द्रौपदी के पुत्रों को लेकर :
ऐसा नहीं था कि उनका उल्लेख ग्रंथों में नहीं है, या वह वीर नहीं थे. बस वह विमर्श में नहीं थे! उनपर लिखा नहीं गया. जितना प्रयास कर्ण जैसे लोगों को नायक बनाने का किया गया या फिर दुर्योधन के पापों को कम करने का किया गया, उसमें से शतांश भी अग्निसुता द्रौपदी के पुत्रों को नहीं प्रदान नहीं किया गया.
किसी ने कहा, वर्णन नहीं है, किसी ने कहा कि कहा ही नहीं गया है! अपनी अकर्मण्यता को छिपाने के तमाम बहाने हैं.
महाभारत के आदिपर्व में हरणाहर पर्व में द्रौपदी के पुत्रों के जन्म एवं उनके गुणों का वर्णन है. आइये देखते हैं कि क्या लिखा है
शुभलक्षणा पांचाली ने भी अपने पाँचों पतियों से पाँच पर्वत समान बड़े वीर पुत्र प्राप्त किए। अदिति ने जिस प्रकार देवों को प्रसव किया था, वैसे ही पांचाली ने युधिष्ठिर से प्रतिविन्ध्य, वृकोदर से सुतसोम, अर्जुन से श्रुतकर्मा, नकुल से शतानीक, सहदेव से श्रुतसेन ये पांच महारथी वीरपुत्र प्रसव किए. ब्राह्मणों ने शास्त्रों के अनुसार यह जानकर कि युधिष्ठिर का पुत्र प्रतिविध्य पर्वत की भांति शत्रु को मारने के योग्य होगा, उसका नाम प्रतिविन्ध्य रखा.

सहस्त्र सोमयज्ञ करने के पीछे भीमसेन से सोम के उजाले के समान तेजस्वी बड़े चापधारी सूत के उपजने से उसका नाम सुतसोम हुआ. किरीटधारी अर्जुन ने महान् एवं विख्यात कर्म करने के पश्चात् लौटकर द्रौपदी से पुत्र उत्पन्न किया था, इसलिये उनके पुत्र का नाम श्रुतकर्मा हुआ। कौरवकुल के महामना राजर्षि शतानीक के नाम पर नकुल ने अपने कीर्तिवर्धक पुत्र का नाम शतानीक रख दिया।
और सहदेव से द्रौपदी के जिस पुत्र ने जन्म लिया था, वह कृतिका नक्षत्र में हुआ था, सेनापति कार्तिकेय कृत्तिका की सन्तान थे, अत: सहदेव के पुत्र का नाम श्रुतसेन रखा गया
द्रौपदी के कुमारों में वर्ष-वर्ष भर का अंतर था, वह सब एक दूसरे का हित चाहने वाले एवं यशस्वी हुए. इन सभी कुमारों को अर्जुन से दिव्य एवं मानुषी अस्त्रों की शिक्षा प्राप्त हुई थी.
समस्या यह नहीं है कि हमारे ग्रंथों में किसी का उल्लेख नहीं है, समस्या यह है कि हमारी बुद्धि बी आर चोपड़ा के महाभारत के अनुसार चलती है. जैसा उसमें दिखाया गया, वैसे ही चली. चूंकि महाभारत कौन पढ़े इसलिए हम आश्रित हो गए, कभी किसी के द्वारा किए गए अंग्रेजी भाषांतरण पर, या फिर वामपंथी अनुकूलन पर, या फिर राष्ट्रवादी रैपर में वामपंथी विचारों के!
फिर रोना शुरू किया कि हाय यह नहीं लिखा, वह नहीं लिखा! हाय हाय! ये हाय हाय मचाने से पहले यदि पढ़ा जाए, अध्ययन किया जाए, यदि नहीं कर सकते हैं तो कम से कम किसी ऐसे व्यक्ति से पूछा जाए जिसने इन तमाम ग्रंथों का अध्ययन किया है!
द्रौपदी के महावीर पुत्र थे, जिन्होनें अश्वत्थामा के साथ युद्ध करते हुए अपने प्राण त्यागे थे, उनका सिर कोई सहज काटकर नहीं ले गया था. वह शूरवीर थे, एवं युद्ध के अंत तक बचे रहे थे.

अभिमन्यु सहित सभी पांडव पुत्र शूरवीर थे! ये हमारे बालकों के आदर्श हो सकते हैं, और होने चाहिए। आवश्यकता है कि हम अध्ययन करें और अपनी संतानों को वह ज्ञान दें, जो उन्हें उनके नायकों की पहचान कराए।
हमें अपने नायकों के सम्मान का विमर्श तैयार करना है
