र’ शब्द को भी ठीक से समझ सकेंगे, क्योंकि राष्ट्र यानी लोग होते हैं-People are the Nation और संस्कृति यही राष्ट्रत्व की आधारभूमि होती है।

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