अर्थववेद में लिखा है “शंखेन हत्वा राक्षसि”। अर्थात् “शंख से सब राक्षसों का नाश होता है।”
यजुर्वेद में लिखा है- “अवरस्पराय शंखध्वम्” । अर्थात् “युद्ध में शत्रुओं का हृदय दहलाने हेतु शंख बजाने वाला व्यक्ति अपेक्षित है।”
शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि पूजा के समय जो व्यक्ति शंख ध्वनि करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और वह भगवान श्री हरि विष्णु के साथ आनन्द करता है।
इन सब धार्मिक मान्यताओं के पीछे वैज्ञानिक भी छिपे हैं। विज्ञानी मानते हैं कि “शब्द की प्रगति में सूर्य की किरणें बाधक हैं। अतः सुबह-शाम जब सूर्य किरणें निस्तेज होती हैं, तो ही शंख बजाने का विधान है। एक बार शंख बजाने पर जहाँ तक ध्वनि जाती है, वहाँ तक अनेक बीमारियों के कीटाणु दहल जाते हैं और वे मूर्च्छित होकर नष्ट हो जाते हैं।”
मूकता और हकलापन को दूर करने हेतु शंखध्वनि का श्रवण एक महाऔषधि है। निरन्तर शंख बजाने वाले व्यक्ति को दमा, फेफड़ों का रोग नहीं होता है। नियमित शंख ध्वनि वायुमण्डल को विशुद्ध बनाने, पर्यावरण को शुद्ध करने में अत्यन्त सहायक होती है।
यह भी देखा जाता है कि मन्दिरों में आरती समय शंख बजाया जाता है, तत्पश्चात् शंखोदक में जल लेकर श्रद्धालु दर्शनार्थियों पर छिड़का जाता है। ब्रह्मवैवर्त के अनुसार शख में जल भरकर देवस्थान में रखें और समस्त पूजन सामयी का प्रक्षालन करें।