Historical Rajsthan : पराक्रम और शौर्य सिर्फ युद्ध कौशल का अंग नहीं है वरन् मीलों चलकर अपने सर पर घड़ों में पानी लाती स्त्री का यह कार्य भी शौर्य की कोटि में आता है।
Historical Rajsthan : प्रातः काल से लेकर रवि अवसान तक जीवन वातावरण की विषमताओं से संघर्ष करता दिखे, वहां शौर्य का पनपना कोई अचम्भा नहीं है। जीवन की प्रतिकूलता अक्सर व्यक्ति को बहादुर बनाने का कार्य करती है। यही गाथा राजस्थान पर सटीक बैठती है। मीलों लम्बे रेगिस्तान, पानी की बूंद-बूंद के लिए संघर्ष करता राजस्थान, झुलसा देने वाली प्रचण्ड गर्मी और अतिशीत रात्रि की तापीय अतिशयता में सिमटा राजस्थान। यहां के निवासियों में बरबस ही एक जुझारुपन विकसित करता है जो यहां के प्रत्येक पहलू में परिलक्षित होता दिखता है। पराक्रम और शौर्य सिर्फ युद्ध कौशल का अंग नहीं है वरन् मीलों चलकर अपने सर पर घड़ों में पानी लाती स्त्री का यह कार्य भी शौर्य की कोटि में आता है। एक दो दिन नहीं प्रतिदिन उसे इसी प्रक्रिया से गुजरना होता है। वह कभी थकती नहीं, अपने अदम्य शौर्य से वह जीवन की इस विकटता पर विजय प्राप्त करती स्मित हास्य करती दिखाई देती है, और ऐसी विकटता में जीवन जीने वाली स्त्री ही खुलकर चुनौतीपूर्ण स्वरों में अपनी सखी से कह सकती है-
भल्ला हुआ जो मारिया बहिनि म्हारा कंत। जे भग्गा घर आइय…………….परंत।।
अर्थात् हे सखी! बहुत अच्छा हुआ कि मेरा पति रणभूमि में मारा गया, कहीं वह पीठ दिखाकर भाग आता तो लोक-लाज वश मैं तो कहीं चली व जाती। यह अद्भुत साहस साहित्य लेखन के है अपभ्रंश काल में प्रकट होता है जो उत्तरोत्तर बढ़ता ही दिखता है।

अपभ्रंश काल के जैन लेखकों हेमचन्द्र, जिनसेन सूरि, शालिभद्र ने अत्यंत शांत नैनीय परम्परा के बावजूद समकालीन जीवन में शौर्य का वर्णन खूबसूरती के साथ किया है। इन लेखकों के अनुसार जीवन की विकटताओं में भी संयम बनाए रखना अपने आप में निहित शौर्य का परिचायक है।
राजस्थान का सामान्य जीवन रजकण व्याप्त है है। रज कण धूल होते हैं तो राजसीवृत्ति के कण रुप में भी देखे जा सकते हैं। प्रत्येक क्षण उड़ती धूल न जहां एक ओर दुःसह जीवन की आदत देती है वहीं प्रतिकूल परिस्थिति में भी जीवन चलायमान रखने का साहस भी प्रदान करती है। देश, काल, वातावरण, मनुष्य के शिक्षक का कार्य करते हैं। सामान्यतः मनुष्य अपने देश, काल, एवं वातावरण के अनुकूल अपने आचार, विचार एवं कर्मों का प्रतिफलन करता है। यही बात राजस्थान पर भी लागू होती है।
अपभ्रंश काल के जैन लेखकों हेमचन्द्र, जिनसेन सूरि, शालिभद्र ने अत्यंत शांत नैनीय परम्परा के बावजूद समकालीन जीवन में शौर्य का वर्णन खूबसूरती के साथ किया है। इन लेखकों के अनुसार जीवन की विकटताओं में भी संयम बनाए रखना अपने आप में निहित शौर्य का परिचायक है। इसी भाव पर लिखा गया-
सिरि चढ्या खंति फफलैं पुणं डालई मोडन्ति । तौ वि महद्दुम साउणाहें, अवराहहिं न करंति।।
धैर्य का शौर्य एक विशाल वृक्ष के माध्यम से प्रस्तुत किया गया कि वह अपने विशाल स्वरुप के बाद भी अपने सिर चढ़े पक्षियों को कभी अपराधी नहीं मानता। इसी प्रकार के अन्यान्य उदाहरण पउमचरिउ, शब्दानुशासन आदि ग्रन्थों में मिलते है. जहां शान्ति काल के शौर्य अर्थात् शारीरिक पराक्रम से इतर शौर्य की व्याख्या की गयी है। जहां एक ओर अकृत्रिम परिधान धोती, मिरजई, पगड़ी, खडी मूंछ व कमर पर कृपाण पहने देश धर्म रक्षक पुरुष दिखते है वहीं उन्नत वक्षस्थलों को कसती हुई रंग-बिरंगी चोलियों व गोटेदार घाघरे में लिपटी कटिदन्तिनी चूडियों का मधुर संगीत सुनाती सौम्य वीरांगनाएं भी हैं। यही महिलाएं क्षमा, दया, त्याग की मूर्ति रुप में विराजती है तो उन पर पड़ी प्रत्येक कुदृष्टि उन्हें नरसिंहिनी रुप में खड़ा करती है। छत्रसाल की प्रेयसी ‘जहां तारा’ का उद्धरण, युद्ध पलायित जसवंत सिंह के लिए राजद्वार बन्द कर देने वाली पत्नी और पद्मिनी के गौहर की घटनाएं शौर्य स्फूर्ति करने में अति सक्षम है।
जिस मिट्टी में नारी का स्वभाव इतना शौर्यपुष्ट है वहां की कोख से तो एक से एक सूरमाओं की प्रपत्ति की कल्पना की जा सकती है। कालान्तर में लिखा गया हिन्दी साहित्य के आदि अथवा वीरगाथा काल का सम्पूर्ण साहित्य राजस्थान की युद्ध परम्परा, धीरता एवं शौर्य का विस्तृत वर्णन करता है। साहित्य लेखन के इस काल खण्ड में लिखा गया समस्त रासो काव्य इसी शौर्य का परिचायक है। कतिपय आलोचकों ने चारण काव्य की संज्ञा देते हुए इसके अतिशयात्मक विवरणों पर अक्सर ही तंज कसा है, किन्तु सुघी आलोचक यह विस्मृत कैसे कर सकते है कि तत्कालीन परिवेश की यह न्यूनतम आवश्यकता थी, फिर प्रत्येक कल्पना किसी न किसी सत्य को आधार बना कर ही चलती है, तो न्यूनाधिक मात्रा में राजस्थान का पराक्रम इन साहित्य साधकों ने अपने कालखण्ड तथा भविष्य के पाठकों के लिए सृजित किया और प्रश्नय दिया।
खुमाण रासो, पृथ्वीराज रासो, परमार आदि साहित्य शौर्य की पराकाष्ठाओं से भरे दिखते हैं।
जैसा कि लेखक ने पूर्व भी लिखा है कि शौर्य केवल शारीरिक पराक्रम ही नहीं वरन् इससे इतर जीवन के अन्य आयामों में अधिकतम सीमा तक प्रदर्शन भी है। अपने-अपने राजाओं की साज- सज्जा एवं आहार व्यवहार का वर्णन करने में प्रत्येक क्षेत्र की अधिकतम से भी ऊपर की सीमा पर जाकर रचनाकारों ने अपने-अपने आश्रयदाताओं की जीवन शैली का वर्णन किया है जिसे ऊहा, ऊला तथा अतिश्योक्ति अलंकार की कोटि में रखा जाता है। फिर भी वह कथन की कल्पना सत्य के आधार पर ही चलती है, इस सबसे निर्लिप्त होकर मूल साहस को परिलक्षित करती है। बाई मन का लौह कवच धारण कर कई-कई किलों के शस्त्र लेकर युद्ध भूमि में चपलता पूर्वक युद्ध करना स्वयमेव शौर्य की एक कोटि है। मेवाड़ से लेकर अरावली की श्रृंखला तक निर्बाध रुप से शौर्य परम्परा प्रत्येक काल खण्ड की सहचरी रही है।
रासो काव्य रचना के वीरगाथा काल से आगे चलकर भी जब हम तुर्क एवं मुगल शासन काल में लिखे गए साहित्य की ओर दृष्टि करते हैं तो वहां भी रानी पद्मिनी, भामाशाह, गड़ियाराणा, सिसोदिया कुल के वीरों द्वारा चित्तौड़ रक्षा के लिए किए प्रयास, जयमल, पत्ता, राणासांगा, महाराणा प्रताप, राणा कुम्भा आदि अनेकानेक नाम हैं, जो राजस्थान की यश गाथा के अभिन्न अंग बन प्रत्येक देशवासी को देशभक्ति की प्रेरणा देने का कार्य निरंतर करते आ रहे हैं। हल्दी घाटी, पानीपत आज भी नाम स्मरण मात्र से व्यक्ति को रोमांचित कर देते हैं। पहाड़ियों के परकोटों से एक तरफ जहां सुरक्षा का बल मिलता था वहीं राजस्थान के दुर्गों से उठने वाले जयघोष द जथा कीर्ति स्तम्भ सरीखे विजय चिन्ह आज भी शौर्य गाथा के मौन उद्घोषक का कार्य करते हैं।
ज्ञान, भक्ति, साहित्य, रण आदि प्रत्येक क्षेत्र में हेमचन्द्र, भद्रबाहु, चंद, नरपति, मीरा ऐसे कीर्ति के स्तम्भ हैं जिनकी अपने-अपने क्षेत्र में शौर्य पताका – अविरल लहराती चली आ रही है।
डॉ. सुशील चन्द्र त्रिवेदी “मधुपेश” जी ने ना अपने खण्डकाव्य “अपना राजस्थान” में लिखा है-
गोरस पायस की प्रधानता, फिर क्यों न हो शूरमा। ना मारवाड में खाना पड़ता, घी में सना चूरमा।।
कार्य कुशलता दृढ़ता श्रद्धा, सात्विकता की झंकृति, ब्ल मूर्तिवती मानवी सरलता, राजस्थानी-संस्कृति।।