स्वावलंबी समाज, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक समरसता का सशक्त माध्यम
भारतीय समाज की मूल प्रकृति सहयोग, सहभागिता और परस्पर उत्तरदायित्व पर आधारित रही है। परिवार से लेकर ग्राम व्यवस्था तक, सामूहिक जीवन की हमारी परंपरा में सहकार का भाव सदैव विद्यमान रहा है। भारतीय जीवन पद्धति में व्यक्ति को समाज से अलग करके नहीं देखा गया, बल्कि उसकी उन्नति को समाज की उन्नति से जोड़कर समझा गया है। इसी जीवनदृष्टि का एक संगठित और व्यावहारिक स्वरूप सहकारिता है। सहकारिता केवल आर्थिक गतिविधियों को संचालित करने की व्यवस्था नहीं, बल्कि समाज में आत्मीयता, विश्वास, स्वावलंबन और सामूहिक विकास की भावना को साकार करने का माध्यम है।
इसी भारतीय दृष्टि को आधार बनाकर सहकार भारती ने सहकारिता के क्षेत्र में एक वैचारिक एवं संगठनात्मक आंदोलन खड़ा किया। इसका उद्देश्य सहकारिता को उसके मूल आदर्शों से जोड़ना, उसे समाज के व्यापक हितों का माध्यम बनाना और आर्थिक विकास को राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया से संबद्ध करना है।
स्थापना की पृष्ठभूमि : सहकारिता को संस्कारों से जोड़ने का संकल्प
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से प्रेरित होकर सहकारिता के क्षेत्र में संगठित कार्य का शुभारंभ 11 जनवरी 1979 को हुआ। संघ के वरिष्ठ प्रचारक लक्ष्मणराव इनामदार को इस क्षेत्र में एक नए संगठन के निर्माण की जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने सहकारिता को केवल आर्थिक गतिविधियों तक सीमित न रखकर उसमें भारतीय जीवन मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व का समावेश करने की आवश्यकता अनुभव की।
उनका मानना था कि सहकारिता का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब उसमें आर्थिक गतिविधियों के साथ संस्कार, नैतिकता और समाज के प्रति प्रतिबद्धता भी हो। इसी विचार से सहकार भारती का जन्म हुआ।
‘बिना संस्कार नहीं सहकार, बिना सहकार नहीं उद्धार’ का उद्घोष इस संगठन की मूल प्रेरणा बना। इस सूत्र में सहकारिता के संपूर्ण दर्शन का सार निहित है। सहकारिता की सफलता केवल संस्थाओं, नियमों और आर्थिक संसाधनों से सुनिश्चित नहीं होती; उसके लिए ईमानदार नेतृत्व, पारदर्शिता, परस्पर विश्वास और सेवाभाव से युक्त कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है।
सहकारिता : भारतीय समाज की स्वाभाविक व्यवस्था
भारत में सहकारिता का इतिहास सामाजिक जीवन की सामूहिक परंपराओं से जुड़ा है। कृषि, दुग्ध उत्पादन, बैंकिंग, आवास, उपभोक्ता सेवाओं और श्रमिक संगठनों जैसे अनेक क्षेत्रों में सहकारी संस्थाओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्वतंत्रता के बाद सहकारिता को देश के आर्थिक विकास का प्रभावी माध्यम माना गया और विभिन्न क्षेत्रों में सहकारी संस्थाओं का विस्तार हुआ।
हालाँकि, समय के साथ राजनीतिक हस्तक्षेप, व्यक्तिवादी प्रवृत्ति, भ्रष्टाचार, सत्ता-केंद्रित कार्यशैली और नैतिक मूल्यों के क्षरण जैसी चुनौतियों के कारण अनेक स्थानों पर सहकारिता अपने मूल उद्देश्य से भटकने लगी। ऐसे समय में यह अनुभव किया गया कि सहकारिता की समस्या केवल आर्थिक या प्रशासनिक नहीं है, बल्कि उसके संचालन और संस्कारों से भी जुड़ी हुई है।
सहकार भारती ने इसी चुनौती को समझते हुए सहकारिता को समाज-निर्माण और चरित्र-निर्माण से जोड़ने का प्रयास किया। इसका दृष्टिकोण स्पष्ट है कि सहकारी संस्थाएँ केवल आर्थिक लाभ अर्जित करने वाली इकाइयाँ न बनें, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायी और जनकल्याण के लिए प्रतिबद्ध संस्थाओं के रूप में विकसित हों।
संगठनात्मक विस्तार और कार्यपद्धति
सहकार भारती आज देश के 29 प्रांतों और 650 से अधिक जिलों में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज करा चुकी है। राष्ट्रीय एवं प्रांतीय अधिवेशन, प्रकोष्ठ आधारित सम्मेलन, प्रशिक्षण कार्यशालाएँ, संगठनात्मक बैठकें, सहकार संगोष्ठियाँ तथा कार्यकर्ता विकास के माध्यम से संगठन ने देशभर में अपनी गतिविधियों का विस्तार किया है।
संगठन का ढाँचा अखिल भारतीय स्तर से लेकर प्रांत, जिला और तहसील स्तर तक विकसित किया गया है। इसकी विशेषता यह है कि इसकी मूल इकाई केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि सहकारी संस्था और उससे जुड़े संस्कारित कार्यकर्ता भी हैं। संगठन का प्रयास है कि सहकारी संस्थाओं के पदाधिकारी केवल प्रशासक बनकर न रहें, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायी और उत्पादकता बढ़ाने वाले नेतृत्वकर्ता बनें।
सहकार भारती का मानना है कि कानून, नियम और संगठनात्मक संरचनाएँ तभी प्रभावी हो सकती हैं, जब कार्यकर्ताओं में सहकार का संस्कार हो। इसी उद्देश्य से प्रशिक्षण वर्गों, चिंतन बैठकों और अध्ययन शिविरों के माध्यम से सहकारिता के मूल्यों को जाग्रत करने का कार्य किया जाता है।
संगठन की गतिविधियाँ बैंकिंग, कृषि, दुग्ध उत्पादन, उपभोक्ता सहकारिता, श्रमिक संगठन, आवास, स्वास्थ्य, मत्स्य पालन, महिला स्वावलंबन, विपणन और पर्यटन सहित अनेक क्षेत्रों तक विस्तृत हैं।
सहकारिता के माध्यम से राष्ट्रनिर्माण
सहकार भारती की दृष्टि में आर्थिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय स्वाभिमान एक-दूसरे के पूरक हैं। आर्थिक रूप से सशक्त नागरिकों के बिना सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की कल्पना अधूरी है। सहकारिता इस दिशा में एक प्रभावी माध्यम बन सकती है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर समाज के सर्वांगीण रूपांतरण के लिए जिन पाँच परिवर्तनकारी आयामों पर बल दिया गया है, उनमें सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी और नागरिक कर्तव्य प्रमुख हैं। सहकार भारती इन मूल्यों को सहकारी संस्थाओं की दैनिक गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास कर रही है।
इस दृष्टि में सहकारिता केवल आर्थिक लेन-देन की व्यवस्था नहीं, बल्कि परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र तक सकारात्मक परिवर्तन की सतत प्रक्रिया है। स्थानीय स्तर पर सामूहिक प्रयासों से आर्थिक अवसर बढ़ाना, स्वदेशी उत्पादों को प्रोत्साहन देना, पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना और नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना इसके प्रमुख आयाम हैं।
बदलते समय में सहकारिता के नए अवसर
आज देश के सामने आर्थिक आत्मनिर्भरता, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, ऊर्जा और परिवहन जैसे अनेक विषय हैं। इन क्षेत्रों में सहकारी व्यवस्था व्यापक परिवर्तन का आधार बन सकती है। सहकार भारती ने इस दृष्टि से कुछ महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में सहकारिता के विस्तार की आवश्यकता रेखांकित की है।
- सहकार टैक्सी : श्रमिकों को स्वामित्व और सम्मान
डिजिटल टैक्सी सेवाओं के क्षेत्र में निजी कंपनियों का नियंत्रण और चालकों के सामने आर्थिक चुनौतियाँ एक महत्त्वपूर्ण विषय हैं। सहकारी टैक्सी व्यवस्था के माध्यम से चालक स्वयं व्यवस्था के सहभागी और स्वामी बन सकते हैं। इससे शोषण से मुक्ति, आय में सुधार और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाने की संभावना है।
- सोलर एनर्जी : ऊर्जा आत्मनिर्भरता का मार्ग
सौर ऊर्जा सहकारी समितियों के माध्यम से गाँवों और किसानों को सस्ती बिजली उपलब्ध कराने के साथ अतिरिक्त आय के अवसर भी विकसित किए जा सकते हैं। इससे पर्यावरण संरक्षण और हरित अर्थव्यवस्था को भी बल मिलेगा।
- शिक्षा : सुलभ और गुणवत्तापूर्ण अवसर
सहकारी विद्यालयों और महाविद्यालयों के माध्यम से शिक्षा के बढ़ते व्यावसायीकरण के बीच ग्रामीण एवं वंचित वर्गों के विद्यार्थियों को बेहतर अवसर उपलब्ध कराए जा सकते हैं। साथ ही शिक्षकों के सम्मानजनक रोजगार और शिक्षा में सामाजिक संतुलन को बढ़ावा मिल सकता है।
- स्वास्थ्य : सस्ती और सुलभ चिकित्सा
सहकारी अस्पतालों के माध्यम से आम नागरिकों को सस्ती, पारदर्शी और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने की दिशा में कार्य किया जा सकता है। इसका उद्देश्य चिकित्सा सुविधाओं को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाना है।
- बीमा : सुरक्षित भविष्य की व्यवस्था
सहकारी बीमा व्यवस्था के माध्यम से किसानों, मजदूरों और मध्यम वर्ग को कम प्रीमियम पर सुरक्षा उपलब्ध कराने की संभावनाएँ विकसित की जा सकती हैं।
- हाउसिंग : प्रत्येक व्यक्ति के लिए अपना घर
सहकारी आवास व्यवस्था के माध्यम से सस्ती दरों पर घर, फ्लैट और आवासीय सुविधाएँ उपलब्ध कराने के साथ शहरी विकास में संतुलन और पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सकती है।
- पर्यटन : रोजगार और संस्कृति का संरक्षण
सहकारी पर्यटन के माध्यम से स्थानीय युवाओं को रोजगार, ग्रामीण पर्यटन को प्रोत्साहन तथा लोककला, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण को बढ़ावा मिल सकता है।
- परिवहन : सार्वजनिक सेवा का सहकारी मॉडल
बस, ऑटो, टैक्सी और मालवाहक सेवाओं को सहकारी आधार पर संचालित करने से किराया नियंत्रण, चालकों की आर्थिक सुरक्षा और शोषणमुक्त परिवहन व्यवस्था की संभावनाएँ बन सकती हैं।
- सहकारी उपभोक्ता समितियाँ : स्थानीय व्यापारियों का सशक्तीकरण
सहकारी रिटेल नेटवर्क के माध्यम से स्थानीय दुकानदारों को संगठित कर उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत की जा सकती है। इससे उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर वस्तुएँ और स्वदेशी उत्पादों को व्यापक बाजार मिल सकता है।
इन सभी प्रयासों का मूल उद्देश्य आर्थिक गतिविधियों में अधिकाधिक लोगों की सहभागिता सुनिश्चित करना और विकास के लाभ को समाज के व्यापक वर्गों तक पहुँचाना है।
नीतिगत प्रयास और उपलब्धियाँ
सहकार भारती ने अपने कार्यकाल में सहकारिता के क्षेत्र में वैचारिक जागरण के साथ नीतिगत और संगठनात्मक स्तर पर भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। केंद्र सरकार की सहकारिता नीति के निर्माण और उसके क्रियान्वयन की प्रक्रिया में संगठन की सक्रिय भूमिका रही है।
पंजाब सरकार द्वारा सहकारी समितियों के पंजीयन शुल्क में वृद्धि के निर्णय के बाद सहकार भारती के प्रयासों से इस विषय पर पुनर्विचार हुआ और अधिकतम शुल्क को 10 लाख रुपये से घटाकर 10 हजार रुपये तक लाने का निर्णय किया गया।
हिमाचल प्रदेश में सहकारी समितियों के लाभ से प्रशिक्षण हेतु सरकार को दी जाने वाली राशि के प्रावधान में संशोधन हुआ। इसके अंतर्गत निर्धारित तीन प्रतिशत राशि में से दो प्रतिशत राशि संबंधित सहकारी समितियों को अपने स्तर पर विनियोग करने का अधिकार प्राप्त हुआ।
बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 2021 में संशोधन के बाद शहरी सहकारी बैंकों के निदेशकों के कार्यकाल को अधिकतम दस वर्ष से बढ़ाकर दस वर्ष और एक अवधि तक बढ़ाने का प्रयास भी संगठन की उपलब्धियों में शामिल है।
प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों को आयकर की धारा 269 SS से छूट मिलने से उनके लिए ऋण संबंधी कार्यों का संचालन अपेक्षाकृत सरल हुआ। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद और सहकार भारती के बीच हुए समझौते से सहकारी क्षेत्र में क्षमता विकास, अनुसंधान, प्रशिक्षण, प्रकाशन और जागरूकता जैसे कार्यों को प्रोत्साहन मिला।
कोरोना संकट के समय गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक की नगरीय सहकारी बैंकों तथा क्रेडिट सोसायटियों के माध्यम से जरूरतमंद उद्यमियों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया। राजस्थान में सहकारी आधार पर आश्रय सहकारी भंडारों के माध्यम से त्योहारों के अवसर पर मिठाइयों के उत्पादन और वितरण की व्यवस्था विकसित की गई।
कर्नाटक में विदेशी चॉकलेट कंपनियों के विकल्प के रूप में स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया। इसी प्रकार महिला स्वयं सहायता समूहों को बाजार उपलब्ध कराने के लिए Simplydesi संस्था का गठन और विभिन्न राज्यों में सहकारी स्वास्थ्य सेवाओं के प्रयोग भी उल्लेखनीय पहल हैं।
ये उदाहरण बताते हैं कि सहकारिता को केवल परंपरागत क्षेत्रों तक सीमित रखने के बजाय बदलती आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप नए क्षेत्रों में भी विकसित किया जा सकता है।
संस्कारित कार्यकर्ता : सहकारिता की सफलता का आधार
सहकार भारती की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता उसका कार्यकर्ता-केंद्रित दृष्टिकोण है। संगठन का विश्वास है कि किसी भी व्यवस्था की सफलता केवल उसके नियमों, संसाधनों और संस्थागत ढाँचे पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसे संचालित करने वाले लोगों के चरित्र, निष्ठा और कार्यसंस्कृति पर निर्भर करती है।
सहकारिता में पारदर्शिता, ईमानदारी, सेवा और परस्पर विश्वास अनिवार्य हैं। यदि इन मूल्यों का अभाव होगा तो सहकारी संस्थाएँ भी अपने उद्देश्य से भटक सकती हैं। इसलिए सहकार भारती प्रशिक्षण, अध्ययन, संवाद और संगठनात्मक गतिविधियों के माध्यम से सहकारिता के संस्कार विकसित करने पर विशेष बल देती है।
उसका उद्देश्य ऐसी सहकारी व्यवस्था विकसित करना है जिसमें कार्यकर्ता, पदाधिकारी, सदस्य और उपभोक्ता सभी स्वयं को एक साझा सामाजिक दायित्व का सहभागी समझें।
भविष्य की दिशा : सहकार से समृद्धि, समृद्धि से राष्ट्रनिर्माण
आज आवश्यकता इस बात की है कि सहकारिता को केवल कुछ परंपरागत आर्थिक गतिविधियों तक सीमित न रखा जाए। डिजिटल सेवाओं से लेकर सौर ऊर्जा, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, परिवहन और उपभोक्ता बाजार तक इसके नए आयाम विकसित किए जाएँ। इसके लिए नवाचार, तकनीकी दक्षता, प्रशिक्षण, पारदर्शिता और समाज की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
सहकार भारती का प्रयास इसी दिशा में एक व्यापक सामाजिक और आर्थिक आंदोलन के रूप में सामने आता है। इसका मूल आग्रह है कि आर्थिक विकास का केंद्र केवल पूँजी या बाजार न हो, बल्कि समाज का सामान्य व्यक्ति भी हो। प्रत्येक व्यक्ति को विकास की प्रक्रिया में सहभागी बनाने और उसे आर्थिक रूप से सक्षम बनाने में सहकारिता महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
भारतीय परंपरा का सामूहिकता का भाव, आधुनिक समय की आर्थिक आवश्यकताएँ और राष्ट्रनिर्माण का संकल्प—इन तीनों का समन्वय ही सहकारिता को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा सकता है।
सहकारिता का वास्तविक अर्थ केवल मिलकर काम करना नहीं, बल्कि मिलकर आगे बढ़ना और एक-दूसरे की उन्नति में सहभागी बनना है। यही सहकार भारती की मूल प्रेरणा और उसकी कार्यदिशा है।
‘बिना संस्कार नहीं सहकार, बिना सहकार नहीं उद्धार’ का संदेश इसी व्यापक दृष्टि को अभिव्यक्त करता है। जब सहकारिता में संस्कार, संस्थाओं में पारदर्शिता और कार्यकर्ताओं में समाज के प्रति समर्पण होगा, तभी सहकारिता आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का प्रभावी माध्यम बन सकेगी।