अतीत के आख्यानों में जहाँ तक दृष्टि जाती है होलिकोत्सव का विवरण मिलता है। वर्तमान सभ्यता के पहले आर्य सभ्यता के साहित्य में तो होली का विवरण है ही मोहन जोदड़ों की खुदाई कुछ चिन्ह ऐसे भी मिले हैं मानों एक दूसरे पर पानी फेंका जा रहा है। लगता है यह होलिकोत्सव के ही प्रतीक चिन्ह हों।
होली का वर्णन और विवरण हर युग साहित्य रचना में मिलती है। पुराणों में भी और श्रृंगार के संस्कृत साहित्य में भी। श्रीमद्भागवत के दशवें स्कंध में रास वर्णन मानो होलिकोत्सव के नृत्य का ही रूप है। हर्षचरित की प्रियदर्शिका, रत्नावली एवं कालिदास के कुमार सम्भवम्, मालविकाग्निमित्रम्, में होलिकोत्सव का उल्लेख आता है। वहीं ऋतुसंहार में एक पूरा सर्ग ही ‘वसन्तोत्सव पर है। संस्कृत साहित्य में वसन्त के साथ होली की चर्चा है। हिन्दी साहित्य में भी चन्दबरदाई, कवि विद्यापति, सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर, जायसी, मीराबाई, कबीर, बिहारी, केशव, घनानन्द आदि आधिकांश कवियों का प्रिय विषय होली रहा है। भारत भ्रमण पर आने वालों के विवरण में भी होलिकोत्सव का उल्लेख है।
इसमें चीनी यात्री वैनसींग और मध्य एशिया के अलबरूनी भी हैं। अंग्रेज लेखकों ने भी होली का पर्याप्त वर्णन किया है। महाकवि सूरदास ने वसन्त एवं होली पर 78 पद लिखे हैं। साहित्य की सभी प्रस्तुति में बसन्त का पर्याय होली है और इसे अनुराग और प्रीति माना गया है। आगे चलकर यह सात्विक अनुराग का प्रतीक राधा-कृष्ण के बीच खेली गयी होली बनी। अनेक सूफी सन्तों और बहादुर शाह जफर शायरों ने भी होलीगीत लिखे हैं। आधुनिक हिन्दी साहित्य और फिल्मी गीतों में होली का पर्याप्त प्रस्तुतिकरण हुआ है।