जनक सुकृत भरे सागर, सीय पंकज की कली।
Sita Navami : गण्डकी के तीर से चम्पकारण्य तक फैला हुआ एक नगर है, रस-रुचि-राग में पगा हुआ। इस अद्भुत नगर का राजा अपने विदेह भाव और प्रजा अपने सनेह भाव के लिए विख्यात हैं। प्रसिद्ध है कि इस नगर का निर्माण एक ऐसे राजा ने किया जिसका प्रादुर्भाव उसके दिवंगत पिता के शरीर का मन्थन करने से हुआ था। मन्थन से उत्पन्न राजा का नाम मिथि और राजा के ही सम्बन्ध से राज्य का नाम मिथिला हुआ। वैसे इस नगर को विदेह नगर, तैरभुक्ति अथवा तेरहुत भी कहा जाता है।

धर्मशील, ज्ञानी और गुणीजनों के इस नगर में, विदेहों की परम्परा में, जीवनमुक्तों की सरणि में, जनकों के वंश में कभी शीरध्वज नाम के राजा हुए। उन्होंने यज्ञभूमि का शोधन करने के लिये हल चलाया। ये वही समय था, जब हल चलाना भी यज्ञरूप होता था और तब तक हल यज्ञ करने वालों के विरुद्ध शस्त्र नहीं बना था। तो, ऋषियों ने मन्त्र पढ़े, प्रजा-पुरजन ने प्रार्थनाएँ कीं और राजा ने हल चलाया। फिर..जैसा कि होना चाहिए, भूपति के भाव से विह्वला हुई भूमि ने अपना सत्त्व उड़ेल दिया। राजा शीरध्वज के हल चलाने पर भूमि ने प्राकृत अन्न-जल नहीं, बल्कि एक अप्राकृत कन्या प्रकट कर दी।

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि, वसन्त के परिपाक का मंगलमय मास, रस से उद्रिक्त धरित्री ने मानो अपने हृदय की सम्पूर्ण क्षमा,दया,करुणा, कृपा और रस का कोष कन्या के रूप में प्रकट कर दिया। ऐसी कन्या जिसे भूमि की पुत्री होने से भूमिजा, विदेह की पुत्री होने से विदेहजा, जनक की पुत्री होने से जानकी और मिथिला की कन्या होने से मैथिली कहा गया। राजा ने कहा – ‘ यह हल की नोंक से उपजी है इसलिए सीता कहलाएगी।’ वेदों ने कहा यह परम तत्त्व है, पुराणों ने कहा यह चराचर जगत् की स्वामिनी है। इतिहास कहते हैं यह नारियों की मुकुट मणि है और काव्य कहते हैं कि यही सरस्वती, मति और गति है।

इस अयोनिजा कन्या के होने को ठीक ठीक भला कौन जानेगा। यह आप भी अपने को कहाँ जानती है। आचार्य तो पुकार कर कहते हैं कि –

देवि ! त्वन्महिमावधिर्न हरिणा नापि त्वया ज्ञायते।
पर इस निरवधिक माहात्म्य को रसरीति में परिणत प्रवाहित होते हम देखते हैं। रानी सुनयना के आँगन से उमड़ा हुआ रस-सिन्धु कैसे सनातन भारत को सींचता है, यह छिपा नहीं है। ज्ञानियों का ज्ञान, ध्यानियों का ध्यान बनकर असंख्य पीढ़ियों में प्रकाशित रही यह ज्योतिष्मती कन्या हमारी स्मृति की उज्ज्वलता का प्रमाण बन गई है।
रामचरित कहते – कहते आदि कवि सीताचरित कहने लगते हैं। ‘पुरुष एव इदं सर्वम्’ कहने वाले वेद ‘अस्येशानः जगत:’ कहते हैं। समुद्र-मंथन और समुद्र बंधन जैसी लीलाओं का मूल यही सीता तत्त्व है। असंख्य वर्षों से प्रत्येक वैशाख ऐसे ही मंगल कलश, सोहर और बधाई के बीच इसी सिया धिया के जन्म का महोत्सव मनाता है।

परम पुरुष इन्हीं सीता को अपना परम जीवन कहकर इनकी अधीनता अंगीकार करता है। देवता इनकी कृपा-कोर के भिखारी होते हैं। ऋषि इनकी नखमणिचन्द्रिका का ध्यान करते हैं। कवि इनको उद्भवस्थितिसंहारकारिणी कहकर इनका बहुमान करते हैं।

धरती की कोख से प्रकटी इस सर्वलक्षणलक्षिता कन्या ने अपनी कांति से धरती पर वैकुंठ उतार दिया है।
महर्षि वाल्मीकि कहते हैं – देवमायेव निर्मिता।

गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं – जनक सुता जग जननि जानकी।
काष्ठजिह्वा स्वामी कहते हैं- सिया जू की सरि करि सकत न राम।
और पराशर भट्ट स्वामी कहते हैं कि भगवति ! किसका मुख है जो आपका बखान करेगा भला। अकथनीय का क्या कथन होता है।

सब मिलकर एक ही बात कहते हैं कि देवि ! जैसे आपने उन पर अनुग्रह किया जो दण्डभाजन थे, आपकी वैसी ही कृपा हम पर भी बरसे। आप तो जगन्मात्र पर कृपा बरसाती हैं, फिर हम तो आपके अपने हैं- आपकी मिथिला के हैं।

हम आपके जन्म का मंगल गाते हैं। लाडली जू हमारा मंगल आपके मंगलायतन पाद पद्मों में ही निहित है। हमें वही आश्रय सदा बना रहे।
मैथिल्याश्च रणांशुपल्लवचयः
शय्यास्तु मच्चेतसः ।

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